आदिवासियत का लड़ाकू विचारक

Updated at : 13 May 2016 6:14 AM (IST)
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आदिवासियत का लड़ाकू विचारक

डॉ अनुज लुगुन सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया मराठी के वरिष्ठ आदिवासी कवि वाहरू सोनवाने ‘स्टेज’ कविता में कहते हैं- ‘हम स्टेज पर गये ही नहीं/हमें बुलाया भी नहीं गया/उंगली के इशारे से हमारी जगह हमें दिखाई गयी/वे स्टेज पर खड़े होकर/हमारा दुख हमें ही बताते रहे.’ यह कविता आदिवासी समाज को गैर-आदिवासियों […]

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डॉ अनुज लुगुन
सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया
मराठी के वरिष्ठ आदिवासी कवि वाहरू सोनवाने ‘स्टेज’ कविता में कहते हैं- ‘हम स्टेज पर गये ही नहीं/हमें बुलाया भी नहीं गया/उंगली के इशारे से हमारी जगह हमें दिखाई गयी/वे स्टेज पर खड़े होकर/हमारा दुख हमें ही बताते रहे.’ यह कविता आदिवासी समाज को गैर-आदिवासियों द्वारा निर्देशित करने की यंत्रणादायी प्रक्रिया को बताती है.
आदिवासियों को निर्देशित करने की औपनिवेशिक मंशा का प्रतिरोध करते हुए कई बार वाहरू जी कह चुके हैं कि आदिवासियों को खुद पर छोड़ दो, वे स्वयं अपना विकास कर लेंगे. सवाल है कि क्या वाकई आदिवासी समाज बुद्धिजीवीहीन समाज है? क्या उसे एक कदम चलने के लिए भी बाहरी निर्देशों की जरूरत है? क्या ‘आदिवासियत’ या ‘आदिवासी बौद्धिकता’ जैसी कोई चीज नहीं होती? आपके मन में भी ऐसे सवाल उठते हैं, तो आपको हेराल्ड सैमसन तोपनो को जानना चाहिए.
झारखंड आंदोलन की सांस्कृतिक उपलब्धि ने बौद्धिकों को भी जन्म दिया है. जो झारखंड आंदोलन को केवल राजनीतिक आंदोलन समझते हैं, वे बहुत बड़ी भूल करते हैं. यह उस जमीन का आंदोलन है, जिसने सदियों से सहजीविता की सांस्कृतिक विरासत को सहेज कर रखा था.
इसमें आदिवासी और सदान (मूलवासी) मूल्यों की ऐसी गहरी भागीदारी है, जिसे एक-दूसरे से अलग कर नहीं समझा जा सकता. हेराल्ड सैमसन तोपनो भी झारखंड आंदोलन की एक बौद्धिक उपलब्धि हैं. उनकी रगों में आदिवासी और झारखंडी होने का खून दौड़ता था. यद्यपि उन्हें लंबा जीवन नहीं मिला, लेकिन उनके चिंतन ने उन्हें अमर बना दिया है. आदिवासियत के विमर्शकार हेराल्ड का जन्म 1953 में हुआ था और मृत्यु 1995 में. उन्हें लोग प्यार से ‘सामू’ कहते थे.
हेराल्ड उस दौर के विचारक हैं, जब हमारा देश ‘विकास’ के नाम पर ‘विस्थापन’ का एक चरण पूरा कर चुका था. वे नवउदारवाद के पहले, देश में चले औद्योगिकीकरण की प्रक्रियाओं के साक्षी विचारक हैं.
नवउदारवाद के पहले का भारत वैश्वीकरण के बाद के भारत से इस मामले में थोड़ा भिन्न था कि वहां ‘लोकल्याणकारी राज्य’ की भूमिका का मुखौटा उसके चेहरे पर है. वहां आज के वैश्विक भारत की तरह सीधे तौर पर देशी-विदेशी पूंजी और पूंजीपतियों का नंगा नाच नहीं था. आज भारतीय चिंतक नवें दशक के बाद नव-साम्राज्यवाद और नव-उपनिवेशवाद की बात कर रहे हैं.
हेराल्ड ने आजादी के बाद ही भारतीय सत्ता के औपनिवेशिक चरित्र को पहचान लिया था. उन्होंने कहा था कि विदेशी औपनिवेशिकता के बाद अब आंतरिक उपनिवेश कायम हो गया है, जो देशी प्रशासन और देशी लोगों के द्वारा आदिवासी अंचलों में चलाया जा रहा है. औपनिवेशिक धरातल पर आदिवासी समाज का विश्लेषण ही हेराल्ड को अपने पूर्वज विचारकों से अलग करता है.
