न हन्यते.. जाग्रत सपनों की उड़ान

Published at :31 Jul 2015 11:49 PM (IST)
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न हन्यते.. जाग्रत सपनों की उड़ान

डॉ बुद्धिनाथ मिश्र वरिष्ठ साहित्यकार उस शाम दिल्ली में साहित्य अकादमी के सभागार में मीराबाई पर सुधाकर अदीब द्वारा लिखित वृहदाकार उपन्यास ‘रंग राची’ का लोकार्पण था, जिसमें राष्ट्रीय राजधानी और बाहर के भी तमाम साहित्यिक उपस्थित हुए थे. कुछ मंच, कुछ दर्शक दीर्घा में. मसलन नामवर सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी, मृदुला गर्ग, कमल किशोर गोयनका, […]

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डॉ बुद्धिनाथ मिश्र
वरिष्ठ साहित्यकार
उस शाम दिल्ली में साहित्य अकादमी के सभागार में मीराबाई पर सुधाकर अदीब द्वारा लिखित वृहदाकार उपन्यास ‘रंग राची’ का लोकार्पण था, जिसमें राष्ट्रीय राजधानी और बाहर के भी तमाम साहित्यिक उपस्थित हुए थे. कुछ मंच, कुछ दर्शक दीर्घा में.
मसलन नामवर सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी, मृदुला गर्ग, कमल किशोर गोयनका, उदय प्रताप सिंह, प्रेम जनमेजय, अनामिका, लीलाधर मंडलोई आदि आदि. सुधाकर अदीब 1940 के दशक की सर्वाधिक लोकप्रिय फिल्म ‘रामराज्य’, ‘राम विवाह’ आदि में मयार्दापुरुषोत्तम राम की भूमिका में फबनेवाले नायक प्रेम अदीब के पौत्र हैं, प्रशासनिक अधिकारी हैं और छह ऐतिहासिक उपन्यास लिख चुके हैं. प्रेम की फिल्मों के प्रशंसकों में डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन, कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी से लेकर किशोर वय के विश्वनाथ त्रिपाठी तक रहे.
मीरांबाई की जीवनी पर अब तक अनेक उपन्यास हिंदी में तथा अन्य भाषाओं में लिखे जा चुके हैं, लेकिन राजकमल से प्रकाशित ‘रंग राची’ को सर्वाधिक प्रामाणिक और युक्तिसंगत माना गया है. निश्चय ही, इसके पीछे सुधाकर जी की गहन अनुसंधान-दृष्टि और असहज किंवदंतियों के कुहासों से निकाल कर मीरा को जीवंत रूप में प्रस्तुत करने की अंत:प्रेरणा का विशेष महत्व है.
अगले दिन नामवर जी का 89वां जन्मदिन था. इसलिए, मैंने उन्हें ‘अदीना: स्याम शरद: शतम्’ की शुभकामना दी. हमारे मंत्रों में जिस किसी तरह सौ वर्ष बिताने का कोई महत्व नहीं है.
‘अदीन’ होकर वृद्धावस्था की दीनता से नहीं, बल्कि पूरी तरह स्वस्थ, आत्मनिर्भर रह कर सौ वर्ष जीने की कामना की गयी है. नामवर जी उसी ऋषि-परंपरा में हैं, अपने गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी की तरह. बातों-बातों में नामवर जी ने बताया कि उनका असली जन्मदिन तो 28 जुलाई ही है. स्कूल में मास्टरजी ने उनका जन्मदिन पहली मई रख दिया, सो दुनिया उसे ही जानती-मानती है.
हम लोगों की पीढ़ी तक या उसके बहुत बाद भी यह ‘द्विज’ परंपरा यानी दो बार जन्म लेने की प्रथा खूब थी- जन्म कुंडली और हाइस्कूल के सर्टिफिकेट में जन्म की तारीखें अलग-अलग. संयोग से, मेरा भी जन्मदिन दुनिया की नजर में पहली मई ही है, जो गाजीपुर जनपद के रेवतीपुर गांव की संस्कृत पाठशाला में पूर्व मध्यमा परीक्षा का फॉर्म भरते समय गुरुजी ने भर दिया था; जबकि ज्योतिषाचार्य पिताजी की बनायी कुंडली में वास्तविक जन्मतिथि चार अक्तूबर है.
उस कार्यक्रम से निवृत्त होकर मैं ओएनजीसी के एक शीर्ष अधिकारी के साथ दिल्ली जिमखाना क्लब में डिनर करने चला गया. वहां एक से एक भूतपूर्व-अभूतपूर्व अधिकारी, पूर्व राज्यपाल, पूर्व सचिव आदि अलग-अलग समूहों में बैठे गुरदासपुर में हुई आतंकी घटना पर चर्चा कर रहे थे.
