एक तमिल संत ने बांधा पूरा देश

Updated at : 25 Dec 2015 1:32 AM (IST)
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एक तमिल संत ने बांधा पूरा देश

तरुण विजय राज्यसभा सांसद, भाजपा सत्रह दिसंबर की सुबह संसद भवन में एक ऐसा दृश्य दिखा, जिसके बारे में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और विचारक प्रो राम गोपाल यादव ने कहा, ‘‘मैं अपने पच्चीस-तीस वर्षीय संसदीय जीवन में ऐसा कार्यक्रम पहली बार देख रहा हूं.’’ एक ही मंच पर भाजपा, कांग्रेस, सीपीआइ, सीपीएम, द्रमुक, […]

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तरुण विजय
राज्यसभा सांसद, भाजपा
सत्रह दिसंबर की सुबह संसद भवन में एक ऐसा दृश्य दिखा, जिसके बारे में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और विचारक प्रो राम गोपाल यादव ने कहा, ‘‘मैं अपने पच्चीस-तीस वर्षीय संसदीय जीवन में ऐसा कार्यक्रम पहली बार देख रहा हूं.’’
एक ही मंच पर भाजपा, कांग्रेस, सीपीआइ, सीपीएम, द्रमुक, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी के नेता थे, तो उन्हीं के साथ में थे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ सह सर कार्यवाह द्वय श्री दत्ता होसबोले और डॉ कृष्ण गोपाल. सभा में जदयू, कांग्रेस, टीआरएस, अन्नाद्रमुक के अलावा स्वतंत्र नामांकित सांसद जैसे सुश्री अनु आगा उपस्थित थे. प्रसंग था- तमिलनाडु के महान संत कवि तिरुवल्लुवर की अमर कृति तिरुकुरल के संसद में गायन व प्रतिष्ठित तमिल साहित्यकारों के सम्मान का.
समूचा तमिलनाडु इस बात को देख कर अचंभित था कि जो कार्य कभी किसी तमिल नेता या सांसद द्वारा संपन्न नहीं हो पाया वह उत्तराखंड के हिंदीभाषी सांसद ने श्रद्धा और विनम्रता से पूरा कर समूचे दक्षिण को यह संदेश देना चाहा कि उत्तर में कोई दक्षिण का न विरोधी है, न दक्षिण की भाषाओं के प्रति हीनता का भाव रखता है.
यह विडंबना ही है कि पिछले दो हजार वर्षों से विश्वव्यापी तमिल समाज और दक्षिणी भाषा समूह के लोगों पर गहरा प्रभाव रखनेवाले तिरुवल्लुवर से उत्तर भारत अपरिचित ही रहा. उनकी रचना तिरुकुरल का अर्थ है पवित्र सुभाषित. राजा-प्रजा, शासन-प्रशासन, घर-गृहस्थी, प्रेम-विरक्ति, अध्यात्म और समाज सुधार जैसे जीवन के विभिन्न अंगों और उपांगों के बारे में तिरुकुरल की दो-दो पंक्तियों के दोहों में अपार संसार का ज्ञान और दर्शन अंतर्निहित है.
तिरुकुरल का पहला सुभाषित ही कहता है कि जैसे संसार की सभी वर्णमालाओं का पहला अक्षर ‘अ’ है, वैसे ही इस संसार का जनक एक ही ईश्वर है. उसमें सभी धर्मों और पंथों के लिए स्वीकार्य बातें कही गयी हैं. इसलिए तिरुकुरल को माननेवालों में हिंदू, मुसलिम, ईसाई सभी होते हैं.
यदि आधुनिक भाषा में समझाया जाये, तो तिरुकुरल के तमिल अनुयायी मानते हैं कि यह संसार का सबसे सेक्यूलर नैतिक ग्रंथ है.
लेकिन, क्या कारण रहा कि जिस तिरुकुरल के सम्मान के लिए देश के वे सभी दलीय नेता एक साथ आ सके, उस तिरुकुरल के बारे में समूचा उत्तर अनभिज्ञ ही रहा. किसी भी विद्यालय के किसी पाठ्यक्रम में तिरुकुरल अथवा तिरुवल्लुवर का जीवन नहीं पढ़ाया जाता है.
हम चाहते हैं कि तुलसीदास और वाल्मीकि, मीरा और कबीर सारे देश में पढ़े जायें और सराहे जायें, लेकिन क्या कभी किसी ने यह भी प्रयास किया कि तमिल अथवा कन्नड़ और मलयालम की महानता वहां के महान साहित्यकारों की जीवनगाथा और रचनाओं का परिचय भी उत्तर भारत के लोग पढ़ें?
