विडंबनाओं के अर्थशास्त्र में उलझा आम आदमी

Published at :17 Jun 2015 5:29 AM (IST)
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विडंबनाओं के अर्थशास्त्र में उलझा आम आदमी

राजीव रंजन झा संपादक, शेयर मंथन एक खुदरा दुकानदार कितने मार्जिन पर आपको गेहूं या आटा बेचे, यह सरकारी नियंत्रण से बाहर है. सब्जी वाला मंडी से सब्जियां लाने के बाद कितने मुनाफे के साथ किस दाम पर उन्हें बेचे, यह न तो प्रधानमंत्री तय करते हैं और न ही राज्यों के मुख्यमंत्री. मोदी सरकार […]

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राजीव रंजन झा
संपादक, शेयर मंथन
एक खुदरा दुकानदार कितने मार्जिन पर आपको गेहूं या आटा बेचे, यह सरकारी नियंत्रण से बाहर है. सब्जी वाला मंडी से सब्जियां लाने के बाद कितने मुनाफे के साथ किस दाम पर उन्हें बेचे, यह न तो प्रधानमंत्री तय करते हैं और न ही राज्यों के मुख्यमंत्री.
मोदी सरकार बनने के साल भर बाद लोग पूछते नजर आये कि कहां हैं वे अच्छे दिन, जिनका वादा नरेंद्र मोदी ने 2014 में अपनी हर चुनावी सभा में किया था. लोगों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि कई जरूरी चीजों की महंगाई से उन्हें निजात नहीं मिल रही है. वहीं अर्थशास्त्रियों, उद्योगपतियों और बाजार विश्लेषकों की चिंता यह है कि विकास दर में अब भी अपेक्षित गति नहीं आ पायी है.
लेकिन, क्या सब कुछ वाकई इतना निराशाजनक है? महंगाई की ही बात कर लेते हैं. मई 2015 के महीने में थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआइ) पर आधारित महंगाई दर शून्य से 2.36 प्रतिशत नीचे रही है. अप्रैल, 2015 में थोक महंगाई में 2.65 प्रतिशत गिरावट आयी थी. मई 2015, दरअसल नवंबर 2014 से ही लगातार सातवां ऐसा महीना था, जब थोक महंगाई दर ऋणात्मक रही है. ऐसा नहीं है कि महंगाई बढ़ने की दर घटी है, बल्कि चीजों के दाम कम हुए हैं. लेकिन यह कमी थोक बाजार के भावों के हिसाब से है.
खुदरा बाजार में दाम अब भी बढ़ रहे हैं. बेशक खुदरा महंगाई बढ़ने की रफ्तार पहले से काफी घटी है और कई महीनों से यह करीब 5 प्रतिशत के स्तर पर है. खुदरा महंगाई को मापनेवाले उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ) में वृद्धि की दर अप्रैल महीने में 4.87 प्रतिशत थी, जो मई 2015 में थोड़ा बढ़ कर 5.01 प्रतिशत हो गयी है. लेकिन एक आम उपभोक्ता के लिए यह समझना मुश्किल है कि जब थोक में भाव घटे हैं, तो खुदरा भाव घट क्यों नहीं रहे? खुदरा महंगाई दर भी पहले से हल्की हो जाने के आंकड़ों के बीच जब वह बाजार जाता है, तो उसे हकीकत कुछ और ही दिखती है. तो क्या कहीं आंकड़ों और हकीकत में एक विलगाव है?
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डीके जोशी से मैंने समझना चाहा कि थोक महंगाई, खुदरा महंगाई और बाजार के असली भावों की चाल अलग-अलग क्यों नजर आती है. उन्होंने समझाया कि, एक तो ये तीनों चीजें अलग-अलग हैं भी, और दूसरी बात है लोगों की नजर की. हर व्यक्ति हकीकत को अपनी अलग नजर से देखता है, जबकि थोक मूल्य सूचकांक और खुदरा मूल्य सूचकांक तो शुद्ध रूप से आंकड़ों के आधार पर ऊपर-नीचे जाते हैं. ये आंकड़े तो बाजार में चल रहे भावों को ही दर्शायेंगे.
तो फिर लोगों में यह भावना क्यों फैली है कि महंगाई से कोई राहत नहीं मिली है? जोशी कहते हैं कि ऐसी भावना लोगों में हमेशा ही रहती है. किस व्यक्ति को महंगाई कितनी लग रही है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस तबके से है.