हम लोग कॉफी पर थोड़ी देर तक देश-काल की चर्चा करते रहे. इसके बाद खाने जा ही रहे थे कि जिसे अंगरेजी में ‘प्याले में तूफान’ कहते हैं, टीवी चैनलों पर एकाएक शिलांग में कलाम साहब के आकस्मिक निधन का बुरा समाचार तैरने लगा. वहां बैठे सभी लोग हक्का-बक्का रह गये.
वे आइआइएम, शिलांग के छात्रों को संबोधित कर रहे थे; उसी समय उन्हें हृदयाघात हुआ और वे अनंत आकाश में उड़ गये. बार-बार उनकी बातें याद आ रही थीं कि उन्हें भारत के राष्ट्रपति के रूप में नहीं, मिसाइलमैन के रूप में नहीं, बल्कि एक शिक्षक के रूप में याद किया जाये. यह उनका दृढ़ संकल्प ही था कि आखिरी वक्त भी वे एक महान शिक्षक की भूमिका में ही थे. ऐसी गौरवशाली मृत्यु किसी-किसी को मिलती है. अंगरेजी में ‘शिक्षक’ और ‘आचार्य’ के लिए अलग-अलग शब्द नहीं हैं, वरना वे सही अर्थो में आचार्य थे, क्योंकि उनका आचरण स्वयं में शिक्षा था.
न जाने कलाम साहब में क्या जादू था कि उन्हें हर कोई अपना मानता था. ऐसा हो भी क्यों न! जो व्यक्ति देश की सेवा के लिए आजीवन अविवाहित रहने की भीष्म प्रतिज्ञा करे, जीवन के अंतिम दिन भी पंजाब में हुई आतंकी घटना की चिंता करे और कांग्रेस द्वारा संसद न चलने देने पर संताप में झुलसे, जो व्यक्ति दिल्ली से शिलांग की कष्टप्रद यात्र की थकान की उपेक्षा कर तुरंत छात्रों के बीच जाने के लिए तैयार हो जाये, उसका जीवन साधारण नहीं था. वे इस दौर के भीष्म पितामह थे.
वे मृत्युंजय थे, इसीलिए सुदूर रामेश्वरम में जन्म लेकर उन्होंने सुदूर पूर्वोत्तर शिलांग में मृत्यु को वरण किया. यह भी उनकी समग्र राष्ट्रीय चेतना का एक अद्भुत उदाहरण था. उस दुखद समाचार को सुनने के बाद हम दोनों बिना खाये उठ खड़े हुए. ऐसा और कइयों ने किया. मैं बेमन से स्टेशन गया और देहरादून लौट आया.
याद आया दस साल पहले देहरादून का वह ऐतिहासिक दिन, जब राष्ट्रपति कलाम 14 अगस्त, 2005 को ओएनजीसी के स्वर्ण जयंती समारोह का उद्घाटन करने आये थे. उससे कुछ दिन पहले ही मुंबई हाइ प्लेटफार्म पर कार्मिकों को ले जा रहा हेलीकॉप्टर दुर्घटना-ग्रस्त हो गया था, जिससे ओएनजीसी प्रबंधन पूरे अवसाद में था.
समारोह के प्रारंभ में एक कोरस गीत था, जिसमें स्वर्ण जयंती के सुख और प्लेटफार्म दुर्घटना के अवसाद को एक साथ मैंने पिरोया था. उसे गाने के लिए ओएनजीसी के सभी कार्यस्थलों से 51 गायक-गायिकाओं को चुना गया था. कलाम साहब ने उस गीत को पूरे मनोयोग से सुना और इतने अभिभूत हुए कि कोरस में शामिल सभी कार्मिकों से हाथ मिला कर शाबाशी दी.
इसके बाद वे घेरा तोड़ कर बच्चों से केवल मिले ही नहीं, उनसे बातें भी कीं. बच्चों में वे भारत का भविष्य देखते थे. उन्होंने देश की नयी पीढ़ी को पहली बार सपने देखना सिखाया था. उनके अनेक प्रेरक वाक्य आज स्कूली छात्र-छात्रओं के लिए गुरुमंत्र बन गये हैं. जब उन्होंने ‘विजन 2020’ की परिकल्पना की थी, किसी को यकीन नहीं था, मगर आज वह संभव होते दीखता है.
आज से कई दशक पहले रामेश्वरम की मसजिद वाली गली के निवासी जैनुल आबदीन की सातवीं संतान एपीजे अब्दुल कलाम नामक बालक ने अपनी छात्रवस्था में घर की आर्थिक स्थिति में योगदान देने के लिए धनुष्कोटि स्टेशन से अखबार लाकर बेचते हुए एक बड़ा सपना देखा था, जाग्रत सपना.
यह उसके बड़े सपनों की उड़ान ही थी कि आज वह देश-विदेश के अखबारों में छाया हुआ है और आनेवाली सदियों में वह छाया रहेगा, क्योंकि उसका जो भी सपना था, सब देश के लिए था. हमें इस बात पर हमेशा गर्व रहेगा कि हमारे युग में एक ऐसा महानायक हुआ, जिसके जीवन का एक-एक क्षण भारत के अभ्युदय का खाका खींचने में व्यतीत हुआ. वे नवभारत की आत्मा थे और आत्मा कभी नष्ट नहीं होती-न हन्यते हन्यमाने शरीरे..
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