न मोदी, न ही राहुल फैक्टर

Published at :22 Sep 2013 2:42 AM (IST)
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न मोदी, न ही राहुल फैक्टर

-सामयिकी-।।रामबहादुर राय।। जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं, उनमें खास कर चार बड़े राज्यों- मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली की स्थितियां अलग-अलग हैं. मुद्दे अलग हैं, लेकिन एक साझी बात यह है कि इन राज्यों में मुकाबला दो प्रमुख दलों के बीच है. इन चुनावों में न तो मोदी फैक्टर काम करता हुआ […]

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-सामयिकी-
।।रामबहादुर राय।।

जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं, उनमें खास कर चार बड़े राज्यों- मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली की स्थितियां अलग-अलग हैं. मुद्दे अलग हैं, लेकिन एक साझी बात यह है कि इन राज्यों में मुकाबला दो प्रमुख दलों के बीच है. इन चुनावों में न तो मोदी फैक्टर काम करता हुआ दिखेगा और न ही राहुल फैक्टर. मोदी की सभाएं जरूर बड़ी होंगी, भीड़ भी जुटेगी, लेकिन इससे विधानसभा चुनावों में भाजपा को कितनी ताकत मिलेगी, यह संशय का विषय है.

भारत में चुनावों की प्रकृति बदल रही है. विधानसभा के चुनाव भी राष्ट्रपति प्रणाली की तरह अपना मुख्यमंत्री चुनने के लिए हो रहे हैं. राज्यों के चुनाव अब मुख्यमंत्री पद के दावेदारों के चेहरों के इर्द-गिर्द लड़े जा रहे हैं. वर्ष 2012 में हुआ गुजरात और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव तो इसका हाल का उदाहरण है. और भी कई ऐसे उदाहरण हैं, जिनके आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है.

थोड़ा पीछे पलट कर देखें, तो 1971 से एक दो अपवादों (आंध्र प्रदेश) को छोड़ कर अब तक धीरे-धीरे एक पैटर्न-सा बन गया है. 1971 में पहली बार इंदिरा गांधी ने सिर्फ लोकसभा का चुनाव अलग से कराया. 1967 तक सभी राज्यों की विधानसभाओं और आम चुनाव साथ-साथ होते रहे थे. 1972 के बाद से लोकसभा चुनाव और राज्यों के विधानसभा चुनाव साथ-साथ नहीं होते.

अब चुनाव के तौर-तरीके बदल गये हैं. दृष्टि बदली है, राजनीति बदली है. इस बदली हुई राजनीति का विश्लेषण करें, तो कह सकते हैं कि विधानसभा का चुनाव अलग धरातल पर, अलग नेतृत्व में आयोजित किया जाता रहा है. देश की प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियां, इन चुनावों में कई बार शोभा की वस्तु मात्र नजर आती हैं. विधानसभा चुनाव दो स्तरों पर लड़े जाते हैं. यह राज्य आधारित विशेष मुद्दों पर और स्थानीय माहौल पर आधारित होता है. राज्य स्तर पर मतदाताओं की निगाहें मुख्यमंत्री और इस पद के दावेदारों पर होती है. विधानसभा क्षेत्र के स्तर पर वह प्रत्याशी विशेष को प्राथमिकता देता है. मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवारों को देखते हुए मतदाता अपने प्रतिनिधियों को चुनता है. जिन पांच राज्यों में चुनाव होनेवाले हैं, उनमें खास कर चार बड़े राज्यों- मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली की स्थितियां अलग-अलग हैं. मुद्दे अलग हैं, लेकिन एक साझी बात यह है कि इन राज्यों में मुकाबला दो प्रमुख दलों के बीच है.

