आतंकवाद के बदलते चेहरे को पहचानें
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :07 Aug 2015 11:59 PM (IST)
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पुण्य प्रसून वाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार कसाब फरीदकोट के ओकारा गांव का था. नावेद फैसलाबाद की शहरी कालोनी गुलाम मोहम्मद अबद का है. कसाब गरीब परिवार का था. नावेद मध्यम वर्ग के परिवार का है. कसाब पेट के लिए लश्कर के साथ जुड़ा. नावेद इसलाम के नाम पर जमात-उद-दावा के साथ जुड़ा. कसाब के वक्त लश्कर […]
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पुण्य प्रसून वाजपेयी
वरिष्ठ पत्रकार
कसाब फरीदकोट के ओकारा गांव का था. नावेद फैसलाबाद की शहरी कालोनी गुलाम मोहम्मद अबद का है. कसाब गरीब परिवार का था. नावेद मध्यम वर्ग के परिवार का है. कसाब पेट के लिए लश्कर के साथ जुड़ा. नावेद इसलाम के नाम पर जमात-उद-दावा के साथ जुड़ा. कसाब के वक्त लश्कर की पूरी ट्रेनिंग तालिबानी अंदाज में थी.
नावेद के वक्त इसलाम और आइएसआइएस की थ्योरी ने जमात की तकरीर में जगह ले ली थी. कसाब के वक्त लश्कर चीफ हाफिज सईद कश्मीर की आजादी के नाम पर उसी तरह गरीब परिवारों से एक लड़का मांगा करता था, जैसे अफगानिस्तान में तालिबान के लिए लश्कर समेत आतंक की कई तंजीमों ने पाकिस्तान के गरीब इलाकों में इसे रोजगार और ताकत से जोड़ दिया था.
नावेद के वक्त तक पाकिस्तान में तालिबान को लेकर मोहभंग होने लगा था. 1986 में बने लश्कर-ए-तैयबा के भारतीय संसद पर हमले के बाद ही 2002 में जमात-उद-दावा बना कर हाफिज सईद ने आतंक को सामाजिक कार्यो से जोड़ कर खुद को विस्तार दे दिया.
जब दुनिया भर में लश्कर-ए-तैयबा पर प्रतिबंध लगाया जाने लगा तो जमात-उद-दावा बना कर आंतकी गतिविधियों के लिए सामाजिक-आर्थिक कार्यो को ढाल बनाया गया. भारत के लिए ये सारे सवाल कोई मायने नहीं रखते हैं कि पाकिस्तान में किस तरह आतंक सामाजिक जरूरतों से जुड़ गया.
भारत सरकार यह अब भी नहीं समझ पा रही है कि पाकिस्तान ही नहीं, दुनियाभर में आतंक की परिभाषा बदल रही है. और उसी की झलक हर शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद श्रीनगर की जामा मसजिद के बाहर दिखती है, जहां आइएसआइएस के झंडे उसी तर्ज पर लहराते हैं, जैसे कभी पाकिस्तान के झंडे लहराया करते थे.
यानी कश्मीर में भी आतंकवाद का चेहरा बदल रहा है. अब कश्मीर का पढ़ा-लिखा युवा राज्य की मौजूदा मुफ्ती सरकार या दिल्ली की मोदी सरकार के खिलाफ नारे लगाते हुए अपनी मौजूदगी आतंक के साथ जोड़ने से नहीं कतरा रहा है. और जहां से नावेद है, वहां के शहरी मिजाज और पाकिस्तान के तीसरे सबसे संपन्न जिले फैसलाबाद के कालेजों में हाफिज सईद बीते दो बरस में छह बार पहुंचा.
यानी जिस नावेद का एक भाई कॉलेज में पढ़ाता है, एक भाई बिजनेस करता है, बहन यूनिवर्सिटी में पढ़ती है, उस परिवार से नावेद जमात-उद-दावा की तकरीर से प्रभावित होकर लश्कर से जुड़ता है. वहीं कश्मीर में डॉक्टरी, इंजीनियरिंग और पीएचडी करनेवाले छात्र हाथों में बंदूक थाम कर जब खुद को आतंकवादी करार देने से नहीं कतराते, तो सवाल साफ है कि युवाओं को मुख्यधारा से कैसे जोड़ा जाये?
पाकिस्तान की अपनी मजबूरी उसके पावर सेंटर को लेकर हो सकती है, क्योंकि पाकिस्तान में चुनी हुई सरकार के सामानांतर सेना और आइएसआइ की अपनी भूमिका ना सिर्फ बड़ी है, बल्कि मौजूदा वक्त में तो नवाज शरीफ के हर कदम के उलट पाकिस्तानी सेना प्रमुख राहिल शरीफ ने पहल की है. लेकिन, भारत में तो ऐसा बिलकुल नहीं है.
