हम कब ‘लोकतंत्र के राजा’ बनेंगे?

Published at :14 Jul 2015 11:45 PM (IST)
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हम कब ‘लोकतंत्र के राजा’ बनेंगे?

प्रकाश नारायण सिंह कंटेंट एडिटर, एबीपी न्यूज देश में जाति, धर्म और राष्ट्रवादी हुंकार के बीच अफवाहों का बाजार बहुत तेजी ऊपर उठ रहा है. 56 इंच के सीने का प्रचार कर रहे लोगों को पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार ने यह कह कर जोर का झटका दिया है कि, ‘बातचीत में जब तक कश्मीर का […]

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प्रकाश नारायण सिंह
कंटेंट एडिटर, एबीपी न्यूज
देश में जाति, धर्म और राष्ट्रवादी हुंकार के बीच अफवाहों का बाजार बहुत तेजी ऊपर उठ रहा है. 56 इंच के सीने का प्रचार कर रहे लोगों को पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार ने यह कह कर जोर का झटका दिया है कि, ‘बातचीत में जब तक कश्मीर का एजेंडा शामिल नहीं किया जाता, तब तक कोई बातचीत नहीं होगी.’ उधर, बिहार की चुनावी सियासत में कांव-कांव शुरू हो चुका है. सियासत कठघरे में है. विकास के मुद्दे पीछे छूट गये हैं.
धर्म और जाति का कॉकटेल बनाया जा रहा है. कोई किसी से पीछे नहीं है. ‘वोट के लिए कुछ भी करेगा’ की संरचना सर्वदलीय है. इसके लिए किसी एक दल को जिम्मेदार ठहराना गलत होगा. बिहार की चुनावी बिसात में अपने मोहरे को सूबे की सत्ता का शिखर बनाने के लिए प्रधानमंत्री की जाति भी अब देश में महत्वपूर्ण होने लगी है. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि बीजेपी ने पहली बार देश को पिछड़ा प्रधानमंत्री दिया है.
पिछड़ों की ठेकेदारी करनेवाले तिलमिला गये. लालू यादव बोले कि देवगौड़ा पिछड़े थे और मैंने उन्हें पीएम बनाया. नीतीश कुमार भी बोल पड़े. दलितों की ठेकेदारी रामविलास पासवान के हिस्से थी, जिसमें नीतीश ने सेंध लगायी थी और महादलित बनाया था, लेकिन उस पर पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी अपना दावा ठोक रहे हैं!
‘कांइयापन’ के ‘स्विंग’ से हम भोले अकसर हार जाते हैं! कभी वोटों की गुल्लक को भरने के लिए रथयात्र निकाली गयी. दो भाइयों को हिंदू और मुसलमान में बांटा गया.
तहजीब पर कई जगहों पर दंगों के रूप में तमाचे पड़े. देश अंदर और बाहर से आग में धधकने लगा. कई जगहों पर इंसानियत को गहरे जख्म मिले. और फिर शुरू हुआ वोटों की फसल काटने का सिलसिला. इस सिलसिले को जारी रखने के लिए अब टोपी की सियासत भी शुरू हो चुकी है.
चुनाव बिहार में होने हैं, पर इफ्तार की राजनीति पटना से लेकर दिल्ली तक हो रही है. वोटबैंक की हकीकत को देखते हुए बीजेपी ने बिहार में खुद तो इफ्तार की दावत नहीं दी, पर सहयोगी रामविलास पासवान की इफ्तार पार्टी में सारे नेता टोपी लगाये नजर आये. सियासत में ‘शऊर’ की उम्मीद दिखानेवाले केजरीवाल भी इफ्तार और टोपी की सियासत समझ चुके हैं. टोपी की सियासत समझ कर वह अब आम लोगों की उम्मीदों को ‘टोपी’ पहना रहे हैं.
कभी मंडल ने, कभी कमंडल ने, तो कभी सियासी रथों ने देश में जाति और धर्म की दीवार खींचीं. समाजवाद की सियासत हुई, बहुजन समाज की सियासत हुई और इन सब में हारा देश और देश के वासी. राजनेताओं ने अपने स्वार्थ साधे और साझा सरकारें बनीं. ‘कभी तुम, कभी हम’ का सूत्र इस्तेमाल हुआ.
देश बदहाल हुआ. डॉ राममनोहर लोहिया इसे दूसरे तरीके से कहते थे, ‘राजनीति अल्पकालीनधर्म है और धर्म दीर्घकालीन राजनीति’. ‘हम भारत के लोग’ पता नहीं कब जाति, धर्म और ‘हुंकार’ पर समझदार होंगे.
हम कब भूख, भय और भ्रष्टाचार पर सही समय पर सही निर्णय लेंगे? हम कब वोट की चोट को व्यवस्था के कोढ़ पर मारेंगे? मुझे समझ नहीं आता कि हम कब सच्चे अर्थो में ‘लोकतंत्र का राजा’ बनेंगे?
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