भगदड़, मौतें और अंतरिम राहत

Published at :11 Aug 2015 12:14 AM (IST)
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भगदड़, मौतें और अंतरिम राहत

विवेक शुक्ला वरिष्ठ पत्रकार पहले ओड़िशा, फिर आंध्र प्रदेश और अब झारखंड. बीते कुछ हफ्तों के दौरान धार्मिक आयोजनों में भगदड़ में कई मासूम मारे गये. झारखंड के देवघर में भगदड़ में11 कांवड़ियों की मौत हो गयी और 60 से अधिक घायल हो गये. यह हादसा बैद्यनाथ मंदिर से तीन किमी दूर हुआ. मंदिर में […]

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विवेक शुक्ला

वरिष्ठ पत्रकार

पहले ओड़िशा, फिर आंध्र प्रदेश और अब झारखंड. बीते कुछ हफ्तों के दौरान धार्मिक आयोजनों में भगदड़ में कई मासूम मारे गये. झारखंड के देवघर में भगदड़ में11 कांवड़ियों की मौत हो गयी और 60 से अधिक घायल हो गये. यह हादसा बैद्यनाथ मंदिर से तीन किमी दूर हुआ.

मंदिर में जल चढ़ानेवालों की 15 किमी लंबी लाइन लगी थी. यह हादसा प्रात: पौने छह बजे पंक्ति को आगे बढ़ाने की कोशिश में हुआ. वहां करीब डेढ़ लाख से अधिक श्रद्धालु थे.

क्या हमारा प्रशासन भीड़ प्रबंधन भी नहीं जानता? 1954 में इलाहाबाद के कुंभ मेले में आठ सौ तीर्थयात्रियों की भगदड़ में जान चली गयी थी. मेले में आये तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को देखने के लिए मची भगदड़ के कारण दुर्घटना हुई थी. बीते महीने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री पहुंच गये पुष्करम मेले में सपरिवार स्नान करने. भगदड़ में 29 की जान चली गयी.

उधर, ओड़िशा में भगवान जगन्नाथ की इस शताब्दी की पहली नबकेलवर रथयात्र के दौरान हुई भगदड़ में दो महिलाओं की मौत हो गयी और 20 घायल हो गये.

भगदड़ से होनेवाली मौतों को आप गूगल करेंगे, तो पता चलेगा कि अपने देश में हर साल लगातार ऐसे हादसे हो रहे हैं.

पर मजाल है कि भीड़ प्रबंधन को लेकर कोई सोच रहा हो. यानी लोग मरते रहे, होती रहे जांच और दे दी जाये मृतकों के परिजनों को अंतरिम राहत. इंफोसिस के पूर्व चीफ नारायणमूर्ति कहते हैं कि पिछले 60 वर्षो में भारत में कोई‘अविष्कार’ नहीं हुआ. जाहिर है, जब हम भीड़ प्रबंधन को नहीं जान सके, तो कोई बड़ा अनुसंधान क्या करेंगे!

सिर्फ धार्मिक आयोजनों में ही भीड़ के कारण लोग नहीं मरते. क्रिकेट मैच टिकटों की बिक्री से लेकर मुफ्त खाने और बरतन वितरण के दौरान छीना-झपटी में भी लोग मरते रहे हैं.

भीड़ से मरने के मामले में सारे राज्यों के रिकॉर्ड खराब हैं. ऐसा लगता है कि भारत में भीड़ प्रबंधन एक विषय की तरह स्थापित ही नहीं हुआ है. भीड़ के प्रबंधन का पेशा दुनियाभर में अपेक्षाकृत नया सिद्धांत है, जो समारोहों के दौरान होनेवाली भयानक त्रसदियों की प्रतिक्रियास्वरूप विकसित हुआ है.

भीड़ प्रबंधन के लिए योजना बनाना जरूरी है. जिस क्षेत्र में आयोजन हो रहा है वहां पर एकत्र होनीवाली भीड़ और उनके भगदड़ में निकलने के लिए जरूरी निकासी स्थानों पर आपको नजर रखनी होगी.

बेशक, भीड़ प्रबंधकों को भीड़ के बर्ताव में संभावित बदलाव पर भी नजर रखनी होगी. दुनियाभर में, भीड़भाड़ वाले कोई भी समारोह ऐसी त्रसदियों के प्रति प्रभावशून्य नहीं हैं. अगर आपके पास इस तरह के आयोजनों के लिए वास्तव में योजना पर फोकस करनेवाले लोग नहीं है, तो हादसे कहीं भी हो सकते हैं.

अगर आप ऐसी भीड़ का हिस्सा हैं और हालात खराब हो जाते हैं, ऐसे में आप ज्यादा कुछ नहीं कर सकते. इसलिए बेहतर होगा कि आप भीड़भाड़ से बचें. पर संबंधित सरकारी महकमों की जिम्मेवारी है कि वे इस बात को देखें, ताकि भीड़ काबू से बाहर होने ना पाये. फिलहाल तो इस मोर्चे पर केंद्र से लेकर राज्य सरकारों के संबंधित विभाग निकम्मे साबित हो रहे हैं!

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