आदर्श और व्यवहार

Updated at : 12 Oct 2015 1:10 AM (IST)
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आदर्श और व्यवहार

स्वतंत्र भारत के सात दशकों के लोकतांत्रिक इतिहास में आपातकाल और उसके विरुद्ध चले आंदोलन का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है. सुदीर्घ स्वतंत्रता संग्राम के बाद जीती गयी आजादी के आदर्शों और संवैधानिक राजनीतिक व्यवस्था पर घातक हमले के रूप में आपातकाल आया था. लेकिन, उन 19 महीनों के व्यापक संघर्ष ने देश में लोकतंत्र को […]

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स्वतंत्र भारत के सात दशकों के लोकतांत्रिक इतिहास में आपातकाल और उसके विरुद्ध चले आंदोलन का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है. सुदीर्घ स्वतंत्रता संग्राम के बाद जीती गयी आजादी के आदर्शों और संवैधानिक राजनीतिक व्यवस्था पर घातक हमले के रूप में आपातकाल आया था. लेकिन, उन 19 महीनों के व्यापक संघर्ष ने देश में लोकतंत्र को फिर से बहाल करने में सफलता प्राप्त की थी.

संपूर्ण क्रांति के नारे के साथ इस संघर्ष को नेतृत्व लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने दिया था. उनकी 131वीं जयंती के अवसर पर उस आंदोलन को याद करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उचित ही कहा है कि हमें लोकतंत्र को उत्तरोत्तर सशक्त करने के लिए आपातकाल और उसके विरुद्ध संघर्ष को सदैव स्मरण में रखने के आवश्यकता है.

उन्होंने इस बात को भी रेखांकित किया कि जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले संपूर्ण क्रांति आंदोलन ने एक नयी राजनीतिक पीढ़ी को पैदा किया जो लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति समर्पित है. इतिहास सिर्फ स्मृतियों और श्रद्धांजलियों का गुलदस्ता भर नहीं होता है. वह चिंतन और समीक्षा का मंच भी है. आपातकाल के विरोध का आधार वे मूल्य थे जिन्हें हमारे राष्ट्रनिर्माताओं ने आजादी की लड़ाई में गढ़ा था और जिनकी अभिव्यक्ति हमारे संविधान में हुई है. वर्ष 1975 का आंदोलन सिर्फ सत्ता के दमनकारी चरित्र का विरोध ही नहीं था, वह जनता की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं के प्रति सत्ता की जवाबदेही सुनिश्चित करने का भी आंदोलन था. निश्चित रूप से यह बड़े चिंता की बात है कि लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की मजबूती और आर्थिक समृद्धि के विस्तार के बावजूद संपूर्ण क्रांति और जयप्रकाश नारायण के आदर्शों पर वह राजनीतिक पीढ़ी पूरी तरह खरी नहीं उतर सकी है जिसका उद्भव उस आंदोलन की बुनियाद पर हुआ.

यह बात संपूर्ण क्रांति की विरासत पर दावा कर रहे विभिन्न दलों और विचारधाराओं में बंटे उस पूरी पीढ़ी पर लागू होती है. महापुरुषों के योगदान और संघर्षों के इतिहास के मील के पत्थर कृतज्ञता ज्ञापन के रस्म अदायगी के मौके भर नहीं होने चाहिए. उनके आदर्श और मूल्य देश के सार्वजनिक जीवन और राजनीतिक आचार-व्यवहार का अहम हिस्सा बनने चाहिए. राजनेताओं और दलों के साथ इस उत्तरदायित्व में नागरिकों की भी सजग और सकारात्मक भागीदारी जरूरी है. देश के समक्ष जो राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां हैं, उनके सार्थक समाधान के लिए जयप्रकाश नारायण जैसे महापुरुषों के विचारों को व्यवहार में परिणत करना आवश्यक है.

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