साझा खतरा है इसलामिक स्टेट

Published at :03 Aug 2015 8:09 AM (IST)
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साझा खतरा है इसलामिक स्टेट

एमजे अकब, प्रवक्ता भाजपा जब भारत अपने पश्चिम में उत्तरी अफ्रीका के नील नदी व साहेल इलाके तक सफावी, उस्मानी और यूरोपीय साम्राज्यों के उत्तराधिकारी देशों से नये संबंध बनाने की प्रक्रि या में है, उसे एक ऐसे क्षेत्र से पुन: संवाद स्थापित करना है जो पिछली दो सदियों से ठीक से सो नहीं सका […]

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एमजे अकब, प्रवक्ता भाजपा

जब भारत अपने पश्चिम में उत्तरी अफ्रीका के नील नदी व साहेल इलाके तक सफावी, उस्मानी और यूरोपीय साम्राज्यों के उत्तराधिकारी देशों से नये संबंध बनाने की प्रक्रि या में है, उसे एक ऐसे क्षेत्र से पुन: संवाद स्थापित करना है जो पिछली दो सदियों से ठीक से सो नहीं सका है. विश्लेषण करने का अर्थ कोई आरोप-प्रत्यारोप नहीं होता है. जैसा उस चिड़चिड़े यथार्थवादी शेक्सपियर ने लिखा है, गलती हमारे भीतर हो सकती है, न कि हमारी किस्मत में, लेकिन आदमी की तकदीर वक्त के पहियों के इर्द-गिर्द भी घूमती है. इतिहास ऐसे देशों के कंकालों से भरा पड़ा है जिन्होंने दुनिया में वहां-वहां तक राज किया, जहां तक पहुंच सके, फिर वे खत्म हुए और उपनिवेशवाद के पीड़ितों को अपने मलबे से नयी शुरुआत के लिए छोड़ गये. यह खोज कभी आसान नहीं रही है. सभी हस्तक्षेप गुमराह कर देते हैं. विघटन अस्थिर करता है.

बीसवीं सदी का बड़ा योगदान यह रहा है कि उसने 21वीं सदी को अधिक समानतावादी बनाया. हालांकि हमें सावधान रहना होगा कि हम इस अधिक समानतावादी होने का मतलब कितना दूर तक निकालते हैं. जरूरी नहीं है कि इसका मतलब लोकतंत्र की ओर समतामूलक बदलाव हो. लेकिन दखल करने या दबदबा रखनेवाले साम्राज्यों का युग समाप्त हो गया है. महाशक्तियों को अपनी गतिविधियों को लेकर अधिक महीन, और अपनी अपेक्षाओं को लेकर सावधान रहना होता है. बेहतर रिश्ते बनाने की कोशिश कर रहे किसी समकालीन कूटनीतिज्ञ काम निश्चित रूप से ईश्वर बनने का नहीं है. निर्णय देने का दैवीय अधिकार पूरी तरह से इतिहासकार के जिम्मे कर दिया जाना चाहिए.

भारत को पश्चिम एशिया और अफ्रीका में एक ठोस बढ़त है. इसे विरोधी सरकारों का सामना नहीं करना है. इस क्षेत्र के अधिकांश देश भारतीयों को, कभी-कभी तो लाखों भारतीयों को, अपने यहां रखते हैं, जो वहां काम करते हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं में रचनात्मक योगदान करते हैं. कूटनीतिक रूप से अक्सर शांत रहनेवाला महत्वपूर्ण सवाल यह है : हमारे दुश्मन नहीं हैं, पर क्या हमारे दोस्त भी हैं? इससे भी महत्वपूर्ण यह कि क्या दोस्ती रणनीतिक कसौटी पर खरी उतरेगी. यह महत्वपूर्ण है क्योंकि इस क्षेत्र का स्वभाव बदल चुका है. वर्ष 1973 के तेल की कीमतों में हुई क्र ांति से लेकर इस शताब्दी की शुरुआत तक यह क्षेत्र अलग-अलग स्तरों पर आर्थिक विकास का समानार्थी था और इस कारण इस विकास में सहभागी होने के इच्छुक सभी देशों का अच्छा सहयोगी था. आज संबंधों को निर्धारित करनेवाला सबसे बड़ा कारक बहुआयामीय संघर्ष के प्रति रवैया हो गया है. कई सारे युद्ध एक साथ जारी हैं, लेकिन अभी तक इनमें से सबसे खतरनाक चुनौती आतंकवाद के नये स्वरूप से है. अपने पिछले चरण में आतंक हमला कर भाग जाने या हमला कर खुद मर जाने के उन्मादी तेवर में था. बहुतों को इंटेलिजेंस एजेंसियां अन्य तरीकों से युद्ध के लिए इस्तेमाल करती थीं. इसलामिक स्टेट, यानी तथाकथित इसलामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया, के उदय ने पूरी स्थिति को बदल दिया है. यह सही है कि इसलामिक स्टेट क्षेत्रीय ताकतों के परस्पर विरोधी आकांक्षाओं के बीच से उभरा है. जैसा कि डॉ फ्रैंकस्टाइन के दानव के साथ हमेशा होता है, दानव अपने रचयिता के आदेश के दायरे से बाहर निकल गया. आज इस छद्म खिलाफत का अपना खुद का एजेंडा है, और यह अपने आसपास के राज्यों को अस्थिर करने का खतरा बन गया है. साथ ही, यह दूर-दराज के ठिकानों पर भी हत्याएं और तबाही अंजाम दे रहा है.

भारत में हम इस खतरे को बखूबी समझते हैं. इसलामिक स्टेट ने खुले रूप से भारत को शत्रु घोषित किया है. यह कूटनीतिक आवश्यकता है कि इसलामिक स्टेट के विरु द्ध एक साझा मोर्चा बनाने के लिए जरूरी जागरूकता बनायी जाए. इसने एक देश के बराबर इलाका कब्जा कर लिया है, और इसका राजस्व छोटे देश के बराबर है. लेकिन अस्थिरता फैलाने की इसकी क्षमता इस तथ्य में है कि यह शरारती संगठनों का बड़ा आश्रय बन गया है जिन्हें झूठी कल्पनाओं, पर अतिवादी इसलामवाद के द्वंद्व से पोषित के झंडे के नीचे पनाह मिल रही है. मुसलिमों के इतिहास में यह नयी बात नहीं है. हम जानते हैं कि इस मरणशील खतरे से विमुख नहीं हो सकते हैं या दूरी की वजह से चैन से नहीं रह सकते हैं.

दुश्मन हमारे दरवाजे पर खड़ा है, यह मनोवैज्ञानिक आधार पर नहीं कहा जा रहा है. भारत को पश्चिम एशिया की बड़ी ताकतों के साथ संबंध और रणनीतिक सूत्र मजबूत करना चाहिए ताकि आतंकवाद और आतंकी नव-राज्य के विरु द्ध साझा संघर्ष किया जा सके. भविष्य में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस क्षेत्र का दौरा करेंगे, निश्चित ही यह बात उनके दिमाग में होगी. उम्मीद है कि उनके मेजबान भी इसी तरह से सोच रहे होंगे. अगर समझ स्पष्ट होगी, तो बाकी चीजें आसान हो जायेंगी.

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