भाजपा का इतिहास से खिलवाड़

Updated at : 10 Dec 2015 6:03 AM (IST)
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भाजपा का इतिहास से खिलवाड़

पवन के वर्मा सांसद एवं पूर्व प्रशासक राजनीति की गर्मागर्म दुनिया में जो असली दिखता है, वह अकसर भ्रामक होता है, और जिसे भ्रमपूर्ण माना जाता है, वही वास्तविक होता है. शंकराचार्य की रस्सी और सांपवाली कथा अकसर दोहरायी जाती है, जो सिर्फ वास्तविकता और प्रतीत के बीच दार्शनिक अंतर को ही नहीं रेखांकित करती […]

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पवन के वर्मा
सांसद एवं पूर्व प्रशासक
राजनीति की गर्मागर्म दुनिया में जो असली दिखता है, वह अकसर भ्रामक होता है, और जिसे भ्रमपूर्ण माना जाता है, वही वास्तविक होता है. शंकराचार्य की रस्सी और सांपवाली कथा अकसर दोहरायी जाती है, जो सिर्फ वास्तविकता और प्रतीत के बीच दार्शनिक अंतर को ही नहीं रेखांकित करती है, बल्कि यह राजनीतिक समूह के कथित रणनीतिक योजनाबद्धता का भी सांचा है.
माया की जादुई शक्ति सचमुच मोहक है और उसकी थाह लेना बहुत कठिन है. लेकिन राजनीति का छद्म और दोहरापन आसानी से समझा जा सकता है. उदाहरण के लिए, संसद के शीतकालीन सत्र के पहले दो दिन संविधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करने और संविधान समिति के अध्यक्ष बाबासाहेब आंबेडकर को उनकी 125वीं जयंती वर्ष में श्रद्धांजलि देने के लिए समर्पित करने के सत्तारूढ़ दल के एजेंडे को कैसे समझा जाये? सरकार ने हर साल 26 नवंबर को संविधान दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है. वर्ष 1949 में उसी दिन हमारे संविधान को अंतिम रूप दिया गया था. इसे 26 जनवरी, 1950 को अंगीकार किया गया था, जिसे हम गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं.
हमारी संसद 26 नवंबर, 1949 को ब्रिटिश संसद के एक प्रस्ताव के आधार पर कार्यरत थी. जैसा कि राज्यसभा में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सीताराम येचुरी ने सदन में प्रभावी ढंग से उल्लेख किया, भारत के भावी संविधान की रूप-रेखा को निर्धारित करने के लिए जो संविधान सभा करीब तीन सालों तक काम कर रही थी, वह खुद तकनीकी रूप से हमारे पूर्व औपनिवेशिक मालिकों की अनुमति से कार्यरत थी.
ब्रिटिश संसद की मुहर के साथ यह व्यवस्था 26 जनवरी, 1950 तक चली थी, जब स्वतंत्र भारत ने अपना संविधान अंगीकार किया और भारत को एक गणतंत्र बनाने का संकल्प लिया.
विगत 65 सालों से 26 जनवरी को मनाया जानेवाला गणतंत्र दिवस वह दिन है, जब हम संविधान के प्रति अपनी निष्ठा का संकल्प दोहराते हैं. ऐसे में 26 नवंबर को संविधान के प्रति समर्पण को जाहिर करने के निर्णय के पीछे सरकार का क्या इरादा हो सकता है? सतही तौर पर यह एक देशभक्ति से भरा मामला प्रतीत होता है, पर असलियत में यह उस रस्सी की तरह है, जो सांप जैसा दिखायी देता है. यह एक मैकियावेलियन कोशिश है उस इतिहास को बनाने में अपनी भूमिका दर्ज कराने की, जिसमें अफसोसनाक तौर पर भाजपा और उसके पूर्ववर्ती अवतारों की कोई विशेष उपस्थिति नहीं रही है.
बाबासाहेब आंबेडकर की 125वीं जयंती वर्ष में उन्हें श्रद्धांजलि देने के आयोजन का हर राजनीतिक दल ने जोर-शोर से समर्थन किया है. आंबेडकर साहेब कठिनतम परिस्थितियों में मनुष्य के दृढ़ निश्चय और साहस की जीत के जीते-जागते उदाहरण हैं.
गहरी बौद्धिक क्षमता, महान अध्यावसाय, प्रतिबद्धता के महत्वपूर्ण साहस, और लोकतंत्र, समानता एवं सामाजिक न्याय के मूल्यों के सामने चुनौतियों के प्रति अद्भुत जागरूकता के साथ संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के मुखिया के रूप में उनकी भूमिका अमूल्य है.
