किसका विकास और कैसा विकास?

Updated at : 12 Oct 2015 1:14 AM (IST)
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किसका विकास और कैसा विकास?

केंद्र की राजनीति में हिंदी प्रदेश के चार क्षेत्रीय दलों- जदयू, राजद, सपा, बसपा की विशेष भूमिका रही है. जिस विकास की बात कही जा रही है, उसके भावी परिणामों को कहीं अधिक समझने की जरूरत है. क्या बिहार चुनाव ‘शैतान’ और ‘ब्रह्मपिशाच’ के बीच या ‘जंगलराज’ और ‘विकासराज’ के बीच हो रहा है? विकास […]

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केंद्र की राजनीति में हिंदी प्रदेश के चार क्षेत्रीय दलों- जदयू, राजद, सपा, बसपा की विशेष भूमिका रही है. जिस विकास की बात कही जा रही है, उसके भावी परिणामों को कहीं अधिक समझने की जरूरत है.

क्या बिहार चुनाव ‘शैतान’ और ‘ब्रह्मपिशाच’ के बीच या ‘जंगलराज’ और ‘विकासराज’ के बीच हो रहा है? विकास की चिंता करनेवालों की भाषा अशालीन और निम्नस्तरीय नहीं हो सकती. हमारी भाषा हमारे स्वभाव, मिजाज और विचार को प्रकट करती है. प्रहारक भाषा हमारी विचारशून्यता, विवेकहीनता का प्रमाण है. नरेंद्र मोदी ने अपनी भाषा से राजनीतिक भाषा का एक नया अध्याय आरंभ किया है. राष्ट्रीय राजनीति में आने और प्रधानमंत्री बनने तक उनकी भाषा ऐसी आक्रामक नहीं थी. क्या इसका संबंध आक्रामक विकास से स्थापित किया जा सकता है? आक्रामक विकास से हमारा आशय उस विकास से है, जो अपने मार्ग में आनेवाले समस्त अवरोधों को समाप्त कर डालता है. इससे किसी को अापत्ति नहीं हो सकती कि भारत का विकास आवश्यक है, पर किसका विकास? कैसा विकास? विकास चुनावी झुनझुना नहीं है, जिससे मतदाताओं को लुभा कर, बहला कर, फुसला कर, उनका मत हासिल कर सत्ता पर काबिज हुआ जाये.

क्या पूंजीवादी व्यवस्था में ‘सबका साथ सबका विकास’ संभव है? यह मात्र चुनावी जुमला है, और जुमलों से हमेशा चुनाव भी नहीं जीता जा सकता. विकास की बात तो दूर रही. यहां ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ की बात न कह कर ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ की बात कही गयी है. क्या अंबानी-अडानी और फटेहालों-बदहालों का एक साथ विकास संभव है? क्या अमीरों और गरीबों के एक साथ समान विकास का कोई अर्थशास्त्रीय सिद्धांत है? बिहार चुनाव में गोमांस और अन्य कुछ मुद्दों को छोड़ दें, तो केवल एक शब्द की गूंज है- वह शब्द है ‘विकास’. मोदी अब कहीं गुजरात मॉडल की बात नहीं करते. गुजरात मॉडल के साथ अब हार्दिक पटेल भी हैं. विकास एकपक्षीय और एकायामी नहीं होता. विकास का अर्थ व्यापक है. आर्थिक विकास, बौद्धिक विकास से जुड़ा है. विकास को केवल आर्थिकी में सीमित करना ज्ञान के विविध क्षेत्रों से मुंह फेरना है. जहां तक आर्थिक विकास का प्रश्न है, मोदी की विकास नीति गरीबों, सामान्यजनों, किसानों और मजदूरों के लिए नहीं है. यह नीति कुटिल नीति है, भ्रम पैदा करनेवाली है. बड़े उद्योगपतियों, पूंजीपतियों, कॉरपोरेटों के पक्ष में निर्मित नीतियां सामान्यजनों के लिए हितकारी होने का मात्र भ्रम पैदा कर सकती हैं. मोदी को राष्ट्रीय राजनीति में लाने, चुनाव जिताने, प्रधानमंत्री बनाने में कॉरपोरेटों की भूमिका रही है. कॉरपोरेटों ने ही सर्वप्रथम उन्हें प्रधानमंत्री बनाये जाने की बात कही थी. आज भी भारत की साठ प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है, बिहार कृषि प्रधान राज्य है. जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में अब कृषि क्षेत्र की भागीदारी मात्र बारह प्रतिशत है. अर्थव्यवस्था में किसानों की बड़ी भूमिका नहीं है. नवउदारवादी अर्थव्यवस्था कृषक-विरोधी है. बिहार का विकास कृषक और कृषि की अनदेखी कर नहीं हो सकता. मोदी और नीतीश के विकास-मंत्र में अंतर है. नीतीश की विकास-नीति में गरीब-गुरबा, गांव-कस्बा, खेती-किसानी, दलित-महादलित सब शामिल हैं.

