कानूनी मकड़जाल

Published at :19 Aug 2015 6:57 AM (IST)
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कानूनी मकड़जाल

आपने लोगों को यह कहते हुए जरूर सुना होगा कि भगवान दुश्मन को भी कचहरी के फेर में न डाले. ‘तारीख पे तारीख, तारीख पे तारीख’ का फिल्मी जुमला भी आम है. निचली अदालतों से सर्वोच्च न्यायालय तक तीन करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं. अनेक कारक इस स्थिति के लिए जिम्मेवार हैं, जिनमें बड़ी […]

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आपने लोगों को यह कहते हुए जरूर सुना होगा कि भगवान दुश्मन को भी कचहरी के फेर में न डाले. ‘तारीख पे तारीख, तारीख पे तारीख’ का फिल्मी जुमला भी आम है. निचली अदालतों से सर्वोच्च न्यायालय तक तीन करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं. अनेक कारक इस स्थिति के लिए जिम्मेवार हैं, जिनमें बड़ी संख्या में कानूनों का होना भी एक प्रमुख वजह है.
एक-दूसरे से जुड़े तरह-तरह के कानूनों के कारण अकसर न्याय और निर्णय कानूनी दांव-पेंच में उलझ जाते हैं. बेमानी कानूनों की समीक्षा करने और उन्हें हटाने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है. इस दिशा में उल्लेखनीय पहल करते हुए राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने कहा है कि राज्य के 150 गैरजरूरी कानूनों को अगले माह खत्म कर दिया जायेगा. राज्य में फिलहाल 592 कानून हैं.
इससे पहले ऐसी आखिरी कवायद 1964 में की गयी थी. ब्रिटिश राज के हितों को पूरा करने के लिए बनाये अनेक कानून आज भी अस्तित्व में हैं. राजस्थान में कानूनों की समीक्षा करनेवाली समिति को संबंधित विभाग 55 कानूनों का विवरण भी उपलब्ध नहीं करा सके. केंद्रीय स्तर पर भी करीब तीन हजार ऐसे कानून हैं जो निर्थक हैं या अन्य कानूनों का दुहराव हैं.
विडंबना यह है कि नागरिकों की संपत्ति की मालकिन ब्रिटेन की महारानी को बतानेवाले और कुछ समुदायों को अपमानित करनेवाले कानून भी विधि संहिताओं में दर्ज हैं. मौजूदा केंद्र सरकार ने भी 125 फालतू कानूनों को खत्म किया है और अन्य 1,871 कानूनों को हटाने के प्रयास जारी हैं. अनेक विधि आयोगों और समीक्षा समितियों ने समय-समय पर ऐसे सुझाव भी दिये हैं. बेमानी कानूनों को हटाने से न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता और विलंब से राहत मिलेगी. उम्मीद है कि केंद्र व राजस्थान सरकारों की तर्ज पर अन्य राज्य सरकारें भी गैरजरूरी प्राविधानों के बोझ को कम करेंगी.
एक सभ्य एवं लोकतांत्रिक समाज में जागरूकता, जवाबदेही और स्वतंत्रता के स्तर का आकलन कानूनों की संख्या के आधार पर भी किया जा सकता है. जिन देशों में कम कानून हैं, वहां जन-जीवन अपेक्षाकृत सामान्य, शांत और समृद्ध है.
जहां राज्य सत्ता को ढेर-सारे कानूनों के सहारे की जरूरत होती है, वहां जनता और राज्य के बीच भरोसे का अभाव ज्यादा होता है, प्रशासन और नागरिकों में उत्तरदायित्व की भावना कम. उम्मीद है कि बेकार और बेमानी कानूनों को हटाने की पहल से प्रासंगिक और आवश्यक कानून अधिक प्रभावी हो सकेंगे. इस प्रक्रिया को पूरे देश में तेज करने की दरकार है.
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