सरकारी शिक्षा प्रणाली में ही खोट

भारत सरकार ने देश की साक्षरता स्तर को बढ़ाने के लिए शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 को पूरे देश में लागू किया. इसके तहत उन सभी कार्यक्रमों को शामिल गया, जिससे सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या में वृद्धि की जा सके. कुछ हद तक तो ये कार्यक्रम सफल भी हुए और कुछ साक्षरता स्तर में […]
भारत सरकार ने देश की साक्षरता स्तर को बढ़ाने के लिए शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 को पूरे देश में लागू किया. इसके तहत उन सभी कार्यक्रमों को शामिल गया, जिससे सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या में वृद्धि की जा सके. कुछ हद तक तो ये कार्यक्रम सफल भी हुए और कुछ साक्षरता स्तर में संख्याबल को मजबूत करने में सहायक साबित हुए.
प्रावधान के तहत सरकारी स्कूलों में एक पहर के भोजन की व्यवस्था, शिक्षा संबंधी आधारभूत सेवाओं की व्यवस्था, स्कूल छोड़ चुके बच्चों को वापस लाना आदि शामिल था. ये व्यवस्थाएं कुछ हद तक उचित मानी जा सकती हैं, लेकिन कहीं न कहीं ये सभी प्रावधान शिक्षा के बुनियादी स्तर को मजबूत करने में विफल साबित हुए हैं, तभी तो सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या में और शिक्षा के स्तर में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है.
एक ओर साक्षरता स्तर को बढ़ाने के प्रयास में लागू किये गये अधिनियम ने बच्चों के संपूर्ण भविष्य को अधर में डाल दिया है, क्योंकि इसके तहत माध्यमिक स्तर के बच्चों को किसी भी सूरत में फेल करने का प्रावधान नहीं है. वहीं दूसरी ओर, इस नीति ने शिक्षा को दो खेमों में बांट दिया है. मातृभाषा में पढ़ना-लिखना साक्षरता की श्रेणी में आता है, लेकिन उच्च शिक्षा प्राप्त कर नैतिक गुणों और सभ्यताओं के आधार पर देश, समाज और परिवार की जिम्मेदारी संभालना शिक्षित की श्रेणी में आता है. आम तौर पर आधुनिक परिवेश में बच्चे स्कूल जाने के पूर्व ही अक्षर ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं. स्कूलों में तो उससे आगे की पढ़ाई शुरू की जाती है. ऐसे में यदि सरकारी स्कूलों मे सिर्फ बच्चों को साक्षर बनाने के लिए अरबों रुपये पानी की तरह बहाये जा रहे हैं, तो यह बात समझ से परे है.
अंजलि कुमारी, रांची
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