अगर मध्यप्रदेश को देखें, तो वर्ष 2003 से पहले कांग्रेस की लगातार 10 वर्षो तक सरकार थी. 1993 में बाबरी मसजिद गिराये जाने के बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश की सरकार बर्खास्त कर दी गयी. 1993 के नवंबर में मध्य प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में दिग्विजय सिंह जीते और उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया. 1993-98 तक चली सरकार में कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का दखल रहा. प्रत्याशियों के चयन में उसका हस्तक्षेप रहा. लेकिन, 1998 के चुनाव में दिग्विजय सिंह दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पास लिस्ट लेकर आये और उनसे यह कहते हुए इस सूची पर सहमति ली कि आप इजाजत दें, हम जीत हासिल करेंगे और सरकार बनायेंगे. अर्थात, उन्होंने चुनाव जीतने का आश्वासन देकर प्रत्याशियों की अपनी सूची पर सोनिया की रजामंदी ले ली. इस तरह प्रत्याशियों का चयन आलाकमान ने नहीं, मुख्यमंत्री ने किया. आज ज्यादातर राज्यों में यही हो रहा है. पिछले वर्ष गुजरात में चुनाव हुआ. गुजरात के उदाहरण को लें, तो वहां के मुख्यमंत्री सूची लेकर आये और संसदीय बोर्ड ने इस पर अंतिम मुहर लगा दी. इस लिहाज से यह भारतीय राजनीति का एक नया पैटर्न है.

लेकिन पांच राज्यों के आगामी चुनाव में कांग्रेस ने एक नया प्रयोग किया है. यह संभवत: राहुल गांधी की राय पर या उनके दिशा-निर्देश में किया गया हो सकता है. मध्य प्रदेश में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में दिल्ली से सुरेश पचौरी को मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में भेजा गया. इस बार राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश कांग्रेस की मांग पर ज्योतिरादित्य सिंधिया को वहां का चुनाव प्रभारी बना कर भेजा है. भाजपा ने वर्ष 2003 में उमा भारती को मध्य प्रदेश चुनाव का प्रभारी बना कर भेजा था. वही रास्ता इस बार कांग्रेस ने अपनाया है. कांग्रेस को ज्योतिरादित्य में सबको एकजुट करने का माद्दा दिखता है.

वर्तमान मध्य प्रदेश तीन हिस्सों में बंटा हुआ है. ग्वालियर जबलपुर, और सागर. सांस्कृतिक और भौगोलिक रूप से प्रमुख इन तीन क्षेत्रों की राजनीति अलग-अलग है. ग्वालियर राजघराने से जुड़े होने के कारण ग्वालियर क्षेत्र में सिंधिया का प्रभाव पहले से है. वे भाजपा को जबरदस्त टक्कर देंगे. भाजपा के मुकाबले कांग्रेस जो कल तक बिखरी हुई नजर आ रही थी, उसे नया चेहरा मिला है. दिग्विजय हाशिये पर डाल दिये गये हैं. ऐसी खबरें आ रही हैं कि सिंधिया की प्रेसवार्ता में दिग्विजय को प्रवेश नहीं करने दिया गया. उनके मंच पर दिग्विजय को आने की इजाजत नहीं है. इससे उनके समर्थकों में निश्चित रूप से निराशा होगी, लेकिन इस निराशा का फायदा भाजपा को कितना मिल पाता है, यह बाद में ही पता चलेगा.

मध्य प्रदेश के संदर्भ में उल्लेखनीय बात यह है कि यह पहला राज्य है जहां शुरू से ही गांव-गांव में जनसंघ और कांग्रेस दोनों का ही प्रभाव रहा है. शुरू के दिनों से ही मध्य प्रदेश में दोनों दलों के बीच कमोबेश बराबर की लड़ाई रहती है. उम्मीदवारों का चयन, सरकार का प्रदर्शन, मुख्यमंत्री का प्रत्याशी मायने रखता है. शिवराज सिंह चौहान अब तक अपने स्वभाव, व्यवहार और नीतियों से लोकप्रिय नेता प्रतीत होते हैं. आंकड़ों में राज्य सरकार का प्रदर्शन भी बेहतर दिखता है. लेकिन, जिस तरह से 2003 में दिग्विजय के खिलाफ बिजली, सड़क, पानी का मुद्दा उभरा और भाजपा जीत गयी, उसी तरह अगर इस बार कोई नया मुद्दा आता है, तो हिसाब-किताब बिगड़ भी सकता है. मध्य प्रदेश को खेती के क्षेत्र में देश में शीर्ष स्थान प्राप्त है. कृषि में 14 फीसदी की वृद्धि उसकी बड़ी उपलब्धि रही है. यह वोट में कन्वर्ट होता है या नहीं, यह देखने वाली बात होगी.

