वो अपाहिज व्यक्ति और भारतीय रेलवे

Published at :21 Sep 2013 1:54 AM (IST)
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वो अपाहिज व्यक्ति और भारतीय रेलवे

।।प्रदीप चंद्र केशव।।(प्रभात खबर, जमशेदपुर)दानापुर से चल कर टाटानगर जानेवाली ट्रेन अपने निर्धारत समय पर स्टेशन पहुंचने वाली थी. एक मिनट का भी विलंब नहीं. खुशी मिली, लगा कि चलो बिहार, पश्चिम बंगाल व झारखंड से गुजरनेवाली कोई तो ट्रेन है, जो समय पर चल कर अपने गंतव्य को जाती है. बिहार के गिद्धौर रेलवे […]

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।।प्रदीप चंद्र केशव।।
(प्रभात खबर, जमशेदपुर)
दानापुर से चल कर टाटानगर जानेवाली ट्रेन अपने निर्धारत समय पर स्टेशन पहुंचने वाली थी. एक मिनट का भी विलंब नहीं. खुशी मिली, लगा कि चलो बिहार, पश्चिम बंगाल व झारखंड से गुजरनेवाली कोई तो ट्रेन है, जो समय पर चल कर अपने गंतव्य को जाती है. बिहार के गिद्धौर रेलवे स्टेशन पर ट्रेन लगी और मैं उस पर सवार हुआ. ट्रेन में भीड़ थी. कठिनाई हुई, पर ट्रेन में एक ओर खड़े होने की जगह मिल गयी.

ट्रेन झाझा, सिमुलतल्ला एवं जसीडीह रेलवे स्टेशनों से गुजर चुकी थी, तब तक मुङो बैठने की जगह नहीं मिली, पर ट्रेन अब भी नियत समय के मुताबिक चल रही थी. ट्रेनों के देरी से संचालन के लिए बदनाम भारतीय रेलवे की थोड़ी सराहना करने का मेरा दिल हुआ. लेकिन तभी कुछ ऐसा हुआ, जो भारतीय रेलवे को कठघरे में खड़ा करने के लिए काफी है. मधुपुर रेलवे स्टेशन पर जैसे ही यह ट्रेन रुकी, एक महिला अपने अपाहिज पति के साथ ट्रेन पर सवार हुई. ट्रेन पर सवार होते ही, वह अपनी सीट खोजने लगी. दरअसल, जिस बोगी में मैं था, वह सिटिंग रिजर्वेशन की बोगी थी.

उक्त महिला और उसके पति के नाम पर जिन नंबरों की सीटें आरक्षित थीं, उन पर दो युवक पहले से बैठे हुए थ़े भीड़ को चीरती हुई महिला अपनी आरक्षित सीट की ओर बढ़ी और टिकट दिखाते हुए दोनों युवकों से उठने के लिए बोली. युवकों ने महिला से कहा कि वे जिस सीट पर बैठे हैं, वह सीट आरक्षित नहीं है और न ही यह आरक्षित बोगी है. मैं अक्सर इसी ट्रेन से आना-जाना करता था. मुझे पता था कि यह आरक्षित बोगी ही है, पर ट्रेन जैसे ही अपने पहले स्टेशन से खुलती है, उसके बाद आरक्षण को पूछनेवाला कोई नहीं होता. इस बोगी में टीटीइ के भी दर्शन जल्दी नहीं होते. सीटों पर आराम से बैठे यात्रियों ने महिला को यह कहते हुए चलता कर दिया कि यह बोगी आरक्षित बोगी नहीं है. किसी को महिला और उसके अपाहिज पति पर तरस तक नहीं आया.

महिला हार कर शौचालय के पास खड़े अपने पति को सहारा देकर वहीं नीचे बैठ गयी. मुझसे रहा नहीं गया, महिला के पास जा कर कुछ सलाह देने लगा. कहा कि आप जानती हैं कि इस ट्रेन में वातानुकूलित (एसी) बोगी के अलावा किसी बोगी में आरक्षण का कोई महत्व नहीं रहता, फिर आपने क्यों सिटिंग रिजव्रेशन ले लिया. महिला कहने लगी कि जब सिटिंग रिजव्रेशन के कोई मायने नहीं है, तो क्यों रेलवे लोगों को बेवकूफ बना रहा है? क्यों टिकटें दे रहा है? अगर टिकटें दे रहे हैं, तो बोगी में क्यों नहीं टीटीइ है? कई सवाल उसने खड़े किये, जिनका जवाब शायद रेलवे ही दे सकता था. ट्रेन आसनसोल पहुंच चुकी थी और मेरे साथ-साथ उक्त महिला व उसके पति को भी सीट मिल चुकी थी. ट्रेन अब भी राइट टाइम थी, पर इस वाकये के बाद हमें लगा, ट्रेन राइट टाइम नहीं, सालों लेट है और जिम्मेवार है भारतीय रेलवे.

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