अमीरों की राजनीति में गरीब बेहाल

Published at :14 Aug 2015 5:12 AM (IST)
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अमीरों की राजनीति में गरीब बेहाल

तरुण विजय राज्यसभा सांसद, भाजपा क्या कभी आपने किसी राजनेता को गरीबी की हालत में देखा है? संभव ही नहीं है; क्योंकि राजनेता गरीब होते ही नहीं. उन्हें मंदिर में भगवान के दर्शन करने के लिए भीड़ में नहीं जाना पड़ता. उन्हें रेल का टिकट लेने के लिए लाइन में नहीं लगना पड़ता. उन्हें अपने […]

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तरुण विजय
राज्यसभा सांसद, भाजपा
क्या कभी आपने किसी राजनेता को गरीबी की हालत में देखा है? संभव ही नहीं है; क्योंकि राजनेता गरीब होते ही नहीं. उन्हें मंदिर में भगवान के दर्शन करने के लिए भीड़ में नहीं जाना पड़ता.
उन्हें रेल का टिकट लेने के लिए लाइन में नहीं लगना पड़ता. उन्हें अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाने के लिए दर-दर भटकना नहीं पड़ता. उनकी एक अलग ही ‘जाति’ होती है, जिसका नाम होता है वीआइपी. वीआइपी होने के बाद वे यादव, गुप्ता, ठाकुर, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या ब्राह्मण वर्ग के होते हैं. कभी किसी मंदिर में दर्शन के लिए उमड़ी भीड़ में कुचले जानेवालों, या किसी लाठीचार्ज में घायल होनेवालों में आपने किसी राजनेता का नाम सुना है?
जो लोग कुंभ में भगदड़ में मरते हैं या देश के किसी भी कोने में किसी भी सरकार के कार्यकाल में किसी मंदिर में दर्शन के लिए जा रहे लोग होते हैं, और अचानक कुचले जाते हैं, वे भी भारतीय ही होते हैं और यह कहना गलत होगा कि स्थानीय शासन-प्रशासन को इस बात का अहसास नहीं होता कि शिवरात्रि, दुर्गापूजा, रामनवमी या ऐसे किसी अन्य हिंदू पर्व पर बिना वीआइपी गेट के घुसनेवाले बेचारे गरीब एवं साधारण जन भगदड़ का शिकार हो सकते हैं.
वास्तव में हमारा संसदीय लोकतंत्र संसद के भीतर और बाहर केवल अमीरों की देखभाल और अमीरों के विषयों पर चर्चा करने के लिए समर्पित रहता है. क्या कभी किसी ने सुना है कि आजादी के 68 वर्षो बाद भी देश में बड़े पैमाने पर पसरी गरीबी पर किसी भी सदन में एक घंटा भी विशेष चर्चा हुई है?
क्या कभी किसी ने सुना है कि दुनिया के जिस देश में कुपोषण के शिकार सबसे ज्यादा लोग रहते हों, उस देश की संसद में कुपोषण से मरनेवाले बच्चों या कुपोषण के कारण जिंदगी भर अपाहिज हो जानेवाले लोगों के दुख-दर्द और कुपोषण का सामना करने के शासन-प्रशासन के तौर-तरीकों पर बहस के लिए कार्य स्थागन का नोटिस दिया गया हो या उस पर कोई गंभीर चर्चा हुई हो?
क्या किसी विधानसभा, खास तौर पर ऐसी विधानसभा जिसमें जिस कोने में देखो, उस कोने में सब आप ही आप दिखते हों, में बेघर लोगों, फुटपाथ पर सोनेवालों, सरकारी रैनबसेरों में कीड़े-मकोड़ों की तरह ठूंस-ठूंस कर जीनेवालों के बारे में कोई बहस हुई हो और उसके नतीजों पर किसी सरकार ने सार्थक घोषणा की हो?
क्या दलितों पर होनेवाले अत्याचारों के संदर्भ में कभी सदन में हंगामा हुआ है, या इस ओर या उस ओर वालों में से किसी ने भी यह कहते हुए कि दलितों पर अत्याचार अब हम सहन नहीं करेंगे, इसलिए इस मुद्दे पर आज ही चर्चा शुरू की जाये, सदन न चलने दिया हो?
देश में गंदगी और कूड़े के जहरीले पानी में उगायी जानेवाली सब्जियों के बाजार में बिकने और उसके कारण होनेवाले भयानक रोगों से जनता को बचाने के लिए कभी किसी दल ने सदन की गांधी मूर्ति पर सत्याग्रह और प्रदर्शन किया है?