लेकिन, जिस तरह से भाजपा ने अचानक आंबेडकर को खोज निकाला है, उससे सही मायनों में संदेह पैदा होता है. इस अति उत्साह के पीछे स्वतंत्रता आंदोलन के एक और महान विभूति को अपना बना लेने की कोशिश उस तथ्य की भरपाई करना है कि गुरु गोलवलकर की अगुवाई वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों का न तो अंगरेजों के खिलाफ संघर्ष में कोई योगदान रहा है और न ही भारत के गणतांत्रिक संविधान को बनाने में.
राजनीति ऐसे हथकंडों को भले ही सही ठहरा दे, लेकिन जिस आपाधापी में यह सब किया गया है, उससे किसी को ठगा नहीं जा सकता है. आंबेडकर यह माननेवाले पहले व्यक्ति थे, और यह उनकी महानता का सूचक है कि जिस संविधान के वे मुख्य रचयिता थे, वह स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक महान नेताओं के सामूहिक प्रयास का परिणाम था, जिसमें नेहरू भी शामिल थे, जिनको भाजपा कमतर दिखाने पर तुली हुई है, और यह संविधान समिति की गंभीर बैठकों और गहन विचार-विमर्श का संयुक्त प्रतिफलन था.
पिछले साल सत्ता में आने के बाद से भाजपा द्वारा इतिहास के पुनर्लेखन या उसे तोड़-मरोड़ कर पेश करने का यह पहला मौका नहीं है. पहले सरदार वल्लभभाई पटेल को लेकर ऐसा ही करने का प्रयास किया गया था. तब उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के सभी महान नेताओं से ऊपर स्थापित करने, और उनके पौरुष-भरी देशभक्ति की स्पष्ट समझ को पार्टी की अपनी छवि के प्रतिरूप के तौर पर दर्शाने की खुली कोशिश की गयी थी. इस नीति को लागू करने के लिए अनेक आयोजन किये गये, जिनमें सरदार की विशाल प्रतिमा का निर्माण भी शामिल था.
यह सब करते हुए भाजपा बहुत आसानी से भूल गयी कि जिन्हें वह अपना बनाने पर आमादा है, वे वही सरदार पटेल थे, जिन्होंने आरएसएस को प्रतिबंधित किया था, और जो यह मानते थे कि आरएसएस ने ऐसा माहौल बनाया था, जिसके कारण महात्मा गांधी की हत्या हुई थी. सरदार पटेल को इस संदर्भ में कोई भ्रम नहीं था, और आज वे भाजपा द्वारा इतिहास को फिर से लिखने की प्रक्रिया में उसकी ऐतिहासिक विस्मृति पर बहुत आश्चर्यचकित होते.
असली उद्देश्य को छुपाने के लिए धुंधला माहौल बनाने की यह दोहरी नीति संसद के दोनों सदनों में हुई संविधान पर दो दिन की बहस में भाजपा के हस्तक्षेप में पूरी तरह से दिखायी दे रही थी. राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मैत्रीपूर्ण, यहां तक कि राष्ट्रीय नेता के जैसा भाषण दिया, जबकि लोकसभा में उनके वरिष्ठतम सहयोगी गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने सीधे मुद्दे पर आते हुए संविधान के प्रति ‘पुनः प्रतिबद्धता’ अभिव्यक्त करते हुए प्रस्तावना में ‘सेक्युलर’ शब्द की जरूरत पर ही सवाल उठा दिया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि हमारा एकमात्र पवित्र पुस्तक संविधान है, पर वे गिरिराज सिंह, वीके सिंह, महेश शर्मा और साध्वी निरंजन जैसे अपने मंत्रिपरिषद् के सहयोगियों तथा साक्षी महाराज और योगी आदित्यनाथ जैसे सांसदों के बयानों और करतूतों पर चुप्पी साधे रहे, जिन्होंने संविधान में अंतर्निहित पावन मूल्यों की धज्जियां उड़ायीं. बात दरअसल यह है कि आप लोगों को एक या दो बार मूर्ख बना सकते हैं.
लेकिन, आप भले ही अपने को कितना भी चतुर क्यों न समझें, लोग आपसे अधिक चतुर हैं, और वे आपके दावं-पेंच को भली प्रकार समझते हैं. ऐसा लगता है कि भाजपा को अभी तक यह बात समझ में नहीं आयी है.
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