चुनी हुई सरकार के साथ विदेश नीति को लेकर तो विपक्ष भी हम-साथ खड़ा होता है. लेकिन, पहली बार कश्मीर में पढ़े-लिखे युवा ही नहीं, बल्कि कभी मुंबई, तो कभी हैदराबाद, कभी बेंगलुरु तो कभी केरल से किसी-न-किसी युवा की आवाज आइएसआइएस को लेकर उभरती है.
तो नया सवाल यह है कि क्या आतंक की नयी परिभाषा को गढ़ते आइएस को लेकर युवा तबका समझ नहीं पा रहा है? आतंकवाद को लेकर भारत सरकार की नीति हमेशा जीरो टॉलरेंस की रही है. और पाकिस्तान के लिए आतंकवाद एक नेशनल पॉलिसी के तौर पर दिखाई देती है. आज अगर पाक सेना और आइएसआइ भारत में आतंकवादियों की घुसपैठ करा रही है, तो याद कीजिए मुशर्रफ के वक्त सरकार ही कश्मीर की आजादी की राग अलापने से नहीं कतरा रही थी.
कश्मीर की सबसे बड़ी समस्या आज भी दिल्ली की नजर में आतंकवाद है. लेकिन इसके उलट अगर हकीकत को समझने का प्रयास करें, तो कश्मीर का सबसे बड़ा संकट वह पढ़ा-लिखा है, जिसके सामने आगे बढ़ने का कोई रास्ता है ही नहीं.
विकास की जिस चकाचौंध को देश में सरकार लाना चाहती है, उतने ही जीने के विकल्प कश्मीरी युवाओं के पास होने चाहिए. यानी देश की मुख्यधारा में कश्मीरी खुद को जुड़ा हुआ महसूस करे और उसके भीतर यह एहसास जागे कि वह भारत से न सिर्फ जुड़ा हुआ है, बल्कि उसी के लिए उसे जीना-मरना है.
अब अलगाववादियों को भी समझ में आ रहा है कि कश्मीर में आतंकवाद की 1989 वाली परिभाषा बदल रही है और अगर कश्मीरी युवा ही कोई लकीर खींचना चाहता है, तो वह उसके साथ चलेंगे. अंतर सिर्फ यह नहीं आना चाहिए कि दिल्ली को लेकर कश्मीरी युवा का गुस्सा बरकरार रहे.
तो अब सवाल तीन है. पहला, क्या सरकार को कश्मीर को समझने के लिए कश्मीरी युवाओं को समझना होगा? दूसरा, क्या पाकिस्तान के साथ बातचीत को उस धरातल पर लाना होगा, जहां पाकिस्तानी सत्ता के तीन ध्रुव भी उभरे और आतंक को लेकर उसकी स्टेट पॉलिसी भी दुनिया के सामने आये?
और तीसरा, घुसपैठ करने वाले पाकिस्तानीआतंकवादियों को मारने की जगह नावेद की तर्ज पर पकड़ कर संयुक्त राष्ट्र या वैश्विक मंचों को सबूत के तौर पर ऐसे जीवित आतंकवादियों को दिखाना चाहिए? यानी अभी तक पाकिस्तान और आतंकवाद को लेकर जो रास्ते अपनाये गये, उन्हें बदलना जरूरी है, क्योंकि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी पंजाब में खालिस्तान को फिर से जीवित करना चाहती है.
ऐसे में गुरुदासपुर हमला चिंता का विषय है. नावेद के लिए सारे रास्ते अबु कासिम ने बनाये. लेकिन अबु कासिम के लिए कश्मीर में रास्ते कौन बनाता रहा और कौन पनाह दिये हुए है, इसकी जानकारी सेना-पुलिस के पास नहीं है.
नावेद रमजान के वक्त भारत में घुसा, लेकिन अबु कासिम तो 2008 में ही घुसा था. 2013 में सेना के ट्रक पर किये गये हमले के पीछे अबु कासिम ही था, जिसमें 8 फौजी शहीद हो गये थे. ऐसे में सवाल है कि जब 23 अगस्त को दिल्ली में पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से मिलेंगे, तो क्या कसाब की तर्ज पर नावेद को लेकर भी सबूत और डोजियर सौंपने का जिक्र होगा?
या फिर भारत इस बार जिंदा आतंकवादी को पकड़ने के बाद भी बातचीत कर दुनिया को नया संदेश देगा कि अब पाकिस्तान को लेकर भारत का रवैया सिर्फ आतंक के मद्देनजर नहीं है, बल्कि पाकिस्तान के भीतर का सच भी अब वह दुनिया के सामने लायेगा? इंतजार कीजिए, क्योंकि पाकिस्तान ऐसा पड़ोसी है, जिसे बदला नहीं जा सकता.
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