शिक्षा में ऐतिहासिक परिवर्तन!

Updated at : 04 Dec 2015 12:08 AM (IST)
विज्ञापन
शिक्षा में ऐतिहासिक परिवर्तन!

संदीप पांडेय सामाजिक कार्यकर्ता दिल्ली सरकार ने अखबारों में विज्ञापन दे कर यह दावा किया है कि वह दिल्ली की शिक्षा नीति में ऐतिहासिक परिवर्तन करने जा रही है. वह क्या-क्या करने जा रही है? पहला, वह निजी विद्यालयों के हिसाब-किताब की जांच करा कर यह देखेगी कि बच्चों से शुल्क के रूप में लिया […]

विज्ञापन

संदीप पांडेय

सामाजिक कार्यकर्ता

दिल्ली सरकार ने अखबारों में विज्ञापन दे कर यह दावा किया है कि वह दिल्ली की शिक्षा नीति में ऐतिहासिक परिवर्तन करने जा रही है. वह क्या-क्या करने जा रही है? पहला, वह निजी विद्यालयों के हिसाब-किताब की जांच करा कर यह देखेगी कि बच्चों से शुल्क के रूप में लिया गया पैसा बच्चों पर ही खर्च हो रहा है या नहीं. वह खुद कह रही है कि विद्यालय के आंतरिक मामलों में वह हस्तक्षेप नहीं करेगी.

यानी विद्यालय प्रबंधन पैसा कैसे खर्च कर रहा है, कौन-सी गतिविधियां करा रहा है, इससे उसे कोई मतलब नहीं. दूसरा, आठवीं कक्षा तक बच्चों को फेल न करने का जो निर्णय किया गया था, उसे वापस लिया जायेगा. क्योंकि, शिक्षा की गुणवत्ता पर इसका भारी असर पड़ा है. तीसरा, नर्सरी में दाखिले के वक्त न तो विद्यालय कोई चंदा मांग सकता है और न ही माता-पिता का साक्षात्कार कर सकता है.

चौथा, निजी विद्यालय के लिए अपने शिक्षकों को सरकारी शिक्षकों के बराबर वेतन देने के प्रावधान को खत्म किया जायेगा. क्योंकि, कुछ निजी विद्यालय इतना शुल्क नहीं लेते कि वे अपने यहां पढ़ानेवालों को सरकारी वेतन दे सकें. इससे निजी विद्यालयों में शिक्षकों का फर्जी वाऊचर पर हस्ताक्षर करा कर कम वेतन देनेेवाला शोषण बंद होगा. जिन शिक्षकों को वेतन आयोग के मानकों के अनुसार वेतन मिलता है, उन्हें वही मिलता रहेगा और शेष को कम से कम न्यूनतम वेतन दिलाया जायेगा.

अब यह पूछा जाना चाहिए कि इन चार प्रस्तावों में ऐतिहासिक क्या है? कुछ प्रस्ताव तो ऐसे हैं, जिनके लिए पहले से ही प्रावधान हैं. क्या विद्यालय के हिसाब-किताब की जांच नहीं करायी जा सकती? बच्चे के दाखिले के वक्त चंदा लेने या माता-पिता के साक्षात्कार पर पहले से ही रोक है. यदि दिल्ली सरकार को यह बात विज्ञापन में कहना पड़ रहा है, तो इसका मतलब दिल्ली में बड़े पैमाने पर इसका उल्लंघन हो रहा है और दिल्ली सरकार उसे रोक नहीं पा रही.

आठवीं तक बच्चों को फेल न किये जाने की नीति वापस लेना गरीब बच्चों के हित के खिलाफ है, जिनके माता-पिता अनपढ़ हैं अथवा कम पढ़े-लिखे हैं और जिनके पास इतना पैसा नहीं कि बच्चे को अलग से ट्यूशन पढ़ा सकें. शिक्षक इतना ज्यादा वेतन लेने के बाद भी कक्षाओं में पढ़ाते नहीं. पूरे पृष्ठ के विज्ञापन में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने पर कोई प्रस्ताव नहीं है.

शिक्षा और परीक्षा का कोई लेना-देना ही नहीं है. विज्ञापन में कहा गया है कि अभिभावकों की मांग है कि परीक्षा होनी चाहिए. अभिभावक तो यह भी कहेंगे कि जरूरत पर उनके बच्चे को मार-मार कर पढ़ाया जाये. परीक्षा न लेने का यह मतलब नहीं है कि शिक्षक पढ़ाना ही बंद कर दें. बल्कि, अब तो उन्हें और तत्परता से पढ़ाना चाहिए, क्योंकि उनका बोझ कुछ कम हो गया है और उन्हें इस बात पर ध्यान देना है कि बिना परीक्षा दिये भी बच्चा विषय को सीखे. शिक्षकों की कामचोरी का खामियाजा बच्चे क्यों भुगतें?

उपर्युक्त विज्ञापन असल में निकाला गया है चाैथे प्रस्ताव के लिए, ताकि निजी विद्यालय अपने शिक्षकों का शोषण करने को जायज ठहरा सकें. दिल्ली सरकार को तो उन विद्यालयों से, जो सरकारी वेतन नहीं दे पा रहे हैं, पूछना चाहिए कि यदि वे पूरा वेतन नहीं दे सकते, तो विद्यालय चला ही क्यों रहे हैं?

बड़ी मुश्किल से सभी विद्यालयों के लिए शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत समान मानक लागू किये गये हैं. दिल्ली सरकार उसे उलटना चाहती है. क्या कम वेतन पानेवाले शिक्षकों में एक प्रकार का असंतोष नहीं पनपेगा या वे हीन भावना से ग्रस्त नहीं होंगे?

दिल्ली सरकार को इसकी ज्यादा ही चिंता है कि निजी विद्यालय अपने शिक्षकों को सरकारी वेतन नहीं दे पा रहे, तो वह क्यों नहीं दिल्ली के निजी विद्यालयों का सरकारीकरण कर दे रही है? इससे अरसे से लंबित चली आ रही जनता की समान शिक्षा प्रणाली की मांग, कि सभी बच्चे एक जैसी शिक्षा व्यवस्था में पढ़ें, भी पूरी हो जायेगी. दुनिया के जिन देशों में भी 99-100 प्रतिशत साक्षरता दर हासिल की गयी है, वह सरकारी शिक्षा व्यवस्था से ही हुआ है. यदि दिल्ली सरकार यह काम कर देती है, तो बाकी राज्य सरकारों और केंद्र सरकार पर भी दबाव बनेगा कि वे 1968 की कोठारी आयोग की समान शिक्षा प्रणाली और पड़ोस के विद्यालय की अवधारणा की सिफारिशों को लागू करें.

यदि पूरे विद्यालय का सरकारीकरण न भी करना चाहें, तो कम से कम उसके प्रशासनिक हिस्से का तो कर ही सकते हैं, जिसके बाद शिक्षा विभाग का एक कर्मचारी हरेक विद्यालय में बैठने लगे, जो वहां यह सुनिश्चित करे कि किसी सरकारी नियम-कानून का उल्लंघन न हो. बाकी विद्यालय का प्रबंधन तंत्र पहले की तहत काम करता रह सकता है. क्या अरविंद केजरीवाल इस ऐतिहासिक कदम को उठा सकते हैं?

विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola