सामाजिक कुरीतियां जीवन के रोड़े

Updated at : 22 Dec 2015 12:41 AM (IST)
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सामाजिक कुरीतियां जीवन के रोड़े

आज आधुनिक युग में पूरा देश विकास की राह पर अग्रसर है, मगर ग्रामीण क्षेत्र अब भी इससे अछूते हैं. इसका एकमात्र कारण ग्रामीणों की दकियानुसी सोच और सामाजिक कुरीतियां हैं. यदि ग्रामीण अपने मन से इन दो चीजों को बाहर निकाल दें, तो गांवों के विकास को कोई रोक नहीं सकता है. हमारी सरकार […]

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आज आधुनिक युग में पूरा देश विकास की राह पर अग्रसर है, मगर ग्रामीण क्षेत्र अब भी इससे अछूते हैं. इसका एकमात्र कारण ग्रामीणों की दकियानुसी सोच और सामाजिक कुरीतियां हैं. यदि ग्रामीण अपने मन से इन दो चीजों को बाहर निकाल दें, तो गांवों के विकास को कोई रोक नहीं सकता है.

हमारी सरकार 14 वर्ष के बालक-बालिकाओं को मुफ्त शिक्षा देने के लिए कई योजनाएं चला रही है. इसके लिए देश में बाकायदा शिक्षा का अधिकार कानून भी लागू किया गया है. इसके बावजूद ग्रामीण बच्चे अच्छी शिक्षा पाने से महरूम हैं. इसका कारण अभिभावकों में जागरूकता की कमी है. यह कमी उनमें इसलिए बरकरार है, क्योंकि दकियानुसी विचार और कुरीति उनके अंदर कूट-कूट कर भरी है. एक ओर देश में सरकार जहां लड़कियों को लड़कों के समान दर्जा दिलाने की कोशिश कर रही है, वहीं गांव में आज भी बेटियां अभिभावकों के लिए बोझ ही मानी जाती हैं. वंश परंपरा को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी बालकों के कंधों पर मानने की सोच और फिर इसके लिए पुत्र पैदा करने की लालसा, इसके लिए की जानेवाली कोशिशें ग्रामीण समाज को शहरी समाज से दूर करती हैं.

अकेले शहरी समाज से ही नहीं, बल्कि विकास से भी महरूम करने में अहम भूमिका निभाती हैं. अकेले यही नहीं, कई समुदाय के लोगों में त्योहारों, शादी-समारोह और श्राद्ध आदि में बलि प्रथा के साथ नशापान का भी विशेष महत्व है. यह उस समुदाय की रूढ़ीवादिता भी कही जा सकती है. लकीर को पकड़ कर डंडा पीटने से कभी किसी समाज का भला नहीं हुआ है. सही मायने में देश के समग्र विकास के लिए सदियों पुरानी लकीर को छोड़ कर लोगों को खुद के अंदर नयी सोच और जागरूकता पैदा करनी होगी. अन्यथा सबकुछ गंवा देने के बाद कुछ भी हासिल नहीं होगा.

Àहरिश्चंद्र महतो, प सिहभूम

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