आयुर्वेद का विस्तार

Updated at : 03 Feb 2016 6:26 AM (IST)
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आयुर्वेद का विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उचित ही रेखांकित किया है कि प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद की संभावनाओं का पूरा उपयोग अब तक नहीं हो सका है. केरल के कोझिकोड में वैश्विक आयुर्वेद महोत्सव को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि इस पारंपरिक पद्धति में बहुत सारी स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान की क्षमता है. इसी सोच […]

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उचित ही रेखांकित किया है कि प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद की संभावनाओं का पूरा उपयोग अब तक नहीं हो सका है. केरल के कोझिकोड में वैश्विक आयुर्वेद महोत्सव को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि इस पारंपरिक पद्धति में बहुत सारी स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान की क्षमता है. इसी सोच से प्रेरित होकर सरकार अलग विभाग बना कर आयुर्वेद के विस्तार का प्रयास कर रही है. भारतीय सभ्यता और संस्कृति में ज्ञान-विज्ञान के संधान की सुदीर्घ परंपरा रही है. आयुर्वेद और उपचार की पुरानी पद्धतियां इसी परंपरा में फली-फूली हैं.

लेकिन आधुनिक समय में पाश्चात्य चिकित्सा के तीव्र विस्तार और आयुर्वेद पर समुचित ध्यान न दिये जाने के कारण इनका विकास अवरुद्ध हुआ है. सवाल आधुनिक पद्धतियों के प्रतिकार कर आयुर्वेद को बढ़ावा देने का नहीं है, बल्कि बेहतरीन देशी-विदेशी उपायों के सामंजस्य और समायोजन का है.

इसके लिए जरूरी है कि सरकार आयुर्वेद की शिक्षा और अनुसंधान पर पर्याप्त ध्यान दे. आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सा की शिक्षा देनेवाले संस्थानों की दशा बेहद खराब है, जिसके कारण यहां से प्रशिक्षित चिकित्सकों की गुणवत्ता पर लोगों को पर्याप्त भरोसा नहीं है. आज इन पद्धतियों के ज्यादातर नामी-गिरामी चिकित्सक अपनी पैतृक या गुरु-शिष्य परंपरा से दीक्षित हैं. संबंधित संस्थान महज डिग्री बांटने की जगह बन कर रह गये हैं. ऐसे में मेधावी छात्र आयुर्वेदिक चिकित्सक बनने से कतराते हैं. पर्याप्त प्रशासनिक निगरानी के अभाव में पारंपरिक पद्धतियों के नाम पर लोगों को बेवकूफ बनाने का धंधा भी जोरों पर है.

सरकार को शिक्षा के साथ आयुर्वेद को स्वास्थ्य नीति से भी जोड़ना चाहिए, ताकि स्वास्थ्य सेवाओं में चिकित्सकों की कमी दूर हो और लोगों को उपचार सुलभ हो. आधुनिक शिक्षा से संबद्ध होने से आयुर्वेद के दायरे का भी विस्तार होगा तथा पारंपरिक ज्ञान को नयी दृष्टि मिल सकेगी. चिकित्सा औषधि निगम, विनियामक परिषद्, अनुसंधान परिषद, राष्ट्रीय संस्थान जैसी सरकारी संस्थाएं और अनेक प्रयोगशालाओं के कामकाज का उचित मूल्यांकन जरूरी है.

देश भर में सैकड़ों कॉलेज हैं और भारतीय पद्धति के पंजीकृत चिकित्सकों की संख्या सात लाख से अधिक है. आयुर्वेद और अन्य देशी चिकित्सा पद्धतियों को प्रतिष्ठित करने के लिए इस व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव की जरूरत है. मौजूदा वित्त वर्ष के बजट में आयुर्वेद के लिए मात्र 248 करोड़ आवंटित किये थे, जो पिछले वर्ष से 17 करोड़ कम था. उम्मीद है कि सरकार आगामी बजट में आवंटन पर समुचित ध्यान देगी.

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