फासला वाराणसी और क्योटो का

Published at :03 Jun 2015 5:11 AM (IST)
विज्ञापन
फासला वाराणसी और क्योटो का

आशीष मिश्र पत्रकार, इंडिया टुडे वाराणसी के नये अस्सी घाट पर एक बड़े से पोस्टर पर तुलसीदास की यह चौपाई लिखी है- ‘गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला॥’ यानी गंगा समस्त आनंद-मंगलों की मूल है. वह सब सुख देने और दुख हरनेवाली है. अब जरा अनियोजित विकास का दुख देखिए. […]

विज्ञापन
आशीष मिश्र
पत्रकार, इंडिया टुडे
वाराणसी के नये अस्सी घाट पर एक बड़े से पोस्टर पर तुलसीदास की यह चौपाई लिखी है- ‘गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला॥’ यानी गंगा समस्त आनंद-मंगलों की मूल है. वह सब सुख देने और दुख हरनेवाली है. अब जरा अनियोजित विकास का दुख देखिए.
गंगा किनारे संवर चुके अस्सी घाट पर हनुमान मंदिर के पीछे एक छोटी कुटिया में विराजमान बाबा राधेश्याम बीते 20 साल से यहां आनेवाले भक्तों को मुफ्त ठंडा पानी पिलाते रहे हैं, पर कुछ दिनों से इनके घड़े सूखे पड़े हैं. घाट पर लगे आधा दर्जन नल साफ-सफाई और जीर्णोद्धार की भेंट चढ़ चुके हैं. भरपाई के लिए एक निजी कंपनी ने वाटर कूलर लगा दिया है, जिसमें पानी आना बाकी है. धार्मिक ग्रंथों में जिस गंगा को सारे दुख हरनेवाली बताया गया है, उसी के तट पर पहुंचनेवाले श्रद्धालु भीषण गरमी में प्यास से बेहाल हैं.
प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी पहुंचे नरेंद्र मोदी ने पिछले साल 8 नवंबर को यहां के पुराने अस्सी घाट पर फावड़ा चला कर जिस सफाई अभियान का आगाज किया था, छह माह बीतने पर भी उसकी धमक दूसरे घाटों तक नहीं पहुंची है.
नये अस्सी घाट पर जिला प्रशासन ने सुबह-ए-बनारस कार्यक्रम शुरू किया है, पर बगल के कई घाट अपनी बदहाली से जूझते दिख रहे हैं. धोबी घाट में तब्दील हो चुके लाली घाट, राजा घाट, पांडेय घाट समेत एक दर्जन से अधिक घाटों के सौंदर्यीकरण की कोई समग्र योजना नहीं बनी है.
दशाश्वमेध और शीतला घाट में मुफ्त वाइ-फाइ व्यवस्था है, लेकिन कूड़े-कचरे के ढेर से कराह रहे सुक्का घाट, तेलियानारे और प्रह्लाद जैसे घाट अपनी तकदीर बदलने के लिए अभी इंतजार ही कर रहे हैं.
गंगा सफाई के लिए प्रधानमंत्री के नामित किये गये ज्यादातर नवरत्न उदासीन हैं. छह महीने पहले गंगा और उसकी सहायक नदियों पर शोध के लिए काशी में गंगा विश्वविद्यालय खोलने की घोषणा भी अब तक नयी दिल्ली के गलियारों से बाहर नहीं निकल पायी है.
प्रधानमंत्री ने सत्ता संभालते ही वाराणसी को जापान के सांस्कृतिक और हेरिटेज शहर क्योटो की तर्ज पर संवारने का तानाबाना बुना था. बीते एक साल में विशेषज्ञों का काशी-क्योटो के बीच आना-जाना लगा रहा.
हालांकि वाराणसी को क्योटो की तर्ज पर संवारने में बड़ी अड़चन दोनों शहरों का आकार व आबादी थी. वाराणसी 82 वर्ग किमी क्षेत्र में बसी है, जबकि क्योटो 821 वर्ग किमी में. क्योटो की आबादी 12 लाख है, जबकि वाराणसी की शहरी आबादी 20 लाख से अधिक. पिछले महीने क्योटो गयी चार सदस्यीय सरकारी समिति के एक सदस्य कहते हैं, ‘क्योटो वाराणसी से क्षेत्रफल में दस गुना है, लेकिन उसकी आबादी आधी है.
यही घोर असमानता वाराणसी को क्योटो जैसा बनाने में आड़े आयेगी.’ उधर, बीएचयू में भूगोल विभाग के प्रमुख प्रो राना पीबी सिंह करीब तीस साल से वाराणसी और क्योटो की संस्कृति और धरोहरों का अध्ययन कर रहे हैं. वे कहते हैं, ‘क्योटो की नकल करने से अच्छा है कि प्रधानमंत्री वाराणसी को पहले वाराणसी ही बना दें. काशी की जनता को जागरूक किये बिना मोदी कोई परिवर्तन नहीं कर पाएंगे.’
विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola