जंग लगा हथियार है पुलिस

डॉ सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार पुलिसकर्मी अपने-आपमें इतनी बड़ी तोप होता है कि उसके सामने कोई हथियार काम नहीं आता, यहां तक कि उसके अपने हथियार भी बेकार पड़े जंग खाते रहते हैं. अभी पिछले दिनों उत्तर प्रदेश पुलिस के कुछ सीओ लेवल के अधिकारी अपने आइजी द्वारा आयोजित दंगा-नियंत्रण मॉक ड्रिल में दंगा नियंत्रित […]
डॉ सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
पुलिसकर्मी अपने-आपमें इतनी बड़ी तोप होता है कि उसके सामने कोई हथियार काम नहीं आता, यहां तक कि उसके अपने हथियार भी बेकार पड़े जंग खाते रहते हैं. अभी पिछले दिनों उत्तर प्रदेश पुलिस के कुछ सीओ लेवल के अधिकारी अपने आइजी द्वारा आयोजित दंगा-नियंत्रण मॉक ड्रिल में दंगा नियंत्रित करनेवाले हथियार चलाने में विफल रहे, यहां तक कि यह भी पहचान नहीं पाये कि इन्हें कहते क्या हैं.
इससे उत्तर प्रदेश पुलिस एक विशेष प्रकार के यश की भागी हो रही है, जिसके कि शुरू में ‘अप’ लगा है.हिंदी में यश को भी अपयश बना देनेवाला यह ‘अप’ अलबत्ता अंगरेजी में जाकर उन्नति का मार्ग प्रशस्त कर देता है.
अंगरेजी इसीलिए पूरी दुनिया की पसंदीदा भाषा बनी हुई है और भारत की तो वह राष्ट्रभाषा ही है! कुछ लोग हिंदी के राष्ट्रभाषा होने की गलतफहमी भी हालांकि पाले रहते हैं, पर उनके पाले में खुद उनके बच्चे भी नहीं पाये जाते.
वैसे पुलिस कहीं की भी हो, वह अपनी किरकिरी करवाने की अभ्यस्त होती है. उसे हथियार चलाने का अभ्यास करवाया जाता हो या नहीं, लेकिन ऐसा लगता है कि उसे किरकिरी करवाने का अभ्यास जरूर करवाया जाता है. यही वजह है कि उसकी आंखों के सामने हत्याएं होती रहती हैं और नाक के नीचे देह-व्यापार चलता रहता है, लेकिन उसके कानों पर तब तक कोई जूं नहीं रेंगती, जब तक कि वह अपनी किरकिरी नहीं करवा लेती. इसीलिए वह सबकी आंखों की किरकिरी बनी रहती है.
लेकिन मुझे यह समझे जाने पर सख्त ऐतराज है कि पुलिस दंगे रोक सकती है. हमारी पुलिस न दंगे कर सकती है, न दंगे रोक सकती है, वह केवल दंगे होने दे सकती है. अब तक जितने भी दंगे देश में हुए हैं, उनमें से एक भी पुलिस ने न तो किया और न रोका, हां होने सारे दिये. दंगों के मामले में उसकी स्थिति जमालो नामक उस खातून की तरह होती है, जिसके बारे में कहा जाता है कि ‘भुस में आग लगाय जमालो दूर खड़ी.’
फर्क सिर्फ यह है कि उस भुस में आग जमालो खुद लगाती है और खुद ही दूर जाकर खड़ी हो जाती है, जबकि दंगे के भुस में आग कोई और लगाते हैं, जो कोई और नहीं, बल्कि नेता होते हैं, पुलिस सिर्फ दूर जाकर खड़े होने का काम करती है, वह भी ज्यादा दूर नहीं, बगल में ही. इस तरह वह खुद सत्ताधारियों का हथियार बन जाती है, जंग खाया हुआ हथियार.
वैसे भी जब पुलिस बिना किसी हथियार के ही अपने सारे कार्य संपन्न कर लेती है, तो फिर वह हथियार चलाना जानती हो या न जानती हो, इससे क्या फर्क पड़ता है?
निरपराधों को पीटने का काम वह अपनी बेल्ट से कर लेती है, उनसे अपराध कबूलवाने का काम लात-घूंसों से कर डालती है, चोरी-डकैती-रेप-छिनैती की वारदातें दर्ज न करके ही ऐसी तमाम घटनाओं को रोकने में वह सफल रहती है. चोर को पकड़ने गया सिपाही अगर उसे पकड़ कर न भी ला पाये, तो उसके हाथों के निशान जरूर लेकर आता है, भले ही वह थप्पड़ के रूप में अपने गाल पर ही लेकर आये.
हाल ही में मुझे एक सिपाही ने बताया कि वह एक कबाड़ीनुमा मुजरिम को पकड़ कर थाने ले जा रहा था. उस कबाड़ीनुमा व्यक्ति ने पूछा कि मुझे किस जुर्म में पकड़ कर ले जा रहे हो, यह तो बता दो, तो मैंने कहा कि तुम्हारे पास इन बोतलों, कुप्पियों, पीपों आदि के रूप में नकली शराब बनाने के उपकरण पाये गये हैं, लिहाजा तुम्हें नकली शराब बनाने के जुर्म में पकड़ कर ले जा रहा हूं. आक्रोश में भर कर वह कबाड़ीनुमा व्यक्ति बोला कि इसमें रेप का जुर्म और जोड़ लो, क्योंकि मैं रेप का उपकरण भी साथ ही लेकर चल रहा हूं.
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