सरकारी निवेश में वृद्धि करे सरकार

Updated at : 15 Dec 2015 6:58 AM (IST)
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सरकारी निवेश में वृद्धि करे सरकार

डॉ भरत झुनझुनवाला अर्थशास्त्री भाजपा सरकार को सत्तारूढ़ हुए डेढ़ वर्ष पूरे हो चुके हैं. इस दौरान भ्रष्टाचार में निश्चित रूप से कमी आयी है, परंतु हमारी ग्रोथ सपाट है. सरकारी आंकड़ों में लगभग सात प्रतिशत ग्रोथ का दावा किया जा रहा है, परंतु जमीनी परिस्थिति बिल्कुल विपरीत है. हर दुकानदार, उद्यमी कह रहा है […]

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डॉ भरत झुनझुनवाला
अर्थशास्त्री
भाजपा सरकार को सत्तारूढ़ हुए डेढ़ वर्ष पूरे हो चुके हैं. इस दौरान भ्रष्टाचार में निश्चित रूप से कमी आयी है, परंतु हमारी ग्रोथ सपाट है. सरकारी आंकड़ों में लगभग सात प्रतिशत ग्रोथ का दावा किया जा रहा है, परंतु जमीनी परिस्थिति बिल्कुल विपरीत है. हर दुकानदार, उद्यमी कह रहा है कि पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष धंधा 20-30 प्रतिशत डाउन है. भ्रष्टाचार पर नियंत्रण से ग्रोथ बढ़नी चाहिए थी. पहले हाइ-वे बनाने के लिए आवंटित 100 करोड़ में 30 करोड़ का रिसाव हो रहा था. यह रकम रीयल इस्टेट अथवा गोल्ड में डाली जा रही थी या विदेशों को भेजी जा रही थी. अब यह रिसाव कम हो गया है.
पूरे 100 करोड़ का हाइ-वे बनाने में निवेश हो रहा है. इससे ग्रोथ बढ़नी चाहिए थी. लेकिन, ऐसा नहीं हो रहा. कारण, सरकार ने कुल खर्चों में कटौती की है. पहले 100 करोड़ के बजट में 70 करोड़ से हाइ-वे बन रहे थे और 30 करोड़ रीयल इस्टेट के माध्यम से बाजार में तेजी आ रही थी. अब सरकार ने कुल बजट को 70 करोड़ कर दिया है. रिसाव से उत्पन्न होनेवाली तेजी लुप्त हो गयी है. यही कारण है कि बाजार में मंदी छा रही है.
सरकार की खर्च कम करने की इस पाॅलिसी के पीछे विश्व बैंक जैसी पश्चिमी संस्थाओं का हाथ है. बात 70 के दशक की है. विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष एवं अमेरिकी प्राइवेट बैंकों ने दक्षिण अमेरिकी देशों को भारी मात्रा में ऋण दे रखे थे. मेजबान देशों के नेता भ्रष्ट थे.
इन्होंने ऋण की रकम का अधिकाधिक रिसाव किया और स्विस बैंक के अपने निजी खातों में जमा करा लिये. देश पर ऋण चढ़ा रह गया, जबकि हाइ-वे आदि का निर्माण हुआ ही नहीं. ग्रोथ नहीं बढ़ी. ऋण वसूलना कठिन हो गया. तब विश्व बैंक आदि ने सहमति बनायी कि अब विकासशील देशों की सरकारों को ऋण नहीं देंगे. उनसे कहा जायेगा कि सरकारी खर्चों में कटौती करें और निवेश को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खोल दें.
जैसे पहले ब्राजील को हाइ-वे बनाने के लिए ऋण दिया जा रहा था. अब कहा गया कि ऋण नहीं मिलेगा. हाइ-वे बनाने के लिए अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी को आमंत्रित करें. प्राइवेट कंपनी होने के नाते उस निवेश का रिसाव नहीं होगा. ब्राजील को हाइ-वे मिल जायेगा और ऋण के बोझ से मुक्ति भी मिल जायेगी. साथ ही साथ विश्व बैंक की रकम भी खटाई में नहीं पड़ेगी.
लेकिन, इस पालिसी के परिणाम अच्छे नहीं रहे. सरकार द्वारा निवेश में कटौती करने से घरेलू अर्थव्यवस्था में सुस्ती छा गयी. इस सुस्ती के चलते विदेशी निवेश भी नहीं आया. निवेश के दोनों स्रोत सूख गये. घरेलू निवेश सूख गया, चूंकि सरकारी खर्चों में कटौती हुई. विदेशी निवेश सूख गया, क्योंकि घरेलू अर्थव्यवस्था में मांग नहीं थी.
