तलाक का खराब रूप ‘तीन तलाक’

आशुतोष पांडेय पत्रकार, डॉयचे वेले एक साथ तीन बार ‘तलाक’ कह दिया और टूट गया रिश्ता? शादी के जिस संबंध को तमाम कसमों और गवाहों के सामने जोड़ा जाता है, उसे तोड़ने के इतने आसान नियम क्या स्वीकार्य होने चाहिए?भारत में सोशल मीडिया, स्काइप और मोबाइल फोन के जरिये तलाक के बढ़ते मामलों के मद्देनजर […]
आशुतोष पांडेय
पत्रकार, डॉयचे वेले
एक साथ तीन बार ‘तलाक’ कह दिया और टूट गया रिश्ता? शादी के जिस संबंध को तमाम कसमों और गवाहों के सामने जोड़ा जाता है, उसे तोड़ने के इतने आसान नियम क्या स्वीकार्य होने चाहिए?भारत में सोशल मीडिया, स्काइप और मोबाइल फोन के जरिये तलाक के बढ़ते मामलों के मद्देनजर कुछ मुसलिम महिला संगठनों समेत कई महिला अधिकार संगठन ‘तीन तलाक’ यानी एक ही बैठक में होनेवाले तलाक को गैरकानूनी घोषित किये जाने की मांग कर रहे हैं.
यहां मुसलमान पुरुष एक साथ तीन बार तलाक कह कर अपनी शादी खत्म कर सकते हैं, जबकि कई मुसलिम देशों में ये उच्चारण एक ही बार में ना करके, तीन महीने की अवधि में करने का नियम है, ताकि पति को तीसरे और अंतिम बार तलाक के उच्चारण से पहले अपने फैसले पर ठीक से विचार करने का मौका मिल सके. पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित कई इसलामी देशों में ‘तीन तलाक’ प्रतिबंधित है.
कई देशों में तो पति-पत्नी के बीच सुलह कराने के लिए मध्यस्थता परिषदों और न्यायिक हस्तक्षेपों का भी प्रावधान है. पर, भारत में स्थिति इससे अलग है. मुसलिम पर्सनल लॉ अब भी ‘तीन तलाक’ की अनुमति देता है. भारत में मुसलिम पर्सनल लॉ से जुड़े संहिताबद्ध कानून नहीं हैं. ये लॉ मुख्य रूप से अंगरेजों के समय के दो कानूनों द्वारा नियंत्रित होते हैं.
पहला 1937 एक्ट, जिसमें है कि भारत के मुसलमान शरिया से संचालित होंगे, लेकिन उसमें यह उल्लेख नहीं है कि शरिया में क्या है और क्या नहीं और शरिया के विभिन्न पहलू क्या हैं.
दूसरा है 1939 एक्ट, जिसमें ऐसे नौ कारणों का जिक्र है, जिनके आधार पर एक मुसलिम महिला तलाक के लिए अदालत जा सकती है. 1986 का रख-रखाव अधिनियम भी है, जिसके अनुसार तलाक के बाद मुसलिम महिला एकमुश्त रख-रखाव पाने की हकदार है.
भारतीय मुसलिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) की जाकिया सोमन कहती हैं, ‘तलाक जैसे मामले से जुड़े सभी पहलुओं का नियंत्रण ऐसे कुछ धार्मिक लोगों की समझ पर निर्भर करता है, जिनमें काफी सीमित और पितृसत्तात्मक सोच वाले पुरुष हैं. इसी का नतीजा हमें ट्रिपल तलाक और बहुविवाह की घटनाओं के रूप में दिखता है.’
बीएमएमए तीन तलाक पर प्रतिबंध लगाने के लिए पुरुषों सहित समुदाय के अन्य सदस्यों से समर्थन जुटा रहा है.पर, मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड और अन्य रूढ़ीवादी संगठन ट्रिपल तलाक पर प्रतिबंध नहीं लगाना चाहते. उनके अनुसार, यह इसलामी कानून का अभिन्न हिस्सा है. इस पर जाकिया सोमन कहती हैं, ‘हम भारत में चार स्थानों पर शरिया अदालतें चलाते हैं.
2014 में हमारे सामने आये करीब 250 मामलों में से अधिकतर ट्रिपल तलाक, एकतरफा तलाक, पत्नी या गवाहों की अनुपस्थिति में तलाक के मामले थे. ऐसे धार्मिक कानूनों में किसी भी तरह के सुधार लाने की कोशिशों को यह कह कर रोका जाता है कि धार्मिक मामलों में दखल मत दो. धार्मिक विद्वान कहते हैं कि कानून दिव्य है, जबकि हम सब जानते हैं कि कानून के बारे में कुछ भी दिव्य नहीं है और उसे इंसानों ने ही बनाया है.’
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