आस्था पर फरेब का हथौड़ा

जिनको कुछ अलग करने की चाहत होती है, वैसे लोग हमेशा ही चर्चे में बने रहते हैं. भला हो हमारे इस महान देश का जहां लोगों को इतनी फुरसत रहती है कि किसी भी प्रवचन मंडप में लाखों की उपस्थिति दर्ज हो ही जाती है. यह वही आस्था और विश्वास है जो इस जन्म के […]
जिनको कुछ अलग करने की चाहत होती है, वैसे लोग हमेशा ही चर्चे में बने रहते हैं. भला हो हमारे इस महान देश का जहां लोगों को इतनी फुरसत रहती है कि किसी भी प्रवचन मंडप में लाखों की उपस्थिति दर्ज हो ही जाती है. यह वही आस्था और विश्वास है जो इस जन्म के साथ-साथ अगले जन्म तक को भी सुरक्षित कर लेने की गारंटी देता है.
क्या करें इस विश्वास का जो सच को नंगा देखना ही नहीं चाहता. कई जमानों से ऋषि-मुनि, साधु-संत, संन्यासी जैसे शब्द सुनने को मिलते रहे हैं. इन सबके बीच कुछ दबी जुबान की कहानियां भी सुनने को मिलती हैं, मगर विश्वास ऐसा कि ‘वाटर’ और ‘फायर’ जैसी फिल्में भी बरदाश्त नहीं होती.
आस्था और विश्वास की आड़ में अब तो सियासत भी मैदान में कूद पड़ी है. नाम तो नाम है असल में यह विश्वास का एक प्रतीक है. नाम के साथ बाबा, बापू, महाराज कुछ भी कह लें, लोगों का विश्वास साथ है तो कुछ भी गलत नहीं हो सकता है. मगर हम कब यह बात समङोंगे कि आग और पानी का एक साथ होना कभी सही नहीं हो सकता. रूप अलग-अलग मगर प्रवृत्ति एक सी. आदम-हौवा और मनु-सतरूपा की कहानियां तो हम में से अधिकांश लोग जानते ही होंगे.
बहरहाल, जहां आस्था होगी, आश्रम होगा और आसाराम होंगे तो कुछ अच्छी बातों की उम्मीद होती है और होनी भी चाहिए. प्रवचन में तो ऐसे ही सद्गुणों की बरसात होती है. फिर ये कुछ लोग आखिर कहां से निकल आते हैं, जो गाहे-बगाहे हमारी आस्था और विश्वास पर हथौड़ा मार जाते हैं. माना कि जिंदगी की सच्चाई में शर्म की कोई जगह नहीं, लेकिन शर्म को कभी-कभी ही सही, पर आना तो चाहिए ही न!
एमके मिश्र, रांची
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