बिजली आती है, तो बरबाद ही होती है!

Published at :28 Sep 2013 3:31 AM (IST)
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बिजली आती है, तो बरबाद ही होती है!

।।विशाल दत्त ठाकुर।।(प्रभात खबर, देवघर)ऊर्जा की बचत ही इसका का उत्पादन है, जल ही जीवन है, बिन पानी सब सून– जैसे कई स्लोगन आपको सरकारी कार्यालयों, रेलवे स्टेशनों, सार्वजनिक स्थलों पर मोटे–मोटे अक्षरों में लिखे मिलेंगे. हम शायद ही कभी इन बातों को ध्यान से पढ़ते, समझते या इस पर अमल करते हैं. पिछले दिनों […]

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।।विशाल दत्त ठाकुर।।
(प्रभात खबर, देवघर)
ऊर्जा की बचत ही इसका का उत्पादन है, जल ही जीवन है, बिन पानी सब सूनजैसे कई स्लोगन आपको सरकारी कार्यालयों, रेलवे स्टेशनों, सार्वजनिक स्थलों पर मोटेमोटे अक्षरों में लिखे मिलेंगे. हम शायद ही कभी इन बातों को ध्यान से पढ़ते, समझते या इस पर अमल करते हैं. पिछले दिनों अपने घर भागलपुर जाना हुआ. वहां गंभीर बिजली संकट का सामना करना पड़ा. 10-12 घंटे बिजली गुल रहने की समस्या. अखबार में ब्लैक आउट की खबरें मोटेमोटे अक्षरों में छपी दिखीं.

बिहार
में पिछले दिनों बिजलीकर्मियों की हड़ताल और इस दौरान हड़ताली कर्मचारियों की पुलिस से हुई झड़प के कारण ऐसी समस्या उत्पन्न हुई थी. बिजली नहीं रहने पर लोग बेचैन हो जाते हैं. विभाग और सरकार को कोसते हैं. लेकिन जब बिजली रहती है, तो इसका जम कर दुरुपयोग भी करते हैं. हमें ऐसे उदाहरण रोज दिख जाते हैं. सरकारी कार्यालयों के कमरों में भले कोई कर्मचारी हो, लेकिन वहां कई बल्ब, टय़ूब लाइट और पंखे बेवजह जलतेचलते रहते हैं. लोग बिजली मिलने पर जाम लगाते हैं, बिजली कार्यालय में तोड़फोड़ करते हैं.

वहीं दूसरी ओर बिजली रहने पर जब किसी चौक पर दिन के उजाले में वेपर लाइट जलते दिख जाती है, तो उसे बंद करना अपना कर्तव्य नहीं समझते. अपने घर में बिना जरूरत के भी बल्ब, पंखा, एसी, कूलर, मोटर आदि जलाते, चलाते रहते हैं. पिछले महीने बाबा नगरी के नाम से मशहूर देवघर में विश्व प्रसिद्ध श्रवणी मेला संपन्न हुआ. मेला कांवरिया पथ में हजारों अस्थायी दुकानें सजीं. सभी दुकानों में गलीगली में बिजली की चकाचौंध रात में तो बहुत आकर्षक लगती थी. लेकिन अधिकांश दुकानों में दिन में भी दर्जनों बल्ब जलते रहते थे. प्रसंगवश एक वाकया बताना चाहता हूं कि मैंने कुछ वर्ष पूर्व रिपोर्टिग के दौरान विद्युत विभाग के एक आला अधिकारी के कार्यालय में जब उनसे यह सवाल किया कि महाशय, दिन के उजाले में दोदो खड़की रहने के बावजूद दोदो टय़ूबलाइट जलाने की जरूरत क्या है? क्या यह बिजली की बरबादी नहीं है? इस सवाल का उनके पास कोई जवाब नहीं था.

मैंने आगे सवाल किया कि सरकारी कार्यालयों, स्टेशनों, अस्पतालों, चौकचौराहे या बाजार में दिन के उजाले में बिजली की जो बरबादी हो रही है, अगर इसकी बचत की जाय तो कितनी ऊर्जा बच सकती है? जवाब में उन्होंने कहा कि इस तरह हम 20-25 फीसदी बिजली की बचत कर सकते हैं. बिजली विभाग कटिया फंसा कर बिजली चोरी करनेवालों के खिलाफ खूब सक्रिय रहता है, पर जो बिजली वह अपनी लापरवाही से बरबाद करता है, उस पर उसकी नींद नहीं खुलती. अपने देश में जिस तरह बिजली की बरबादी होती है, उसे देखते हुए प्रधानमंत्री जी की परमाणु बिजली उत्पादन की कोशिश भी मिट्टी ही हो जानी है.

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