सार्क की मजबूती की दिशा में पहल

Published at :12 Jul 2015 11:25 PM (IST)
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सार्क की मजबूती की दिशा में पहल

एमजे अकबर प्रवक्ता, भाजपा भारत-पाकिस्तान संबंध इतिहास, भूगोल, विचारधारा, षड्यंत्र, अनिश्चितता और भूल-चूकों से प्रभावित होते हैं. कश्मीर के लिए पाकिस्तान द्वारा 1947 में स्वतंत्रता के दस हफ्तों के भीतर शुरू किये गये युद्ध के समय से ही भले उद्देश्य लड़ाकों के मलिन वस्त्रों में दफन किये जाते रहे हैं. अपने आयामों में- घोषित, अघोषित- […]

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एमजे अकबर

प्रवक्ता, भाजपा

भारत-पाकिस्तान संबंध इतिहास, भूगोल, विचारधारा, षड्यंत्र, अनिश्चितता और भूल-चूकों से प्रभावित होते हैं. कश्मीर के लिए पाकिस्तान द्वारा 1947 में स्वतंत्रता के दस हफ्तों के भीतर शुरू किये गये युद्ध के समय से ही भले उद्देश्य लड़ाकों के मलिन वस्त्रों में दफन किये जाते रहे हैं.

अपने आयामों में- घोषित, अघोषित- युद्ध ने समझदार लोगों को भी कमजोर यथास्थिति में शरण लेने के लिए विवश कर दिया है. भारत और पाकिस्तान की विचारधाराएं एक-दूसरे के प्रतिकूल भले नहीं हों, पर उनमें उद्देश्यों के टकराव जरूर हैं. जो संघर्ष के पक्षधर हैं, उन्होंने इस संबंध में लगभग प्रत्यक्ष बारूदी सुरंगों के जरिये इसका संकेत देते रहते हैं.

भविष्य एक ऐसे रणनीतिक माहौल का बंधक है, जहां एक देश का रक्षा मंत्री भी बेपरवाही से परमाणु हथियारों का जिक्र कर देता है. शायद इसका एक औचित्य भी है. जब नेतागण शांति की कोशिशों में लगे रहते हैं, युद्धोन्मादियों को युद्ध की बातों की खुराक दी जाती है.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को सावधानी में चूक के लिए दोषी नहीं माना जा सकता है. पिछली बार जब उन्होंने भारत के साथ शांति की कोशिशें की थीं, तो उन्हें पद से हाथ धोना पड़ा था और किसी तरह उनकी जान बची थी. उनके उत्तराधिकारी जेनरल परवेज मुशर्रफ ने कुछ पैंतरेबाजी के बाद शांति-प्रक्रि या को बहाल रखने का प्रयास किया था, लेकिन आगरा शिखर-सम्मेलन में भारत-पाकिस्तान वार्ता के सबसे मुश्किल दिन वे खुद पर काबू नहीं रख सके थे. राजनीति और नियति ने नवाज शरीफ को दूसरा मौका दिया है. उन्होंने एक बार फिर कोशिश करने की हिम्मत दिखायी है. कामयाबी की तलाश में लगे भारत और पाकिस्तान को नाकामाबियों के अनुभवों से फायदा मिलेगा.

एक पुनर्जीवित सार्क के उद्देश्य की दिशा में यह प्रधानमंत्री मोदी की आखिरी, लेकिन बहुत महत्वपूर्ण कोशिश है, जिसके तहत साझी शांति के माहौल में वंचितों को समृद्धि उपलब्ध करायी जा सके. इस कोशिश की नींव उनके शपथ-ग्रहण के दिन डाली गयी थी जब सभी सार्क नेता नयी दिल्ली आमंत्रित किये गये थे.

शरीफ को उस आमंत्रण से अजीब जरूर लगा होगा, पर उन्होंने इसे हाथों-हाथ लिया था. जैसा कि पहले भी हुआ है, साजिश करनेवाले सक्रि य हुए, परंतु नरेंद्र मोदी अपनी राह पर चलते रहे. पाकिस्तान ने इन घटनाओं को बारीकी से जरूर देखा होगा.

नियति ने एक शर्त रखी थी : उन्हें अपनी पहल से पहले पाकिस्तान के उत्तर के बारे में आश्वस्त होना था. जनवरी के आखिरी सप्ताह में सुब्रमण्यम जयशंकर को विदेश सचिव नियुक्त किया गया था. अपने व्यस्त कार्यक्रमों में से उन्होंने चुपचाप पाकिस्तान जाने का एक अवसर निकाला. निश्चित रूप से हमें नहीं मालूम कि उस यात्र में क्या हुआ, परंतु यह जानने के लिए बहुत समझ की जरूरत नहीं है कि चीजें फिर पटरी पर आ रही थीं.

आगरा शिखर सम्मेलन आतंकवाद की परिभाषा को लेकर असफल हो गया था. इसके अर्थ पर सहमति निश्चित ही बहुत महत्वपूर्ण थी. इसे हासिल किया गया. इसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान 2008 के मुंबई हमले के आरोपियों के मुकदमे की कार्यवाही को तेज करने पर सहमत हो गया है.

लेकिन जिस बात ने पूरी स्थिति को आकार दिया, वह है 2016 के सार्क शिखर सम्मेलन में पाकिस्तान जाने का प्रधानमंत्री मोदी का निर्णय. यही वह तत्व है जो उफा वार्ता को 2014 के शपथ-ग्रहण से और बढ़ते संघर्षों की जगह आर्थिक विकास से ऊर्जावान नये उपमहाद्वीप के लक्ष्य से जोड़ता है.

कोई भी समझदार व्यक्ति यह नहीं मानेगा कि इससे सभी समस्याएं हल की जा सकती हैं, लेकिन उनका समाधान परस्पर सहमति से बनी व्यवस्थाओं से किया जा सकता है. आगरा बैठक के बाद ऐसी व्यवस्था बनी थी और अगर 2004 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी दुबारा चुने जाते, तो उसे बहाल किया जाता.

सावधान रहना ही काफी नहीं है. भारत-पाकिस्तान संबंधों को हमेशा सावधानी, पूर्व-सावधानी, और यह शब्द गढ़ा जा सकता है, तो उत्तर-सावधानी के साथ देखा जाना चाहिए. इनमें से आखिरी तत्व बहुत महत्वपूर्ण है. साजिशें रचनेवाले कुछ समय के लिए शांत जरूर हो सकते हैं, पर वे समाप्त नहीं हुए हैं.

अगर सीमाओं पर खून बहता है, तो माहौल विषाक्त होता है. दोनों देशों ने इस बात को समझा है, और तनावों को कम करने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठकों का निर्णय लिया गया है. भले ही इसका उल्लेख नहीं किया गया है, पर सबसे बड़ी चिंता अस्थिरता पैदा करने की क्षमता से लैस व्यापक आतंकवाद को लेकर है.

शांति के लिए इस पहल की सर्वाधिक बड़ी ताकत दोनों देशों में मिला जनमत का अपार समर्थन है. लोग बीते हुए समय से आगे की ओर उठ खड़े हुए हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि भविष्य को परिवर्तित करने की एकमात्र राह बस यही है.

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