आतंकवाद के खात्मे पर हो विचार
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :04 Aug 2015 11:16 PM (IST)
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याकूब की फांसी तय होते ही हमारे देश में तमाशों का जो दौर शुरू हुआ, वह अब तक जारी है. लोगों की भावना का ज्वार उभरना भी जरूरी था, क्योंकि ऐसे ही क्षणों में तो जनता में मानवता का भाव उत्पन्न होता है. जाति और धर्म का वास्तविक रूप ऐसे ही मौकों पर देखने को […]
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याकूब की फांसी तय होते ही हमारे देश में तमाशों का जो दौर शुरू हुआ, वह अब तक जारी है. लोगों की भावना का ज्वार उभरना भी जरूरी था, क्योंकि ऐसे ही क्षणों में तो जनता में मानवता का भाव उत्पन्न होता है.
जाति और धर्म का वास्तविक रूप ऐसे ही मौकों पर देखने को मिलता है. लोगों के नजरिये का सही मूल्यांकन भी ऐसे ही समय में होता है. ऐसे ही समय में कई लोग देश की सदभावना को भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं और याकूब के मामले में भी ऐसा ही माहौल तैयार करने का प्रयास किया गया.
आतंकवादी गतिविधियों में शामिल और मुंबई बम धमाके के अहम किरदार याकूब मेमन की फांसी के पहले और उसके बाद देश में जिस प्रकार की राजनीति की गयी, उसने न केवल सामाजिक समरसता को बल्कि पूरे राष्ट्र को शर्मसार किया है.
इसका कारण यह है कि याकूब की फांसी के मसले को देश के राजनीतिज्ञों ने किसी खास धर्म व संप्रदाय से जोड़ कर देखा और उसी के अनुरूप विखंडनकारी राजनीति के तहत उसे जीवनदान देने की कवायद भी की गयी.
राष्ट्रवाद की राजनीति करनेवाले नेताओं को फांसी के ठीक पहले न्याय, राज्य और राष्ट्रवाद का ख्याल आने लगा, तो मानवतावादियों को कुछ अलग ही दिखाई देने लगा.
कुछ ऐसे भी निकले, जिन्हें भारतीय न्याय प्रणाली में ही खोट दिखाई देने लगी. मगर इन सबसे ऊपर यह भी है कि आज देश में कितने लोगों को समय पर सही न्याय मिल पाता है?
मौत की सजा में बदलाव की वकालत करना कितना उचित है और किस अपराध में यह बदलाव होना चाहिए, यह बतानेवाला कोई नहीं है.
यदि सही मायने में लोगों को मानवता की रक्षा ही करनी है, तो वाद-विवाद को छोड़ आतंकवाद के खात्मे पर विचार करना होगा.
अनुराग मिश्र, पटना
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