मानसिक स्वास्थ्य का निदान कब!

Updated at : 09 Oct 2015 6:51 AM (IST)
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मानसिक स्वास्थ्य का निदान कब!

मुकुल श्रीवास्तव प्राध्यापक एवं लेखक विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत 36 प्रतिशत की अवसाद दर के साथ विश्व के सर्वाधिक अवसादग्रस्त देशों में से एक है. भारत में मानसिक अवसाद से पीड़ित लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है. मानव संसाधन के लिहाज से ये आंकड़े किसी भी देश के लिए अच्छे नहीं कहे […]

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मुकुल श्रीवास्तव
प्राध्यापक एवं लेखक
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत 36 प्रतिशत की अवसाद दर के साथ विश्व के सर्वाधिक अवसादग्रस्त देशों में से एक है. भारत में मानसिक अवसाद से पीड़ित लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है. मानव संसाधन के लिहाज से ये आंकड़े किसी भी देश के लिए अच्छे नहीं कहे जायेंगे, जहां हर चार में से एक महिला और दस में से एक पुरुष इससे पीड़ित हो.
समाजशास्त्रीय नजरिये से देखा जाये, तो यह प्रव्रत्ति हमारे सामाजिक ताने-बाने के बिखरने की ओर इशारा कर रही है. बढ़ता शहरीकरण और एकल परिवारों की बढ़ती संख्या लोगों में अकेलापन बढ़ा रही है और संबंधों की डोर कमजोर हो रही है. तेजी से बदलती दुनिया में आर्थिक विकास ही वह पैमाना है, जिससे व्यक्ति की सफलता का आंकलन किया जाता है, जबकि सामाजिक पक्ष को एकदम से अनदेखा किया जा रहा है. शहरों में फ्लैट संस्कृति अपने साथ कई समस्याएं लायी है, जिसमें अकेलापन प्रमुख है.
इसका निदान लोग अधिक व्यस्ततता में खोज रहे हैं. नतीजा, अधिक काम करना, कम सोना और टेक्नोलॉजी पर बढ़ती निर्भरता, सोशल नेटवर्किंग पर बढ़ती भीड़ इसी संक्रमण की निशानी है, जहां हम के बजाय मैं पर ज्यादा जोर दिया जाता है. आर्थिक विकास मानसिक स्वास्थ्य की कीमत पर किया जा रहा है.
मानसिक स्वास्थ्य कभी भी लोगों की प्राथमिकता में नहीं रहा है. अवसाद के लक्षण भी ऐसे नहीं हैं, जिनसे इसे आसानी से पहचाना जा सके. इसके लक्षणों में हर चीज को लेकर नकारात्मक रवैया, उदासी, निराशा जैसी भावना, चिड़चिड़ापन, भीड़ में भी अकेलापन महसूस करना और जीवन के प्रति उत्साह में कमी आना है.
दूसरी समस्या ज्यादातर भारतीय एक मनोचिकित्सक के पास मशविरा लेने जाने में आज भी हिचकते हैं, उन्हें लगता है कि वे पागल घोषित कर दिये जायेंगे. इस परिपाटी को तोड़ना एक बड़ी चुनौती है. उदारीकरण के बाद देश की सामाजिक स्थिति में खासे बदलाव हुए हैं, पर हमारी सोच उस हिसाब से नहीं बदली है. अपने बारे में बात करना आज भी सामजिक रूप से वर्जना की श्रेणी में आता है.
ऐसे में अवसाद का शिकार व्यक्ति अपनी बात खुल कर किसी से कह ही नहीं पाता और अपने में ही घुटता रहता है. एक आम भारतीय को यह पता ही नहीं होता कि वह किसी मानसिक बीमारी से जूझ रहा है. इस स्थिति में अवसाद बढ़ता ही रहता है, जबकि समय रहते अगर इन मुद्दों पर गौर कर लिया जाये, तो स्थिति को गंभीर होने से बचाया जा सकता है. भारत शारीरिक स्वास्थ्य के कई पैमाने पर विकसित देशों के मुकाबले बहुत पीछे है, शायद इसीिलए सरकारें भी मानसिक स्वाथ्य के मुद्दे को अपनी प्राथमिकता में नहीं रखतीं.
देश में कोई स्वीकृत मानसिक स्वास्थ्य नीति नहीं है. मानसिक स्वास्थ्य देखभाल विधयेक अभी संसद में लंबित है. इस रोग की पहचान हो चुकी है, लेकिन भारत इसका निदान कैसे करेगा, इसका फैसला होना अभी बाकी है.
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