वह ‘जेंडर-न्यूट्रल स्पेस’ कहां से लायें!

Published at :06 Oct 2015 12:16 AM (IST)
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वह ‘जेंडर-न्यूट्रल स्पेस’ कहां से लायें!

किसी जगह को लेकर हर व्यक्ति का अपना अलग अनुभव, अलग नजरिया और अलग बरताव होता है. स्त्री और पुरुष का भी. इस लिहाज से कोई स्पेस, टाइम भी, जेंडर-मुक्त नहीं है! हर जेंडर को समाज ने अलग-अलग भूमिकाएं और पहचान दी है और उसी के साथ सारे व्यवहार, भाषा, संरचनाएं सभी कुछ लैंगिक रूप […]

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किसी जगह को लेकर हर व्यक्ति का अपना अलग अनुभव, अलग नजरिया और अलग बरताव होता है. स्त्री और पुरुष का भी. इस लिहाज से कोई स्पेस, टाइम भी, जेंडर-मुक्त नहीं है!

हर जेंडर को समाज ने अलग-अलग भूमिकाएं और पहचान दी है और उसी के साथ सारे व्यवहार, भाषा, संरचनाएं सभी कुछ लैंगिक रूप से विभाजित हो गया. ऐसे में ‘जेंडर-न्यूट्रल स्पेस’ स्त्री के लिए एक स्वप्न जैसा है. वह जहां हो, जिस वक्त में हो, वह सहज रह सके. लेकिन होता यह है कि किसी जगह पर अपने आपको रखते हुए स्त्री भी अकसर पुरुष की नजर से ही स्वयं को देख रही होती है और उसी के मुताबिक व्यवहार कर रही होती है.

शराब के ठेके के पास से गुजरते हुए या रात में सुनसान अकेली सड़क पर चलते हुए जो असहजता स्त्री को होती है, उसका कारण खुद उसके भीतर नही है, बल्कि उससे परे की दुनिया है, जिसने कुछ जगहों और वक्त के किसी हिस्से को लैंगिक आधारों पर सिर्फ पुरुष के नाम कर दिया है.

इन जगहों या वक्तों में भी स्त्री का हस्तक्षेप है, लेकिन सिर्फ वैसा, जैसा पितृसत्ता के मुताबिक हो. स्पष्ट है कि मेट्रो के ‘केवल महिलाओं के लिए’ एक आरक्षित कोच की तरह दिन के कुछ घंटे भी महिलाओं के लिए आरक्षित करके बाकी के सारे टाइम और स्पेस मर्दों द्वारा हथिया लिये गये हैं.‌ सर्दी की धूप में ‘सार्वजनिक’ बेंच पर दिन-दहाड़े सोती हुई स्त्रियां मिलना असंभव है.

हम सोचने को विवश हैं कि सार्वजनिक के माने क्या हैं? आरक्षित जगह और वक्त में ही औरत पितृसत्तात्मक नजरिये से कितनी मुक्त है, यह उनकी बातें और व्यवहार पैटर्न जाहिर कर देते हैं. हर सार्वजनिक स्पेस औरतों के लिए कुछ पाबंदियां लगाता दिखता है.

मजेदार है कि भीड़ हुए बिना औरत एक पारंपरिक ‘पुरुष दृष्टि’ से एकदम बेपरवाह नहीं हो पाती है, जो कि उसे हमेशा होना चाहिए. अपने साथ चलने वाली जवान लड़कियों को लेकर परिवार की बुजुर्ग औरतें हमेशा चौकन्ना रहती आयी हैं. इसके विपरीत, हरिद्वार के घाटों पर बेझिझक महिलाओं, लड़कियों को एक पेटिकोट बांधे नहाते देखा है. जो बड़ी बूढ़ियां अन्यथा लड़कियों को दुपट्टे और कमीज-सलवार की तहजीब सिखाती हैं, उनका अंदाज वहां अचानक बदल जाता है. यह बेपरवाही किस खयाल से आती है?

कुछ पल के लिए यह भूल जाना कि आप ‘स्त्री’ हो, बल्कि यह कि आप ‘स्त्री शरीर’ हो, जिसके कुछ खास ‘मायने’ होते हैं, जिससे उबर आना, यह धर्म के नाम पर वहां संभव होता है. धर्म अपने आप में एक पितृसत्तात्मक संरचना है. कीर्तन मंडली में, शादी से पहले के संगीत में, रसोई में, यहां तक कि किसी रेड लाइट एरिया में भी, जो सिर्फ स्त्रियों का इलाका कहा जा सकता है, अगर स्त्रियां पितृसत्तात्मक संरचनाओं से मुक्त हो पायें, तो अवश्य ही कुछ जगहों को ‘जेंडर-न्यूट्रल स्पेस’ घोषित किया जा सकता है.

तय है कि टाइम और स्पेस पर स्त्री का अधिक से अधिक कब्जा ही उसे टाइम और स्पेस को अधिक जेंडर-संवेदनशील बना सकता है.

सुजाता

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