...तो ऐसे कैसे पढ़ेंगी देश की बेटियां?
Updated at : 10 Oct 2015 1:16 AM (IST)
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की बेटियों के विकास के लिए उन्हें शिक्षित करने पर जोर दिया है. उनका नारा है ‘पढ़ेंगी बेटियां, तो आगे बढ़ेंगी बेटियां,’ लेकिन हर साल स्कूलों की पढ़ाई छोड़नेवाली बेटियों के आंकड़े एक अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं. भारत में छह से 14 आयुवर्ग के बच्चों को मुफ्त और […]
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की बेटियों के विकास के लिए उन्हें शिक्षित करने पर जोर दिया है. उनका नारा है ‘पढ़ेंगी बेटियां, तो आगे बढ़ेंगी बेटियां,’ लेकिन हर साल स्कूलों की पढ़ाई छोड़नेवाली बेटियों के आंकड़े एक अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं. भारत में छह से 14 आयुवर्ग के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के लिए भले ही आरटीइ लागू हो चुका हो, लेकिन इस आयुवर्ग की लड़कियों में से 40 फीसदी हर साल स्कूल जाना छोड़ रही हैं.
जाहिर है कि इस तरह से देश की आधी लड़कियां शिक्षा के अधिकार और कानून से बेदखल हो रही हैं. यह आंकड़ा मोटे तैर पर दो सवाल पैदा करते हैं. पहला यह कि इस आयुवर्ग के बच्चों में से आधी लड़कियां स्कूल छोड़ क्यों रही हैं? दूसरा यह है कि इस लड़कियों का स्कूल छोड़ देने पर मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार कानून का औचित्य क्या है?
अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कह देने भर से बच्चों को इसका अधिकार नहीं मिल जायेगा, बल्कि देखना होगा कि मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा के अधिकार के अनुकूल खास तौर से लड़कियों के लिए भारत में शिक्षा की बुनियादी संरचना है भी या नहीं. आज 6 से 14 साल तक के तकरीबन 20 करोड़ भारतीय बच्चों के प्राथमिक शिक्षा के लिए पर्याप्त स्कूल, कमरे, प्रशिक्षित शिक्षक और गुणवतायुक्त सुविधाएं नहीं है.
भारतीय शिक्षा पद्धति, शिक्षकों की कार्यप्रणाली एवं पाठ्यक्रमों की दोबारा समीक्षा की जाये. लड़कियों की शिक्षा से जुड़ी हुई इन तमाम बाधाओं को सोचे- समझे और तोड़े बगैर शिक्षा के अधिकार का बुनियादी मकसद पूरा नहीं हो सकता. सरकार इस नियम के क्रियान्वयन के बाद स्कूलों की दशा-दिशा पर भी ध्यान दे तथा स्कूली बच्चों में पढ़ाई का माहौल उपलब्ध कराये.
-मनोरथ सेन, जामताड़ा
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