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए यह लाभ का सौदा रहा. विकासशील देशों में प्रवेश करके लाभ कमाने के अवसर खुल गये. कुल निवेश में कटौती के बावजूद विदेशी निवेश में कुछ वृद्धि हुई. जैसे विश्व बैंक द्वारा दिये जानेवाले लोन में 100 करोड़ की कटौती की गयी. साथ-साथ बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा निवेश में 20 करोड़ की वृद्धि की गयी. इस प्रकार कुल निवेश घटा तथा मेजबान देश की अर्थव्यवस्थाएं दबाव में आ गयीं. फिर भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए यह लाभ का सौदा रहा.
चीन का अनुभव इस विश्लेषण के विपरीत दिखता है. पिछले तीन दशक में वहां भारी मात्रा में विदेशी निवेश आया और द्रुत गति से ग्रोथ हुई. चीन की ग्रोथ के तीन स्रोत हैं : घरेलू बचत, पर्यावरण की हानि और विदेशी निवेश.
पिछले तीन दशक में भारत की औसत बचत दर लगभग 27 प्रतिशत रही है, जबकि चीन की बचत दर लगभग 45 प्रतिशत रही. चीन के लोग खपत कम और बचत ज्यादा कर रहे थे. इस बचत से घरेलू निवेश हो रहा था. निवेश के लिए चीन विश्व बैंक पर निर्भर नहीं था. चीन की ग्रोथ का दूसरा स्रोत पर्यावरण की क्षति रही है. जैसे चीन ने कोयले की खदानों पर राॅयल्टी न्यून दरों से वसूल की.
कोयले का दाम न्यून रखा. इससे बिजली सस्ती उपलब्ध हुई. चीन का माल विश्व बाजार में सस्ता पड़ा. चीन के निर्यात बढ़े और उसकी तीव्र ग्रोथ हुई. चीन की ग्रोथ का तीसरा स्रोत विदेशी निवेश रहा है. यह स्रोत अकेले कारगर नहीं था. घरेलू बचत तथा पर्यावरण की क्षति से उपजी ग्रोथ पर यह निवेश सवारी कर रहा था. वास्तव में चीन की ग्रोथ में घरेलू बचत और पर्यावरण की क्षति का योगदान प्रमुख रहा है, लेकिन दिखाया यह जा रहा है कि विदेशी निवेश के कारण तीव्र ग्रोथ हुई है. चीन का अनुभव बताता है कि घरेलू बचत दर ऊंची हो, घरेलू निवेश द्रुत गति से हो रहा हो, तो विदेशी निवेश भी आता है और लाभप्रद भी हो सकता है.
चीन का अनुभव भारत पर लागू नहीं होता, क्योंकि हमारी बचत दर कम है और हम पर्यावरण की क्षति भी कम ही कर रहे हैं. चीन का अनुभव बताता है कि घरेलू तथा विदेशी निवेश एक-दूसरे के पूरक हैं. घरेलू निवेश हो रहा हो, तो विदेशी निवेश सफल है. भारत सरकार ने घरेलू निवेश में कटौती की है. इसलिए न घरेलू निवेश हो रहा है, न ही विदेशी निवेश आ रहा है. हमारी ग्रोथ भी सपाट है.
भारत व चीन के अनुभव में एक और महत्वपूर्ण अंतर है. चीन की संस्कृति में राजभक्ति प्रमुख है. सरकार ने कहा कि घरेलू निवेश बढ़ाओ, तो चीन के अधिकाधिक लोग निवेश बढ़ायेंगे. अपनी रकम विदेश नहीं भेजेंगे. भारत की संस्कृति में राजभक्ति को छोटा दर्जा दिया गया है.
फकीर को ऊंचा दर्जा दिया गया है. लेकिन, हमारे फकीर भ्रष्ट हो गये. अनुयायी को सुदिशा देने के स्थान पर उसके भ्रष्टाचार में अपना हिस्सा काटने लगे. कुछ समय पहले प्रधानमंत्री ने चिंता जतायी थी कि भारतीय उद्यमी देश में निवेश करने के बजाय विदेशों में निवेश कर रहे हैं. यह कहने की जरूरत इसलिए पड़ी कि भारतीय उद्यमी राजभक्त नहीं हैं.
इन कारणों से चीन का माॅडल हमारे लिए सफल नहीं है. इस परिस्थिति में सरकार को अपनी नीति में शीघ्र ही परिवर्तन करना होगा. विश्व बैंक के बताये अनुसार सरकारी निवेश में कटौती करके विदेशी निवेशकों की राह देखने से काम नहीं चलेगा. विश्व बैंक द्वारा सरकारी निवेश में कटौती के मंत्र की शुरुआत दक्षिण अमेरिका के भ्रष्ट नेताओं से हुई थी.
आज देश में ईमानदार सरकार उपलब्ध है. ऐसे में सरकारी निवेश में कटौती करने के स्थान पर इसमें वृद्धि करनी चाहिए. नोट छाप कर हाइ-वे बनाने चाहिए. महंगाई में कुछ वृद्धि होगी, जिसे वहन करना चाहिए. अन्यथा हमारी ग्रोथ और ढीली होती जायेगी.
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