पेरिस की चुनौती

Updated at : 30 Nov 2015 11:45 AM (IST)
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पेरिस की चुनौती

प्रधानमंत्री ने अपने रेडियो संबोधन ‘मन की बात’ में जलवायु परिवर्तन के खतरों को एक बार फिर चिन्हित किया है और प्राकृतिक आपदाओं तथा उनसे होनेवाली तबाही की रोकथाम के लिए गंभीर कोशिशों की जरूरत पर बल दिया है. उन्होंने उचित ही कहा है कि गांवों से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण व […]

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प्रधानमंत्री ने अपने रेडियो संबोधन ‘मन की बात’ में जलवायु परिवर्तन के खतरों को एक बार फिर चिन्हित किया है और प्राकृतिक आपदाओं तथा उनसे होनेवाली तबाही की रोकथाम के लिए गंभीर कोशिशों की जरूरत पर बल दिया है. उन्होंने उचित ही कहा है कि गांवों से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण व ऊर्जा संरक्षण से जुड़े मसलों पर जागरूकता और आपसी सहयोग बढ़ाने के साथ वैकल्पिक उपाय अपनाने की दिशा में गंभीर प्रयास करने होंगे. सोमवार से ही फ्रांस की राजधानी पेरिस में दुनियाभर के राजनेता, प्रशासक, विशेषज्ञ और वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन के लिए जमा हो रहे हैं. इस सम्मेलन में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को सीमित करने के लिए उपायों पर चर्चा होगी और सर्वसम्मति के साथ एक वैश्विक समझौते को अंजाम दिया जायेगा. भारत ने अपनी ओर से कार्बन उत्सर्जन में 30 से 35 फीसदी कटौती की बात कही है.

साथ ही, ऊर्जा के लिए कार्बन-आधारित स्रोतों के इस्तेमाल को सीमित करने के उद्देश्य से 2030 तक देश के बिजली उत्पादन का 40 फीसदी हिस्सा सौर और पवन ऊर्जा से पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है. अभी भारत में बिजली का 60 फीसदी उत्पादन कोयले से होता है. कार्बन प्रदूषित वायु के शोधन में वनों की महती भूमि का होती है. विगत कुछ दशकों से आबादी बढ़ने, अधिक उद्योग लगाने, खनन बढ़ने तथा विकास परियोजनाओं के कारण देश में वन-क्षेत्रों का बड़ा नुकसान हुआ है. इसकी भरपाई के लिए भारत ने 2.5 से तीन टन कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने के लिए जंगल लगाने का निर्णय किया है. एक आकलन के मुताबिक, इस कार्य पर लगभग 14 लाख करोड़ रुपये का खर्च आयेगा. अभी भारत का वार्षिक कार्बन उत्सर्जन डेढ़ बिलियन टन है, जो 2020 तक 5.5 बिलियन टन तक पहुंच सकता है.

पेरिस शिखर सम्मेलन से पहले भारत और अमेरिका में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को रोकने के मामले में गंभीरता को लेकर तल्ख बयानबाजी हो चुकी है. अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने सम्मेलन में भारतीय रुख को लेकर आशंका जतायी थी, जिसके जवाब में भारतीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने स्पष्ट कहा था कि हम सकारात्मक दृष्टि कोण के साथ सम्मेलन में जा रहे हैं और विश्व समुदाय के साथ पूरा सहयोग करने की उनकी प्रतिबद्धता है. माना जा रहा है कि सम्मेलन में ऊर्जा की खपत को लेकर विकसित औरविकासशील देशों में तनातनी हो सकती है. विकासशील देशों पर अधिक दबाव उनके विकास पर प्रतिकूल असर डाल सकता है. इस कारण भारत ने यह मांग की है कि विकसित देश अगर जलवायु परिवर्तन की समस्या को लेकर सचमुच गंभीर हैं, तो उन्हें विकासशील देशो को पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी सहायता मुहैया कराना होगा.

यह भी उल्लेखनीय है कि कार्बन उत्सर्जन के लिए विकसित देश मुख्य रूप से जिम्मेवार है. भारत ने इस तथ्य को रेखांकित किया है कि विगत डेढ़ सदी के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका द्वारा 18 फीसदी, यूरोप द्वारा 21 फीसदी और चीन द्वारा 10 फीसदी के करीब कार्बन का उत्सर्जन हुआ है. दुनिया की 20 फीसदी आबादी भारत में बसती है, पर इस श्रेणी में उसका हिस्सा महज 2.5 फीसदी ही है. आशा है कि भारत की आवाज को विभिन्न विकासशील देशों का समर्थन मिलेगा और सम्मेलन एक संतुलित निष्कर्ष तक पहुंच सकेगा. मौसम के बदलते मिजाज के खतरे को इसी तथ्य से समझा जा सकता है कि बीते दो दशकों में दुनियाभर में हुईं प्राकृतिक आपदाओं में 90 फीसदी मौसम से संबंधित थीं. पिछले सप्ताह संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी एक अध्ययन के मुताबिक, इन आपदाओं में करीब छह लाख लोग मारे गये हैं और चार अरब लोग प्रभावित हुए हैं. आर्थिक स्तर पर नुकसान 250 से 300 बिलियन डॉलर आंका गया है.

भारत और चीन समेत विकासशील देशों में सघन आबादी होने के कारण तबाही अपेक्षाकृत अधिक भयावह होती है. एशिया महादेश प्राकृतिक आपदाओं का सबसे बड़ा भुक्त भोगी भी है. बहरहाल, पेरिस सम्मेलन में भारत की भूमि का कई कारणों से बहुत महत्वपूर्ण है. तेज गति से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था का देश होने के नाते उसे अपनी जरूरतों और मुश्किलों को भी ध्यान में रखना है तथा वैश्विक पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी गतिविधियों में अपेक्षित भूमि का भी निभानी है. इस लिहाज से यह अवसर कूटनीतिक और राजनीतिक तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बड़ी चुनौती भी है. यह वैश्विक नेताओंके लिए भी परीक्षा की घड़ी है. क्योंकि, अगर पेरिस सम्मेलन बिना किसी ठोस निष्कर्ष के संपन्न हो गया, तो यह जलवायु संकट से निबटने के प्रयासों पर आत्मघाती कुठाराघात होगा.

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