अगर राजस्थान की स्थिति देखें, तो कई लोगों का मानना है कि यहां वसुंधरा राजे का पलड़ा भारी है. लेकिन, अशोक गहलोत के कामकाज को कमोबेश संतोषजनक माना जाता रहा है. हालांकि, हाल के दिनों में कांग्रेस के मंत्रियों पर जिस तरह से गंभीर आरोप लगे हैं और उन्हें जेल जाना पड़ा है, उससे जनता में सरकार की छवि खराब हुई है.

वसुंधरा राजे ने 2003 में जब अशोक गहलोत को पराजित किया था, उस समय उनकी सरकार काफी अलोकप्रिय थी. प्रदेश सरकार ने किसानों, आदिवासियों पर गोलियां चलवायी थीं. जाट व गुज्जर समुदाय के लोग गहलोत के खिलाफ खड़े हो गये थे. उस वक्त की तुलना में 2013 में होनेवाले विधानसभा चुनाव के बारे में यह तो कहा ही जा सकता है लोगों में इस वक्त उतना गुस्सा नहीं दिखता. सरकार का कामकाज भी ठीक ही रहा है. लेकिन, आम धारणा है कि वसुंधरा के नेतृत्व में भाजपा प्रदेश में बेहतर करेगी.

अगर छत्तीसगढ़ की बात करें, तो यहां कांग्रेस पूरी तरह से नेतृत्वविहीन है. अजीत जोगी प्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेता हैं, लेकिन कांग्रेस में ही जोगी की स्वीकार्यता को लेकर समस्या है. कांग्रेस नेतृत्व इस समस्या का समाधान नहीं कर पा रहा है. इसका प्रभाव आनेवाले विधानसभा चुनाव में दिख सकता है. वहीं छत्तीसगढ़ में भाजपा के मुख्यमंत्री रमन सिंह अपने कामकाज से लोकप्रिय हैं. केंद्र सरकार जो खाद्य सुरक्षा कानून लेकर आयी है, उसे रमन सिंह छत्तीसगढ़ में पहले से ही सफलतापूर्वक चला रहे हैं. वहां जनता को ज्यादा मात्र में व सस्ता अनाज मुहैया कराया जा रहा है. खाद्य सुरक्षा कानून को अब राष्ट्रीय स्तर पर पास किया गया है, लेकिन इससे कांग्रेस का जनाधार कितना बढ़ेगा, कांग्रेस के पक्ष में कितनी हवा बनेगी, इसका अंदाजा लगाना

कठिन है.

जहां तक दिल्ली का सवाल है, तो यहां भाजपा शीला दीक्षित के मुकाबले में काफी कमजोर दिख रही है. राजनाथ सिंह जब दोबारा भाजपा अध्यक्ष बने थे, उसी दिन लोगों ने अंदाजा लगा लिया था कि प्रदेश में भाजपा अध्यक्ष किसे बनाया जायेगा. विजय गोयल अध्यक्ष बनाये गये. उनका राजनीतिक कौशल बड़ा है. वे मुद्दे खड़े कर सकते हैं, अभियान छेड़ सकते हैं. वे विभिन्न तरह के मुद्दों को उठा भी रहे हैं. लेकिन, गोयल शीला के मुकाबले अपनी पार्टी में कमजोर हैं. उनकी छवि विवादास्पद है और वे दिल्ली भाजपा के सर्वमान्य नेता नहीं हैं. डॉ हर्षवर्धन की छवि सर्वमान्य नेता की है. जनता उन्हें शीला दीक्षित के मुकाबले देखना भी चाहेगी, लेकिन भाजपा नेतृत्व हर्षवर्धन के मामले में साहस नहीं दिखा पा रहा है. हालांकि, भाजपा ने नितिन गडकरी को दिल्ली का प्रभारी बनाया है. दो सह-प्रभारी भी नियुक्त किये गये हैं. उनके प्रभारी बनने से कार्यकर्ताओं में काफी उम्मीद जगी थी. इसके बावजूद विजय गोयल हटाये नहीं गये. न हर्षवर्धन प्रभारी बनाये गये. हर्षवर्धन को चुनाव अभियान का प्रभारी बनाया जाता, तो भाजपा के संभलने की उम्मीद की जा सकती थी. इस कमजोरी के बीच भाजपा महंगाई को लेकर जनता की नाराजगी का कितना फायदा कितना उठा पायेगी, कहना मुश्किल है.

दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) के कार्यकर्ता काफी सक्रिय हैं. वे जनता से जुड़े मुद्दे, उनको प्रभावित करनेवाले बुनियादी सवालों को उठा कर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. कहा जा रहा है कि ‘आप’ इस चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करेगी. लेकिन, ‘आप’ कांग्रेस का खेल बिगाड़ती है या भाजपा का, देखना दिलचस्प होगा.

इन चुनावों के मद्देनजर कराये गये सर्वेक्षणों और उनके नतीजों की विश्वसनीयता को लेकर सवाल खड़े किये जा रहे हैं. सर्वेक्षणों की साख कम हुई है. सवाल वैज्ञानिकता और वस्तुनिष्ठता का है. एक अंगरेजी अखबार द्वारा कराये गये सर्वे को लेकर दावा किया गया है कि यह जाति के आधार पर कराया गया है. उक्त अखबार को खुद भी अपने सर्वे पर भरोसा नहीं है. उसमें जिस दल की बढ़त दिखायी गयी है, उस दल के नेता भी दबे स्वर में सर्वे के निष्कर्षो पर शंका जता रहे हैं. दरअसल, हमारे देश में सर्वे के लिए अभी बहुत लोक-प्रशिक्षण नहीं हो पाया है. मतदाता इस लिहाज से उतने जागरूक नहीं हैं. वैसे भी हमारे देश में गुप्त मतदान की व्यवस्था है और इसके तहत सर्वे की थीसिस को ही खारिज किया जाता रहा है. खिचड़ी तो पक नहीं रही है कि एक चावल को देख कर पूरी हांडी का पता चल जाये. अगर सर्वे के जरिये यह पता लगाने की कोशिश होती कि मतदाताओं के समक्ष इस चुनाव में कौन से प्रमुख मुद्दे हैं, वे इस चुनाव में किस मुद्दे को प्राथमिकता देंगे, तो सही सूचना निकल कर आती. आमतौर पर ऐसा नहीं किया जाता है.

जहां तक राष्ट्रीय नेतृत्व के प्रभाव का सवाल है, विधानसभा चुनावों पर इसके असर को बहुत ज्यादा करके नहीं आंका जा सकता. राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव से मनमोहन सिंह के नेतृत्व में चल रही यूपीए सरकार के कामकाज का मूल्यांकन नहीं होगा. हालांकि, मंहगाई केंद्र सरकार की नीतियों की देन है, इसलिए यह संभव है कि यह चुनाव में प्रमुख मुद्दा बने. इसका प्रभाव अगली सरकार पर पड़ सकता है. इस चुनाव में न तो मोदी फैक्टर काम करता हुआ दिखेगा और न ही राहुल फैक्टर. मोदी की सभाएं जरूर बड़ी होंगी, भीड़ भी जुटेगी, लेकिन इससे विधानसभा चुनाव में भाजपा को कितनी ताकत मिलेगी, यह संशय का विषय है. राज्यों के विधानसभा चुनाव मुख्य तौर पर स्थानीय मुद्दों और नेतृत्व से ही प्रभावित होते रहे हैं, और इस बार इससे अलग कुछ होगा, मुङो ऐसा नहीं लगता.

(संतोष कुमार सिंह से बातचीत पर आधारित)

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