जवाब भी दे कांग्रेस

हमारे देश में हाल के वर्षो में सामने आये ज्यादातर बड़े घपलों-घोटालों में दो बातें समान रूप से मौजूद रही हैं. पहली यह कि इनमें कई दलों के नेताओं, उनके करीबी नौकरशाहों और उद्योगपतियों के नाम शामिल रहे हैं. दूसरी यह कि इन घपलों-घोटालों के तार कालेधन से भी जुड़े रहे हैं. लेकिन, त्वरित जांच […]
हमारे देश में हाल के वर्षो में सामने आये ज्यादातर बड़े घपलों-घोटालों में दो बातें समान रूप से मौजूद रही हैं. पहली यह कि इनमें कई दलों के नेताओं, उनके करीबी नौकरशाहों और उद्योगपतियों के नाम शामिल रहे हैं. दूसरी यह कि इन घपलों-घोटालों के तार कालेधन से भी जुड़े रहे हैं. लेकिन, त्वरित जांच और कठोर सजा की जगह, ऐसे ज्यादातर मामले राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के भंवरजाल में फंस कर कुछ समय बाद हमारी आंखों से ओझल हो जाते हैं.
कभी-कभार कुछ मुकदमों में कुछ लोग कुछ दिनों के लिए गिरफ्तार कर लिये जाते हैं, लेकिन जैसे ही कोई नया मामला सामने आता है, सारी चर्चा और सारे आरोप-प्रत्यारोप उसी के इर्द-गिर्द सिमट जाते हैं. क्रिकेट बोर्ड, आइपीएल और ललित मोदी से जुड़ा पूरा प्रकरण इसका एक ज्वलंत उदाहरण है. प्र्वतन निदेशालय (इडी) की जांच का सामना करने से बचने के लिए इंग्लैंड भाग गये ललित मोदी की मदद करने और उनसे सांठगांठ के आरोप विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, राजस्थान के मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और भाजपा सांसद दुष्यंत सिंह पर हैं.
इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने की जगह केंद्र सरकार और भाजपा उनका बचाव कर रही है. दूसरी ओर विपक्षी कांग्रेस इसे सरकार को घेरने के एक जोरदार मौके के रूप में इस्तेमाल कर रही है. लेकिन, हमें नहीं भूलना चाहिए कि ललित मोदी ने वर्तमान केंद्रीय वित्त मंत्री के अलावा यूपीए सरकार के दो वित्त मंत्रियों पर भी कई गंभीर आरोप लगाये हैं. ‘पिक्चर अभी बाकी है’ के जुमले के साथ मोदी अपने तर्क और दस्तावेज लगातार सार्वजनिक कर रहे हैं.
ऐसे में केंद्र सरकार की जिम्मेवारी बनती है कि ललित मोदी और आइपीएल से जुड़े पूरे प्रकरण की गंभीरता से जांच कराये. इस कड़ी में जरूरत पड़ने पर भारतीय क्रिकेट में फैले भ्रष्टाचार की सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में हो रही जांच का दायरा भी बढ़ाया जा सकता है. वहीं इस प्रकरण से राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश में लगी कांग्रेस को अपने नेताओं के खिलाफ लगे आरोपों का समुचित और संतोषजनक जवाब भी देना चाहिए. दस वर्षो तक सत्ता पर काबिज रही पार्टी को इन सवालों का जवाब देना ही होगा कि क्रिकेट और काले धन के गठजोड़ पर लगाम के लिए उसकी सरकार ने क्या कदम उठाये थे. केंद्र पर जांच के लिए दबाव बनाना तो ठीक है, लेकिन दूसरों पर अंगुली उठाने से पहले अपने दामन पर लगे दाग की सफाई भी तो जरूरी है. आखिर देश पक्ष-विपक्ष के आरोपों की राजनीतिक नूरा-कुश्ती में कब तक लुटता रहेगा?
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