मुंबई से उठते सवाल
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :20 Jun 2015 5:19 AM (IST)
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मॉनसून की बारिश के पहले ही दिन मुंबई डूबने लगी है. शहर ठप है और अगले 24 घंटे तक बारिश जारी रहने का अनुमान है. गुरुवार को महानगर में हुई 60.34 मिलीमीटर वर्षा बृहन्मुंबई महानगरपालिका की तैयारी के दावों को बहा ले गयी. हद तो यह है कि 116 और 112 करोड़ की लागत के […]
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मॉनसून की बारिश के पहले ही दिन मुंबई डूबने लगी है. शहर ठप है और अगले 24 घंटे तक बारिश जारी रहने का अनुमान है. गुरुवार को महानगर में हुई 60.34 मिलीमीटर वर्षा बृहन्मुंबई महानगरपालिका की तैयारी के दावों को बहा ले गयी.
हद तो यह है कि 116 और 112 करोड़ की लागत के दो वाटर पंपों का उद्घाटन शिव सेना प्रमुख और अन्य नेताओं द्वारा बुधवार को ही किया गया था, पर 6,000 लीटर पानी प्रति सेकेंड निकालनेवाले ये पंप गुरुवार को अक्षम साबित हुए. उल्लेखनीय है कि मुंबई में बारिश के दौरान ऐसी बदहाली एक दशक से बार-बार दिख रही है.
महानगरपालिका पर शिव सेना-भाजपा गंठबंधन करीब दो दशकों से काबिज है और केंद्र तथा राज्य में भी अब इसकी सरकार है. बारिश के दौरान मुंबई, दिल्ली, कोलकाता जैसे कई बड़े शहरों की हालत दयनीय हो जाती है, तो देश के ज्यादातर छोटे शहरों की स्थिति का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है.
सरकारों, नगरपालिकाओं और नगर निगमों से पूछा जाना चाहिए कि उनके पास शहरों को सुव्यवस्थित बनाने की क्या योजनाएं हैं और क्या उन्होंने मौजूदा खामियों का कोई गंभीर अध्ययन किया है? बार-बार केंद्र सरकार, विशेषकर वित्त मंत्री अरुण जेटली, की ओर से विकास दर के सात से 7.5 फीसदी तक पहुंचने की संभावनाएं जतायी जाती हैं, लेकिन क्या यह ग्रोथ इंजन माने जानेवाले शहरों की अनियोजित, असंगठित और असंतुलित संरचना के रहते हुए सुनिश्चित किया जा सकता है?
इस वर्ष फरवरी में स्मार्ट सिटी और 2022 तक सबके लिए आवास पर विचार-विमर्श के बाद केंद्रीय शहरी योजना मंत्री एम वेंकैया नायडू ने पिछली सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए ठोस पहलों की संभावना का संकेत दिया था, पर अब तक सरकार ने सक्रियता नहीं दिखायी है. मुंबई को ‘प्रतिस्पर्धात्मक, समावेशी एवं सत्तत’ महानगर बनाने के महानगरपालिका के मंतव्य का कोई मानदंड तय नहीं है. इस कारण उनका मूल्यांकन भी संभव नहीं है. मुंबई में 12 मिलियन आबादी बसर करती है, पर पार्कों और मैदानों के रूप में दो फीसदी खुली जगह भी नहीं है. जल-निकासी के रास्ते पहले अवरुद्ध हैं.
तकरीबन 7,060 करोड़ रुपये केंद्र ने 100 स्मार्ट शहर विकसित करने के लिए आवंटित किये हैं. परंतु यह भी सोचा जाना चाहिए कि अगर पहले से बसे शहरों की दुर्गति होती रही, तो फिर विकास और वृद्धि दर के तमाम दावे और वादे बेमतलब हो जायेंगे. आशा है कि सरकारें जमीनी हकीकत के मुताबिक कदम उठायेंगी.
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