अपने चुनावी भाषणों में मोदी ने बिहार में सत्ता में आने पर राज्य की सूरत बदल देने की बात कही है. उनका आशय बिहार को ‘बीमारू राज्य’ से विकसित राज्य में बदलने का है. आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र विकसित राज्य हैं, जहां किसानों ने सबसे अिधक संख्या में आत्महत्याएं की हैं. ये तीनों राज्य ‘बीमारू’ राज्य नहीं हैं. मोदी नवउदारवादी अर्थव्यवस्था को ‘एनिमल स्पिरिट’ से लागू करने को तत्पर हैं. इस नवउदारवादी अर्थव्यवस्था में ही किसानों और सामान्यजनों की हालत बदतर हुई है. अरबपतियों की संख्या बढ़ी है. 1991 में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की रिपोर्ट में कर्ज में डूबे किसान परिवारों की संख्या 26 प्रतिशत थी, जो 2003 में बढ़ कर 48.6 प्रतिशत हो गयी. 1995 से 2010 के बीच देश के 15 राज्यों में किसानों की आत्महत्या में बिहार सबसे अंतिम स्थान पर था, 1,235 की संख्या के साथ, जबकि गुजरात दसवें स्थान पर था. गुजरात में 8,783 किसानों ने आत्महत्या की थी. 2001 से 2010 के बीच मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. इस अवधि में भी गुजरात पंद्रह राज्यों में दसवें स्थान पर था, जहां 5,324 किसानों ने आत्महत्या की थी. तब इन पंद्रह राज्यों में बिहार नहीं था. नवउदारवादी अर्थव्यवस्था ने भारतीय समाज में परिवर्तन ला दिया है, ‘जिसमें बस वही दमकता है, जो काला है.’

जीडीपी विकास का पैमाना नहीं है. वास्तविक और समग्र विकास का उससे कोई संबंध नहीं है. मुंगेर के चुनावी भाषण में मोदी ने ‘विकास’ को अपना मुख्य एजेंडा माना. देश-विदेश की आंखें बिहार चुनाव पर कई कारणाें से टिकी हुई हैं. बिहार में राजग के चुनाव जीतने के बाद उत्तर प्रदेश मुख्य निशाने पर होगा. राष्ट्रीय दलों में अब केवल भाजपा है, अन्य दल बस कहने के लिए हैं. हिंदी प्रदेश भाजपा का गढ़ है. इसे हिंदू मानस में बदलने की लंबे समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तैयारी कर रहा है. वह बहुत हद तक सफल हो भी चुका है.

बिहार में राजग की जीत के बड़े गहरे मायने होंगे. क्या बिहार के मतदाता देश को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहेंगे? राज्यसभा में बहुमत के बाद और राष्ट्रपति पद पर किसी स्वयंसेवक-प्रचारक को बिठाने के बाद क्या बचेगा? केंद्र की राजनीति में हिंदी प्रदेश के चार क्षेत्रीय दलों- जदयू, राजद, सपा, बसपा की विशेष भूमिका रही है. जिस विकास की बात कही जा रही है, उसके भावी परिणामों को कहीं अधिक समझने की जरूरत है. भाजपा सांस्कृतिक विविधता, बहस, असहमति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करती है. नरेंद्र दाभोलकर, गोबिंद पनसारे और कुलबुर्गी की हत्या का भाजपा और संघ-परिवार ने विरोध नहीं किया. भाजपा का रिमोट कंट्रोल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पास है. असहमति और विरोध के स्वरों को दबा कर विकास की बात करना जनता को धोखा देना है.

रविभूषण
वरिष्ठ साहित्यकार
delhi@prabhatkhabar.in

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