डायन प्रथा और हमारा समाज

Published at :17 Aug 2015 10:19 AM (IST)
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डायन प्रथा और हमारा समाज

सरला माहेश्वरी, पूर्व राज्यसभा सांसद इसी 13 अगस्त को असम विधानसभा ने डायन हत्या निवारक कानून (प्रीवेंशन एंड प्रोटेक्शन फ्रॉम विच-हंटिंग बिल, 2015) पारित किया है. इस कानून में प्राविधान है कि कोई भी यदि किसी स्त्री को डायन बताता है, तो उसे तीन से पांच साल की सख्त सजा होगी और 50 हजार से […]

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सरला माहेश्वरी, पूर्व राज्यसभा सांसद

इसी 13 अगस्त को असम विधानसभा ने डायन हत्या निवारक कानून (प्रीवेंशन एंड प्रोटेक्शन फ्रॉम विच-हंटिंग बिल, 2015) पारित किया है. इस कानून में प्राविधान है कि कोई भी यदि किसी स्त्री को डायन बताता है, तो उसे तीन से पांच साल की सख्त सजा होगी और 50 हजार से पांच लाख रुपये तक का जुर्माना देना होगा. डायन बता कर जुल्म करनेवाले को पांच से 10 साल की सजा और एक से पांच लाख रुपये तक का जुर्माना भरना होगा. अगर ऐसे किसी काम में किसी समूह को दोषी पाया जाता है, तो उस समूह के हर व्यक्ति को पांच से 30 हजार रुपये तक का जुर्माना देना होगा. डायन बता कर किसी की हत्या करने पर धारा 302 के तहत मुकदमा चलेगा.

डायन बता कर यदि किसी को आत्महत्या के लिए मजबूर किया जाता है, तो उसे सात साल से उम्रकैद तक की सजा और एक से पांच लाख रुपये तक का जुर्माना देना होगा. ऐसे मामलों की जांच में गलती करनेवाले जांच अधिकारी को भी दंड मिलेगा. उसे भी 10 हजार रुपये का जुर्माना भरना होगा. असम का यह कानून बिहार, ओड़िशा, झारखंड और महाराष्ट्र के ऐसे मौजूदा कानूनों से ज्यादा सख्त है. असम में बीते पांच वर्षो में 70 औरतों को डायन बता कर उनकी हत्या कर दी गयी. जांच में पता चला है कि इनमें अधिकतर मामलों के मूल में जमीन और संपत्ति का विवाद था. खबरों के मुताबिक बीते 8 अगस्त को झारखंड में भी पांच औरतों को डायन बता कर मार डाला गया. पिछले दस वर्षो में वहां करीब 1,200 औरतों को डायन बता कर मारा जा चुका है .

देश के अन्य भागों में भी ऐसी घटनाएं अकसर घटती हैं. जिनकी इस तरह हत्या की जाती है, उनमें अधिकतर गरीब, कमजोर व विधवा औरतें होती हैं. विडंबना यह है कि औरतों पर होनेवाले ऐसे जुल्मों के साथ हमारे समाज की कुछ धार्मिक और पोंगापंथी ताकतें जुड़ी होती हैं. संसद में हिंदू कोड बिल लाये जाने के समय सारी प्रतिगामी ताकतें उस बिल के खिलाफ थीं. 1987 में राजस्थान के दिवराला में 18 वर्ष की रूपकंवर को उसके मृत पति के साथ जिंदा जला दिया गया था. ऐसे मौकों पर परंपरा की रक्षा के नाम पर खास तौर पर संघ परिवार वालों ने ही सबसे चरम प्रतिक्रियावादी भूमिका अदा की थी. सती प्रथा कानून में संशोधन का भाजपा ने संसद में विरोध किया था. आज वही भाजपा सत्ता में है. इधर बाबाओं, कर्मकांडियों के हौसले बुलंद हैं. कभी लव-जेहाद तो कभी खाप पंचायतें मानवाधिकारों का मजाक उड़ा रही हैं.

बरसों पहले, रूपकंवर को जिंदा जला दिये जाने के समय मैंने एक कविता लिखी थी, ‘यकीन नहीं होता’, उसकी कुछ पंक्तियां : सच बतलाना रूपकंवर/ किसने किसने किसने/ तुम्हारे इस सुंदर तन-मन को आग के सुपुर्द कर दिया/ क्या तुम्हें डर था / कि देवी न बनी तो डायन बना दी जाओगी / क्या तुम्हें डर था / अपने उस समाज का/ जहां विधवा की जिंदगी / काले पानी की सजा से कम कठोर नहीं होती/ लेकिन फिर भी/ यकीन नहीं होता रूपकंवर/ कि हिरणी की तरह चमकती तुम्हारी आंखों ने/ यौवन से हुलसते तुम्हारे बदन ने / आग की लपटों में झुलसने से इनकार नहीं किया होगा..

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