जो गरीब व्यक्ति है, उसे खाद्य चीजों की महंगाई ज्यादा असर करती है. ऊपरी तबकों के लोगों के खर्च में खाद्य चीजों की उतनी प्रतिशत हिस्सेदारी नहीं होती. हाल में दाल, सब्जियों वगैरह की कीमतें जरूर बढ़ी हैं. यह बात तो महंगाई के आंकड़ों में भी नजर आती है और बाजार की हकीकत में भी. लेकिन दूसरी ओर कई चीजें सस्ती हुई हैं. कुल मिला कर औसत महंगाई नीचे आयी है.
इसके बावजूद यह सवाल तो बाकी रह जाता है कि थोक महंगाई और खुदरा महंगाई के बीच की दूरी इतनी क्यों बढ़ गयी है कि दोनों अलग दिशाओं में जाती नजर आ रही हैं? थोक महंगाई मई 2014 के 6.18 प्रतिशत से घट कर मई 2015 में -2.36 प्रतिशत हो गयी है, यानी इसमें 8.54 प्रतिशत अंक की गिरावट आ चुकी है. दूसरी ओर खुदरा महंगाई मई 2015 में 5.01 प्रतिशत रही, जो मई 2014 में 8.33 प्रतिशत थी, यानी इसमें केवल 3.32 प्रतिशत अंक की कमी आयी है.
इन आंकड़ों में उलझने के बदले अगर इनका सीधा मतलब समझना चाहते हैं, तो वह यही है कि थोक दाम घट रहे हैं, लेकिन खुदरा दाम थोड़ी धीमी रफ्तार से ही सही, लेकिन अब भी बढ़ रहे हैं. आखिर क्यों थोक भावों में कमी का फायदा एक आम ग्राहक तक नहीं पहुंच पा रहा है? क्या यह थोक से खुदरा बाजार के बीच की कड़ियों में बैठे लोगों की मुनाफाखोरी नहीं है? इस मुनाफाखोरी पर लगाम कौन कसेगा?
समस्या यह है कि थोक और खुदरा बाजार के बीच की कड़ियों का क्षेत्र अमूमन राज्यों के अधिकार में है, या फिर नियंत्रणविहीन है. एक खुदरा दुकानदार कितने मार्जिन पर आपको गेहूं या आटा बेचे, यह सरकारी नियंत्रण से बाहर है. सब्जी वाला मंडी से सब्जियां लाने के बाद कितने मुनाफे के साथ किस दाम पर उन्हें बेचे, यह न तो प्रधानमंत्री तय करते हैं और न ही राज्यों के मुख्यमंत्री.
इस बीच मॉनसून कमजोर रहने की चिंताओं को लेकर खाद्य कीमतों में वृद्धि का एक रुझान बनने लगा है. हालांकि, जून के पहले पखवाड़े में वास्तव में हुई बारिश इस अवधि की सामान्य सीमा से ज्यादा ही रही है.
लेकिन इस बारे में सरकार को पहले से सतर्क रहने की जरूरत है. कहा जा रहा है कि सरकारी भंडारों में पर्याप्त अनाज है, इसलिए चिंता नहीं है. उल्टे हालत तो यह है कि भारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) के पास क्षमता से अधिक भंडारण के कारण इसके गोदामों में बरबाद होनेवाले अनाज की मात्र पिछले पांच वर्षो में तिगुनी हो गयी है. पिछले दो साल के अंदर एफसीआइ के गोदामों में 40,000 टन अनाज खराब हो गया.
लेकिन फिर सवाल है कि केंद्र सरकार इस अतिरिक्त भंडार का उपयोग महंगाई पर नियंत्रण में प्रभावी ढंग से क्यों नहीं कर पा रही है? अपने चुनावी भाषणों में नरेंद्र मोदी ने यूपीए सरकार के इस दोहरे रवैये की खिल्ली उड़ायी थी कि एक तरफ सरकारी गोदामों में अनाज सड़ जाता है, दूसरी तरफ सरकार अदालत में कहती है कि अनाज गरीबों को बांटा नहीं जा सकता. अब मोदी सरकार ने इस विंडबना को दूर करने की दिशा में कोई सार्थक पहल कर दी हो, ऐसा तो नजर नहीं आता.
विकास के नजरिये से विडंबना यह है कि विकास दर या औद्योगिक उत्पादन के आंकड़ों में तो सुधार दिखने लगा है, लेकिन वह बात कंपनियों की आय और मुनाफे के रूप में नहीं दिख पा रही है. अर्थशास्त्री समझाते हैं कि भले ही औद्योगिक उत्पादन और जीडीपी में वृद्धि हुई हो, मगर थोक मूल्यों में गिरावट के कारण कंपनियों की आमदनी तो कम होगी ही.
आखिर कंपनियों की आमदनी और लाभ तो थोक मूल्यों पर ही निर्भर है. थोक मूल्यों में गिरावट बताती है कि मूल्य-निर्धारण में कंपनियों का पाला अभी कमजोर है. कंपनियां उत्पादन तो कर रही हैं, पर डब्ल्यूपीआइ बता रहा है कि वे अपने सामान सस्ते में बेच रही हैं. यह विडंबनाओं का अर्थशास्त्र है, जिसमें आम आदमी अकसर ठगा जाता है. चाहें तो कह लें कि वह ऐसी धारणा में जीता रहता है.
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