जयपाल सिंह मुंडा आदिवासी समाज के प्रखर बुद्धिजीवी रहे हैं.
उन्होंने देश के संविधान निर्माण की प्रक्रिया में आदिवासी समाज का नेतृत्व किया था और संवैधानिक बहसों में जम कर भागीदारी की थी. वे आजाद भारत में आदिवासी समाज के पहले दौर के विचारक हैं. नेहरू ने जब अपनी औद्योगिक नीति के तहत बड़े बांधों, बड़े उद्योगों-कारखानों को भारत के ‘विकास का मंदिर’ कहा था, तब जयपाल ने इन्हें आदिवासियों के लिए ‘विनाश का मंदिर’ कहा था.
जयपाल की चिंता आजादी के बाद के दशकों में प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने लगी और इसकी साक्षी बनी हेराल्ड की पीढ़ी. हेराल्ड की पीढ़ी विकास परियोजनाओं के नाम पर विस्थापन से सीधे प्रभावित थी. उन्होंने विस्थापन विरोधी जन आंदोलनों में प्रत्यक्ष भागीदारी की है और सत्ता के क्रूर चरित्र को अपनी आंखों से देखा है. सरदार सरोवर बांध, भाखड़ा नंगल, टिहरी, रिहंद परियोजना, स्वर्णरेखा परियोजना, खरकई बांध परियोजना, जादूगोड़ा त्रासदी, कोयलकारो परियोजना, औरंगा बांध परियोजना, कुटकु बांध हर जगह के आंदोलनों में हेराल्ड ने प्रतिबद्धता व्यक्त की है. उन्होंने इन परियोजनाओं से विस्थापित जनों के संघर्ष का दस्तावेजीकरण भी किया है. यह अनायास नहीं है कि हेराल्ड के चिंतन के केंद्र में विस्थापन ही है.
हेराल्ड के लेखन से गुजरने पर भारतीय सत्ता का काला पक्ष उभर कर सामने आता है. हेराल्ड प्रभात खबर में ‘जंगल गाथा’ नाम से नियमित कॉलम लिखते थे. उन्होंने ‘जंगल गाथा’ में आदिवासी समाज के साथ भारतीय समाज और सत्ता का व्यवहार, आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विशिष्टता, आदिवासी शिक्षा इत्यादि पर बेबाकी से अपना चिंतन प्रस्तुत किया है.
वे आजादी के बाद के भारतीय समाज में आदिवासियों की दुर्गति के लिए कथित मुख्यधारा के ‘दंभी’ व्यवहार को प्रमुख कारक के रूप में देखते हैं. उनका कहना है कि सामंती और ब्राह्मणवादी मूल्यों से संचालित मुख्यधारा आदिवासियों को ‘पशु’ समझती रही है.
उन्होंने बौद्धिक दुनिया में ‘जंगली पशु नहीं हैं आदिवासी’ की आवाज बुलंद करते हुए ‘सांस्कृतिक नरसंहार’ के साजिशों को उजागार किया है. उन्होंने अफ्रीका, अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया, पापुआ, हर जगह आदिवासियों के उत्पीड़न व विकास के नाम पर उनके विस्थापन को ‘सांस्कृतिक नरसंहार’ कहा है. गहन अध्येता और सक्रिय जन कार्यकर्ता होने के कारण उनके चिंतन की परिधि वैश्विक थी और तेवर आक्रामक था. झारखंड आंदोलन की ताप ने उनके अंदर आदिवासियत की बात को और मजबूत किया. वे आदिवासी शिक्षा की बात करते हुए सामान्य शिक्षा से इतर आदिवासी जीवन दर्शन के अनुकूल जीवन और प्रकृति पर बल देते थे.
आदिवासी समाज की जमीनी लड़ाई को उसके अंदर से पैदा होनेवाली बौद्धिकता के द्वारा ही निर्णायक बिंदु तक पहुंचाया जा सकता है. लेकिन, आदिवासी समाज की बौद्धिक संपदा का अब तक बेहतर उपयोग नहीं हुआ है.
अकादमिकों और ज्ञान की शोध परियोजनाओं में इस दिशा पर ध्यान दिया जाना चाहिए. हेराल्ड के चिंतन का अधिकांश हिस्सा अब भी अप्रकाशित है. हाल ही में उनके लेखों का संकलन पुस्तक ‘उपनिवेशवाद और आदिवासी संघर्ष’ के नाम से प्रकाशित हुआ है. आदिवासी बौद्धिकता की दिशा में किया गया यह महत्वपूर्ण प्रकाशन है. इस दिशा में हम सबको अभी और काम करने की जरूरत है.
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