दरअसल, इन सबसे अमीरों का कोई संबंध नहीं होता. हमारे देश के अमीर राजनेता उस वर्ग से नहीं होते, जो दिल्ली के दरियागंज या सब्जीमंडी तक जाकर फिर वहां भी सब्जियों का मोलभाव करते हुए सब्जी खरीदते हों.
उन्हें इस बात का कभी दर्द हो भी नहीं सकता कि उस निम्न मध्यम वर्ग में पैदा होनेवाले का अर्थ क्या होता है, जहां बच्चों को दूध, फल और पौष्टिक आहार दिया जाना असंभव होता है. वह वर्ग, जो गरीबी से, उनके दुख से वाकिफ नहीं है, भारत के विभिन्न प्रांतों में शासन कर रहा है. उसके लिए तो भूख से ज्यादा थाली में लेना और आधा-पौना खाकर जूठा छोड़ देना स्वाभाविक बात है.
लेकिन, इनके मन में गरीबों के लिए बहुत दर्द होता है, क्योंकि इनकी सारी जिंदगी ही गरीबों पर टिकी होती है. गरीब न हों तो इनके बंगले न बनें, गरीब न हों तो इनके पांच सितारा होटल के बिल न पास हों, गरीबों की भुखमरी, बदहाली, पिछड़ेपन को दूर करने के लिए इन लोगों को अमीर होना पड़ता है.
गरीब लोग अपना पेट भरने के लिए दिनभर सड़क पर पत्थर कूटते हैं, खेत-खलिहानों में काम करते हैं. मजदूरी के लिए छत्तीसगढ़, झारखंड, ओड़िशा का आदमी लद्दाख, श्रीनगर, पंजाब और हिमाचल तक जाता है. आधा पेट भर कर पैसा बचाता है. साल दो साल में एक बार घर जायेगा, तो बीवी-बच्चों के लिए अपना जमा पैसा खर्च करेगा. यही वह भारतीय है, जो मंदिर की भीड़ में मारा जाता है.
यही वह भारतीय है, जो कुंभ में भीड़ बनता है और श्रद्धा एवं आस्था की डोर से खिंच कर, ट्रेन में आरक्षण है या नहीं इसकी परवाह किये बिना, यात्रा करता है. उसे उन सेक्युलरों के तानों और पढ़े-लिखे लेकिन असभ्य फोटोग्राफरों से भी परेशानी नहीं होती, जो हिंदू मेलों में सिर्फ तमाशे और फोटोग्राफी के लिए आते हैं.
वह अपना धर्म निभाता है और वापस घर की ओर लौट जाता है. उसे इस बात की चिंता नहीं होती कि संसद में शोर मच रहा है या नहीं मच रहा है, काम हो रहा है या नहीं हो रहा है. जब काम होता है, तब कौन सा इन गरीबों के लिए वहां चर्चा होती है?
हर बहस और झगड़े अमीर राजनीतिक खानदानों की पसंद-नापसंद के अहंकार और आहत मन में बंटे रहते हैं. यह संसद कभी इस बात के लिए शोर-शराबे में नहीं डूबती कि गांवों में बेहतर स्कूल क्यों नहीं खोले जा रहे हैं, या फिर कोई ऐसा कानून क्यों नहीं बनाया जाता, जिसमें यह अनिवार्य कर दिया जाये कि शहर में कोई व्यक्ति फुटपाथ पर या भूखे पेट नहीं सोयेगा. यह संसद कभी इस बात के लिए शोर का अनुभव नहीं करती कि दफ्तरों में भ्रष्टाचार फैले हुए हैं.
संसद में कभी इस बात के लिए शोर नहीं होता कि देश में कुकुरमुत्तों की तरह फैल रहे मेडिकल, इंजीनियरिंग तथा टेक्निकल कॉलेजों में पढ़ाने के लिए अध्यापकों की बेहद कमी है और जो छात्र वहां से मोटी रकम देकर डिग्री हासिल कर रहे हैं, वे वक्त के अनुरूप किसी रोजगार के लायक नहीं हैं. देश के गरीब एवं मध्यमवर्गीय माता-पिता का पैसा और उनके बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो रहा है, इस पर संसद में कभी चर्चा सुनी है आपने या ऐसे मसलों पर गुस्से में सदन के नियमों को तोड़ते हुए सांसदों को अध्यक्ष के निकट वेल में प्रदर्शन करते हुए देखा है?
हमारे धनी राजनेता गरीब जनता के लिए बहुत चिंतित हैं. इनको लेकर अकबर इलाहाबादी ने जो लिखा था, वह आज भी सत्य है-
रंज लीडर को बहुत है, मगर आराम के साथ।
कौम के गम में डिनर खाते हैं, हुक्काम के साथ।।
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