चेन्नई की सीख

‘तावत भयात् भेतव्यम् यावत भयं अनागतं’- चाणक्य नीति है कि भय के कारण तब तक डरा जा सकता है, जब तक वह आपके सम्मुख आ न खड़ा हो. भय का कारण ठीक आंखों के आगे हो, तो फिर पूरी शक्ति से उसका प्रतिकार ही एकमात्र उपाय है. लेकिन, चेन्नई में आयी भयानक बाढ़ के मामले […]
‘तावत भयात् भेतव्यम् यावत भयं अनागतं’- चाणक्य नीति है कि भय के कारण तब तक डरा जा सकता है, जब तक वह आपके सम्मुख आ न खड़ा हो. भय का कारण ठीक आंखों के आगे हो, तो फिर पूरी शक्ति से उसका प्रतिकार ही एकमात्र उपाय है. लेकिन, चेन्नई में आयी भयानक बाढ़ के मामले में ये दोनों बातें सिरे से गायब दिखती हैं. तमिलनाडु प्रशासन ना तो समय रहते भय के कारण यानी बाढ़ से डरा और ना बाढ़ के आ जाने पर उसे प्रतिकार के जरूरी उपाय ही सूझ रहे हैं.
चेन्नई की बाढ़ के मामले में राज्य का प्रशासन पानी के िसर के ऊपर चढ़ आने तक आंखें मूंदे रहा. भयावह बाढ़ से खुद केंद्रीय गृहमंत्री के अनुसार, अब तक चेन्नई में 269 लोगों की मौत हो चुकी हैं, कुछ रिपोर्टों में यह संख्या 325 बतायी गयी है. चेन्नई की 60 प्रतिशत आबादी निजात की राह टोह रही है. एयरपोर्ट बंद है, चेन्नई होकर आने-जानेवाली रेलगाड़ियां रद्द की जा रही हैं. संचार का पूरा नेटवर्क एकबारगी ढह गया है. लेकिन, विपदा की इस घड़ी में तमिलनाडु के नीति-नियंता आपसी दोषारोपण में उलझे हैं.
सत्ताधारी ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एडीएमके) के नेतृत्व वाला चेन्नई का निगम कह रहा है कि बारिश का पानी अगर महानगर से नहीं निकल पा रहा, तो इसका दोष द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के नेतृत्व में बनी पिछली सरकार का है. तर्क है कि डीएमके की ही सरकार ने हाथ से नालियों की गंदगी साफ करने के चलन को खत्म किया और इसी वजह से नालियों की सफाई बंद पड़ी है.
भले चेन्नई में उत्तर-पूर्वी मॉनसून ने इस साल बारिश का सौ वर्षों का रिकार्ड तोड़ दिया हो, लेकिन इस मौसम में भारी बारिश चेन्नई के लिए अप्रत्याशित नहीं है. स्वयं मुख्यमंत्री जयललिता इस बात को स्वीकार कर चुकी हैं और शोध-अध्ययन भी बताते हैं कि दस वर्षों में एक बार चेन्नई और आस-पास के इलाके भारी बारिश की चपेट में आते हैं.
अगर ऐसा है, तो चेन्नई नगर-निगम, नगर-योजना के प्रशासकों और स्वयं तमिलनाडु सरकार को जरूरी उपाय करने से किसने रोका था? चेन्नई की मौजूदा विपदा की असल वजह भारी बारिश नहीं, बल्कि कुछ और है. इस वजह की तरफ मद्रास हाइकोर्ट ने बीते नवंबर महीने के अंतिम हफ्ते में अपने एक फैसले में इशारा किया था. कोर्ट ने कहा कि हाल की बाढ़ में हुए नुकसान का कारण संरक्षित जलागारों, जल-निकास के परंपरागत मार्गों और स्रोतों के साथ छेड़छाड़ करना है. कोर्ट ने यह फैसला एक जनहित याचिका पर सुनाया था.
जनहित याचिका में गुहार थी कि जो झीलें सूख गयी हैं और जिन जलागारों का सूख जाने के कारण इस्तेमाल बंद है, वहां अवैध रूप से घर बना कर रह रहे लोगों को जमीन का पट्टा दिया जाये. कोर्ट ने याचिका निरस्त कर दी और याची को नसीहत दी कि सत्तासीन लोग परंपरागत जलमार्गों और जलागारों को नष्ट नहीं कर सकते और ना ही उनके परंपरागत उपयोग को किसी अन्य उपयोग में बदल सकते हैं.
ये सब प्रकृति के उपहार हैं, अनंतकाल तक मानवता की भलाई के लिए मिले हैं और एक दफे नष्ट हो गये, तो फिर हासिल नहीं होनेवाले. कोर्ट ने जो नसीहत के रूप में कहा, तमिलनाडु के सत्तासीनों ने बीते दो दशकों में उसकी खुलेआम धज्जियां उड़ायी हैं. आधारभूत संरचना के निर्माण और विकास के तर्क से चेन्नई को कुछ इस तरह से स्मार्ट शहर में तब्दील करने की कोशिशें हुई हैं कि कभी वहां 150 प्राकृतिक जलागार थे, जो घट कर बस 27 की संख्या में रह गये हैं.
पानी की निकासी का मार्ग अवरुद्ध हो और पानी जहां निकल कर अपना भंडार बनाता है, वह भंडारघर ही खत्म कर दिया जाये, तो फिर पानी और कहां ठहरेगा, सिवाय लोगों के घरों, नगर की सड़कों और सार्वजनिक जनजीवन को चलानेवाली दफ्तरों के? शुक्र है कि केंद्र सरकार ने सुध ली है, राहत कार्य में फौज की मदद ली जा रही है, केंद्र ने 904 करोड़ राहत-कार्य के लिए दिये हैं और प्रधानमंत्री स्वयं हालत का जायजा लेने चेन्नई पहुंचे हैं. लेकिन, यह सब पानी के सर से ऊपर गुजर जाने के बाद की बातें हैं.
चेन्नई से पहले कश्मीर, असम, उत्तराखंड में देश ने अनियंत्रित और जलवायु-परिवर्तन के प्रति असंवेदनशील विकास की भयावहता को बाढ़ की शक्ल में देखा है. और, यह वक्त समय रहते अनियंत्रित, अनियोजित विकास के नतीजों के प्रति सब भांति सचेत होने का है.
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