विकास की राजनीति
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :14 Jul 2015 12:34 AM (IST)
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बिहार चुनाव के मुहाने पर खड़ा है, तो कुछ पार्टियां फिर से जाति की गंगा में डुबकी लगाने के लिए नये मंत्र गढ़ने या पुराने मंत्रों में प्राण फूंकने की कोशिश में जुट गयी हैं. एक पार्टी कह रही है, हमने देश को पहला ओबीसी प्रधानमंत्री दिया है. वह भूल रही है कि पूर्व में […]
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बिहार चुनाव के मुहाने पर खड़ा है, तो कुछ पार्टियां फिर से जाति की गंगा में डुबकी लगाने के लिए नये मंत्र गढ़ने या पुराने मंत्रों में प्राण फूंकने की कोशिश में जुट गयी हैं. एक पार्टी कह रही है, हमने देश को पहला ओबीसी प्रधानमंत्री दिया है. वह भूल रही है कि पूर्व में एचडी देवगौड़ा भी इस पद पर रह चुके हैं.
पार्टी यह भी भूल रही है कि महज साल भर पहले उसने देश को जाति और धर्म के संकीर्ण खांचों से ऊपर उठा कर ‘सबका साथ-सबका विकास’ के वादे के साथ सरकार बनायी थी. दूसरी पार्टी कह रही है कि सामाजिक-आर्थिक जनगणना के वे आंकड़े सामने लाइये, जिनमें जातियों की राज्यवार संख्या बतायी गयी है.
यह पार्टी भूल रही है कि जातियों की जनगणना भारतीय लोकतंत्र के भीतर जातियों का संख्याबल निर्धारित करने के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए पात्र व्यक्ति और परिवार के चयन के मकसद से की गयी है. किसी देश का प्रधानमंत्री या राज्य का मुख्यमंत्री किसी एक जाति या धर्म समुदाय का बन जाये, या प्रशासन में किसी खास जाति या धर्म समुदाय का दबदबा नजर आये, तो यह गौरव की बात नहीं है. लोकतंत्र सिर्फ बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक हितों की वरीयता का नाम नहीं है, वह एक ऐसी राजव्यवस्था कायम करने का नाम है जो ‘सर्वजन हिताय’ को बढ़ावा देनेवाली हो.
और फिर किसी जाति या धर्म के व्यक्ति के पीएम या सीएम बन जाने से यह सिद्ध नहीं होता कि उसके हर व्यक्ति के हाथ मजबूत हो गये. हालांकि इन सबके बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि वे जाति के नाम पर नहीं, काम के आधार पर वोट मांगेंगे. यदि वे अपने इस बयान पर कायम रहते हैं, तो यह अच्छी बात होगी.
उत्तर भारत में 20वीं सदी के आखिरी दशकों में जाति की राजनीति के फलने-फूलने पीछे यह आकांक्षा काम कर रही थी कि इससे जातियों और समुदायों के बीच विकास के पैमाने पर कायम असमानता की खाई कम होगी. लेकिन, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के हालिया अध्ययन के मुताबिक इस समय दुनिया में करीब 1.6 करोड़ लोग बहुअयामी गरीबी में जीने के लिए अभिशप्त हैं, जिनमें से करीब 44 करोड़ लोग भारत के आठ बड़े राज्यों- बिहार, झारखंड, यूपी, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओड़िशा, राजस्थान व पश्चिम बंगाल- में निवास करते हैं. उधर, सामाजिक-आर्थिक जनगणना के ताजा आंकड़े बताते हैं कि देश के ग्रामीण इलाकों के रहनेवाले 92 फीसदी परिवारों की आय प्रतिमाह दस हजार रुपये से कम है.
गांवों के तीन चौथाई परिवारों की मासिक आय तो पांच हजार रुपये से भी कम है. करीब 51 फीसदी ग्रामीण परिवारों की आजीविका दिहाड़ी के भरोसे चलती है. दूसरी ओर, भारत में आबादी के अनुपात में स्कूलों व अस्पतालों की संख्या वैश्विक औसत से काफी कम है.
एनएसएसओ की नयी रिपोर्ट बताती है कि देश की 86 फीसदी ग्रामीण और 82 फीसदी शहरी आबादी को स्वास्थ्य के मद में होनेवाले खर्च की भरभाई के लिए चल रही किसी भी सरकारी योजना का लाभ हासिल नहीं है. आलम यह है कि ग्रामीण परिवार को बच्चे के जन्म के समय यदि जननी और शिशु दोनों के जीवन की रक्षा करनी हो तो अस्पताली प्रसव पर औसतन प्रति प्रसव 5,544 रुपये खर्च करने पड़ते हैं. इन सबके बीच, खाद्य एवं कृषि संगठन की हालिया रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में करीब 80 करोड़ लोग भुखमरी से जूझ रहे हैं, जिनमें एक चौथाई यानी करीब 20 करोड़ लोग भारत में हैं.
इन लोगों को भुखमरी की स्थिति से निजात दिलाने के लिए प्रतिव्यक्ति सालाना 10 हजार रुपये की जरूरत है. जाहिर है, देश और प्रदेशों में असली चुनौती ऐसी सरकारें चुनने की है, जो प्रतिव्यक्ति सालाना कम-से-कम 10 हजार रुपये खर्च करने की नीयत से विकास की दूरगामी नीति बनाये. क्या जाति या धर्म के आधार पर राजनीतिक हित विचारने मात्र से इस नीयत की गारंटी हो सकती है?
21वीं सदी में भारतीय राजनीति बहुत मुश्किल से जाति-धर्म के जुमलों से उबर कर विकास के मुहावरे तक पहुंची है. केंद्र एवं ज्यादातर राज्यों की मौजूदा सरकारों को लोगों ने विकास के मुहावरे से ही चुना है. ऐसे में बिहार में जो पार्टियां सत्ता पाने के लिए संघर्षरत हैं और जो सत्ता पर काबिज हैं, दोनों की साझी जिम्मेवारी बनती है कि विकास के मुहावरे तक आ पहुंची सर्वजन हित विचारनेवाली राजनीति को वे इस नयी राह पर ही चलने दें.
समान भाव से सभी गरीबों का विकास ही वह रास्ता है, जिस पर चल कर देश या प्रदेश का टिकाऊ विकास हो सकता है और सामाजिक समरसता भी कायम रह सकती है.
देश या किसी प्रदेश की राजनीति को फिर से जाति-धर्म के संकीर्ण खांचों में कैद करने की किसी भी कोशिश के बारे में यही समझा जायेगा कि ऐसा करनेवाली पार्टियां यथास्थितिवाद की राजनीति कर रही हैं, परिवर्तन की राजनीति नहीं.
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