देर से छोड़ी जिद

Published at :04 Aug 2015 11:18 PM (IST)
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देर से छोड़ी जिद

भूमि अधिग्रहण कानून में प्रस्तावित मुख्य संशोधनों को लेकर एनडीए सरकार का रुख अगर अचानक से पलट गया है, तो इसका श्रेय विपक्ष की एकजुटता और जनमत के बढ़ते दबाव दोनों को दिया जाना चाहिए. मोदी सरकार ने यूपीए के कार्यकाल में 2013 में पारित भूमि अधिग्रहण कानून में नौ संशोधन सुझाये थे, पर कानून […]

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भूमि अधिग्रहण कानून में प्रस्तावित मुख्य संशोधनों को लेकर एनडीए सरकार का रुख अगर अचानक से पलट गया है, तो इसका श्रेय विपक्ष की एकजुटता और जनमत के बढ़ते दबाव दोनों को दिया जाना चाहिए.

मोदी सरकार ने यूपीए के कार्यकाल में 2013 में पारित भूमि अधिग्रहण कानून में नौ संशोधन सुझाये थे, पर कानून के अध्ययन के लिए बनी संयुक्त संसदीय समिति की सोमवार को हुई बैठक में एनडीए के सदस्यों ने एक प्रस्ताव के जरिये छह संशोधनों को वापस लेने की बात मान ली, जिनमें किसानों की सहमति को जरूरी बतानेवाले प्रावधान खत्म करने से संबंधित संशोधन भी शामिल है.

2013 के कानून में भूमि अधिग्रहण से होनेवाले सामाजिक असर के आकलन की बात कही गयी थी.

यह भी कहा गया था कि कोई अधिकारी यदि प्रक्रियागत हेरफेर के जरिये भूमि-अधिग्रहण को संभव बनाता है, तो उस पर सीआरपीसी के तहत मुकदमा चलाया जायेगा.

सरकार ने संशोधनों के जरिये इन्हें भी खत्म करने की कोशिश की थी, पर आखिरकार उसे ये संशोधन वापस लेने पड़े. अब उम्मीद बंध चली है कि संसदीय समिति अगले दो दिनों में संसद में भूमि अधिग्रहण कानून के बारे में एक सहमतिसूचक रिपोर्ट पेश करेगी.

हालांकि सरकार को यह समझने में देर लगी कि विपक्ष ही नहीं, उसके कुछ सहयोगी दल और संगठन भी भू-अधिग्रहण कानून में ढीले देने के लिए लाये गये संशोधनों के खिलाफ हैं.

शिवसेना और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (अठावले) प्रस्तावित संशोधनों के विरुद्ध वोटिंग की बात कह चुकी थी. शिअद भी जता चुका था कि पंजाब के किसान संशोधनों को अपने हित के खिलाफ मानने लगे हैं.

बीजेपी के मातृसंगठन संघ की भावधारा से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच, भारतीय किसान संघ और भारतीय मजदूर संघ भी संशोधनों के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर कर चुके थे. कुल मिला कर संशोधनों के बारे में बीजेपी के भीतर और बाहर राय नकारात्मक थी.

सरकार बहुत कोशिशों के बावजूद विपक्ष, नागरिक संगठनों व सहयोगी दलों को यह समझाने में विफल रही कि ये संशोधन जरूरी हैं और भू-अधिग्रहण की प्रक्रिया बाधित होने से विकास-प्रक्रिया बाधित हो रही है.

अब संशोधनों को वापस लेकर सरकार ने जहां संसद की बाधित कार्यवाही को फिर से पटरी पर लाने की दिशा में एक कदम बढ़ाया है, वहीं बड़ी चतुराई से गेंद विपक्ष के पाले में डाल दी है.

अब जिम्मा विपक्ष का है कि वह भूमि अधिग्रहण कानून को एक तार्किक नतीजे तक पहुंचाने में सहयोगी और सकारात्मक रुख अपनाये.

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