क्या केवल अशोक और विक्रमादित्य ही संपूर्ण भारत के प्रतिनिधि हो सकते हैं और हम चोल, चेर, राजेंद्र चोल, पांड्य और कृष्ण देव राय को पूरी तरह उपेक्षित कर संपूर्ण देश की कल्पना सामने रख सकते हैं? यह हिंदी और उत्तर भारत को पूरा देश माननेवालों का अहंकार नहीं माना जाना चाहिए कि वे कभी इस बात की चिंता ही नहीं कर पाये कि मीरा के साथ आंडाल, कण्णगी, अव्य्यार, चेनम्मा और सुब्रह्मण्यम भारती भी भारतीय सांस्कृतिक एवं भक्तिधारा के महान प्रतिनिधि हैं, जिन्हें पूरे देश में परिचित कराने पर ही हम समग्र भारत का ताना-बाना बुन सकते हैं?
राष्ट्रीय एकता की बात केवल एक भाषा एक क्षेत्र के महापुरुषों के गायन व प्रचलन से ही नहीं हो सकती.नगालैंड की रानी गायदिन्ल्यू ने सोलह साल की उम्र में अंगरेजों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी और सारे कानून ताक पर रख अंगरेजों ने उस गुरिल्ला योद्धा को तीन बटालियन ब्रिटिश फौज लगा कर जब पकड़ा, तो उम्र कैद की सजा दी. पंडित नेहरू उस वीर योद्धा से मिलने कोहिमा जेल में गये, तो उसकी सुंदरता और वीरता से प्रभावित होकर उसे रानी की उपाधि दी.
बाद में इंदिरा गांधी ने उन्हें पद्मभूषण और स्वतंत्रता सेनानी के ताम्रपत्र से विभूषित किया. लेकिन, कितने लोग हैं, जो नगालैंड की उस महान स्वतंत्रता सेनानी के बारे में जानते हैं अथवा कितने विद्यालयों में उनका जीवन पढ़ाया जाता है?
हम रानी लक्ष्मीबाई की वीरता और पराक्रम की गाथाएं बचपन से सुनते आये और ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी’ जैसी कविताएं हमारे अधरों पर रहती हैं.
लेकिन, रानी लक्ष्मीबाई की महानता और वीरता को प्रणाम करते हुए भी यह सवाल पूछना ही पड़ेगा कि तमिलनाडु की महान साम्राज्ञी रानी वेलू नाच्चियार के बारे में क्यों नहीं पढ़ाया गया, जो जीवन में कभी भी अंगरेजों से नहीं हारीं तथा जिसने ब्रिटिश फौजों के छक्के छुड़ा दिये. क्या वेलू नाच्चियार की जीवनगाथा से शेष देश को परिचित नहीं कराया जाना चाहिए?
जलियांवाला बाग में अंगरेजों की क्रूरता और देशभक्तों का बलिदान का गीत सारा देश गाता है. लेकिन, क्या हमें पता है कि 1801 में तमिलनाडु में 400 तमिल स्वतंत्रता सेनानियों को एक दिन में अंगरेजों ने फांसी पर चढ़ाया था? यह गाथा तमिलनाडु में सब जगह प्रचलित है सिवाय उत्तर भारत के. राष्ट्रीय दृष्टिकोण समूचे राष्ट्र के महापुरुषों को समान रूप से सम्मान देकर ही पैदा किया जा सकता है.
कुछ समय पहले मैं राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मिलने गया, तो उनसे राजेंद्र चोल की महानता के बारे में चर्चा हुई. उन्होंने कहा कि राजेंद्र चोल विश्व के महानतम नौसेना सम्राट थे.
कंबोडिया, लाओस, वियतनाम तक राजेंद्र चोल का साम्राज्य था. शिवाजी ने भी कान्होजी आंग्रे के नेतृत्व में जो नौसेना बनायी, उसने राजेंद्र चोल की नौसेना की ही तकनीक अपनायी थी. इस वर्ष राजेंद्र चोल की एक हजारवीं जयंती मनायी जा रही है. लेकिन, इस देश के इतिहास की पुस्तकें आक्रमणकारियों के वंश और उनके नाते-रिश्तेदारों के परिचय से भरी रहती हैं.
तिरुवल्लुवर केवल तमिलनाडु नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत के महान संत कवि थे, जिनके प्रति हर भेदभाव और दलगत राजनीति की परिधियां लांघ कर यदि राजनेता एकत्र हो सकते हैं, तो भारतीय समाज और शिक्षाशास्त्री उन्हें अपनाने में क्यों विलंब करें?
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