भुक्तभोगी जनता

Updated at : 19 Oct 2015 2:00 AM (IST)
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भुक्तभोगी जनता

कॉलेजियम प्रणाली और न्यायिक नियुक्ति आयोग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय, कार्यपालिका और विधायिका में पिछले कई महीने से चली आ रही खींचतान के कारण उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति का काम रुका हुआ था. सर्वोच्च न्यायालय ने संसद द्वारा पारित आयोग की स्थापना के कानून को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया है, पर […]

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कॉलेजियम प्रणाली और न्यायिक नियुक्ति आयोग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय, कार्यपालिका और विधायिका में पिछले कई महीने से चली आ रही खींचतान के कारण उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति का काम रुका हुआ था. सर्वोच्च न्यायालय ने संसद द्वारा पारित आयोग की स्थापना के कानून को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया है, पर उसके सामने बहुत जल्दी खाली पदों को भरने की चुनौती है.

देश में कार्यरत 24 उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 1,017 है, किंतु फिलहाल 611 न्यायाधीश ही सेवारत हैं. कानून मंत्रालय के न्याय विभाग के आंकड़े के मुताबिक एक अक्तूबर तक 406 पद रिक्त हैं. चूंकि उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के मुख्य न्यायाधीश पद पर वरिष्ठता के अनुसार पदोन्नत करने की व्यवस्था नहीं है, इस कारण गौहाटी, गुजरात, कर्नाटक, पटना, पंजाब एवं हरियाणा, राजस्थान तथा आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना उच्च न्यायालयों में पूर्णकालिक मुख्य न्यायाधीश नहीं हैं. मेघालय, सिक्किम और त्रिपुरा को छोड़कर शेष सभी 21 उच्च न्यायालयों में रिक्तियां हैं.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में तो 85 न्यायाधीशों की कमी है. स्वाभाविक रूप से इस स्थिति का खामियाजा जनता को ही उठाना पड़ता है. मामलों के लंबित पड़े रहने से जहां मुकदमों से संबंधित लोगों को मानसिक और आर्थिक परेशानी उठानी पड़ती हैं, वहीं अनिर्णय के कारण भविष्य की अनिश्चितता बनी रहती है. वर्ष 2013 तक उच्च न्यायालयों में 44.5 लाख मुकदमे लंबित थे. पिछले डेढ़ सालों में यह संख्या बढ़ी ही है.

सबसे अधिक लंबित मामले इलाहाबाद उच्च न्यायालय में हैं जहां न्यायाधीशों की रिक्तियां भी सबसे अधिक हैं. वर्ष 2013 तक के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इलाहाबाद उच्च न्यायालय में 3,47,967 मामले विचाराधीन हैं. सर्वोच्च न्यायालय से लेकर निचली अदालतों तक लंबित मुकदमों की संख्या तीन करोड़ से अधिक है. प्रसिद्ध कहावत है कि न्याय में देरी करना न्याय देने से इंकार करना है.

कॉलेजियम प्रणाली की फिर से बहाली के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर सरकार के आधिकारिक प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा है. न्याय व्यवस्था की कमियों को दूर करने की सामूहिक जिम्मेवारी राज्य के तीनों अंगों- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका- की है. सरकार और न्यायालय में रस्साकशी के बावजूद यह उम्मीद जरूर है कि ये तीनों अंग परिपक्वता के साथ तुरंत सकारात्मक पहल कर मौजूदा असमंजस की स्थिति को दूर करने का प्रयास करेंगे ताकि जनता को मुश्किलों से निजात मिल सके.

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