वे नहीं जानते वफा क्या है

Published at :15 Sep 2013 2:49 AM (IST)
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वे नहीं जानते वफा क्या है

।। राजेंद्र तिवारी।।(कारपोरेट संपादक प्रभात खबर) दो दिन से हर कोई लालकृष्ण आडवाणी का राजनीतिक मर्सिया लिखने में लगा हुआ है और इनमें से अधिकतर मोदी के अभ्युदय में ही आडवाणी का पराभव देख रहे हैं. यहां पर मुझे वर्ष 2000 का वाकया याद आया, वह भी गुरु स्वामी की पोस्ट पढ़ कर. उस समय […]

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।। राजेंद्र तिवारी।।
(कारपोरेट संपादक प्रभात खबर)

दो दिन से हर कोई लालकृष्ण आडवाणी का राजनीतिक मर्सिया लिखने में लगा हुआ है और इनमें से अधिकतर मोदी के अभ्युदय में ही आडवाणी का पराभव देख रहे हैं. यहां पर मुझे वर्ष 2000 का वाकया याद आया, वह भी गुरु स्वामी की पोस्ट पढ़ कर. उस समय मैं दिल्ली में अमर उजाला का फीचर संपादक हुआ करता था. एक दिन मैं अपने एक पत्रकार मित्र के साथ भाजपा के एक बड़े नेता के यहां बैठा था. ये पत्रकार मित्र विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दिनों में मेरे जूनियर हुआ करते थे और इनकी सुधींद्र कुलकर्णी से नजदीकी थी. वहां चर्चा चली आडवाणी जी की, तो बातों ही बातों में पता चला कि आडवाणी जी को उस समय हुए परमाणु परीक्षण की तैयारी की पहले से कोई जानकारी नहीं थी, जबकि वह देश के गृह मंत्री थे. दूसरी तरफ विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री और यहां तक तक कि प्रमोद महाजन तक को इसकी जानकारी थी. उस समय इस चर्चा में मुङो कोई दम नजर नहीं आया था, लेकिन अब मोहन गुरुस्वामी को पोस्ट पढ़ कर लगा कि यह बात कोरी गप नहीं थी.

गुरुस्वामी ने लिखा है कि आडवाणी ने उसी समय अपने राजनीतिक पराभव की नींव खुद खोद दी थी, जब उन्होंने 1995 में वाजपेयी को भाजपा का ध्वजवाहक घोषित किया था. उस समय आडवाणी भाजपा के सबसे बड़े सितारे थे और पार्टी को मेनस्ट्रीम में लाने का पूरा श्रेय उन्हीं को जाता था. उस समय पार्टी वैसे ही उनके पीछे खड़ी थी जैसे आज मोदी के पीछे खड़ी दिखायी देती है. गुरुस्वामी लिखते हैं कि उस समय उनके करीबियों ने यह बात समझाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी कि यह मौका शीर्ष पद पर पहुंचने का मजबूत मौका है, बाद में न जाने राजनीति क्या करवट बदले. गुरुस्वामी लिखते हैं कि वाजपेयी की 13 दिन की सरकार के बाद मैंने उनसे कहा था कि इतिहास ने उनके लिए एक और खिड़की खोल दी है, लेकिन यह खिड़की बहुत तंग है क्योंकि वाजपेयी पूर्व प्रधानमंत्री के रूप में पार्टी में हैं. लेकिन आडवाणी ने कभी इस बात को गंभीरता से नहीं लिया. ऐसा नहीं था कि वे प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते थे, लेकिन आडवाणी ने अलिखित नैतिकता के तहत वरिष्ठता, मित्रता, ईमानदारी और सही रास्ते पर चलने का खेल खेला. मुङो लगता है कि शायद आडवाणी इसी की उम्मीद नरेंद्र मोदी से कर रहे होंगे. जब नरेंद्र मोदी ने उनको तवज्जो देने की जगह खुद को आगे करना शुरू किया तो वे बौखला गये. खैर, जो भी हुआ, मेरा तो मानना है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों के नेताओं के लिये देशहित से ऊपर निजी स्वार्थ हैं. अगर ऐसा न होता, तो दोनों ही पार्टियां अपने सबसे कद्दावर और राजनेता लायक गुण रखनेवाले नेताओं को शीर्ष पद की दावेदारी से बाहर न करतीं.

हिंदी दिवस पर

फेसबुक पर हिंदी दिवस पर कुछ पोस्ट बहुत मार्के की लगीं. इनमें से एक पोस्ट ‘चंचल बीएचयू’ की यहां दे रहा हूं-

काशी विश्वविद्यालय का वाकया है. इभा कार बहुत ही जहीन और मृदुभाषी महिला थीं, प्राध्यापिका थीं. एक महिला छात्रवास की वार्डेन थी. किसी काम से हमें उनसे मिलने उनके घर जाना पड़ा. हमें देख कर बहुत देर तक हंसती रहीं. हमने पूछा क्या हुआ? बोलीं, अरे बाबा तू उधर से ही फोन कर देता. हमने कहा कि फिर संदेस (प्रसिद्ध बांग्ला मिष्ठी जिसे तमीज से खाया जाय तो खानेवाला फंस जाये) कैसे मिलता. बहरहाल खाने-पीने के दौरान बात होती रही. हम हिंदी में बोल रहे थे, वो हिन्गाली में (हिन्गाली मजेदार भाषा है, हर बंगाली जब हिंदी बोलेगा वह हिन्गाली ही बोलेगा- जोल खाकर जोल्दी नई करना, बांग्ला में पीना नहीं बना है, आदि आदि) इस बीच उन्होंने अपने बच्चों से बांग्ला में बात की . नौकर से हिन्दी में. और कुत्ते से अंगरेजी में. टोमी प्लीज गो देयर.. बी सीटेड.. और वह समझता रहा. हमें हंसी आ गयी. उन्होंने पूछा क्या हुआ- हमने कहा आपके घर चलनेवाली भाषा का बयान सार्वजनिक कर दिया जाय तो मजेदार तथ्य सामने आता है.

घर में अपनी भाषा

नौकर से हिन्दी में

कुत्ते से अंगरेजी में

हम दोनों हंसते रहे. आज हिंदी दिवस पर इभा जी को प्रणाम .

उनको 45 हजार और हमें मात्र 2100!

पिछले हफ्ते के कॉलम पर मुझे एक पाठक ने लंबा एसएमएस भेजा. एसएमएस इस प्रकार है- आपके प्रसंग पर मैं कुछ बातें शेयर करना चाहता हूं. मैं जिस प्राइवेट स्कूल में टीचिंग करता हूं, वहां का डाइरेक्टर सरकारी टीचर है. उसका पेमेंट 45-50 हजार रु पये है, लेकिन मेरा मात्र 2100 रुपये है. डाइरेक्टर महोदय 3 से 4 घंटे का टाइम (अपनी सरकारी जॉब में) देते हैं और मैं सुबह साढ़े आठ बजे से अपराह्न् चार बजे तक. मैं आठ किमी साइकिल से आता-जाता हूं और ये बाइक से. अब दूसरी बात.. इस बार मैं राज्य पब्लिक सर्विस कमीशन का फार्म भरने के टाइम जाति प्रमाणपत्र के लिए गैर सरकारी प्रज्ञा केंद्र में गया. वहां प्रिंट निकालने का 160 रुपये और ब्लॉक में 30 रुपये. एफिडेविट का 100 रुपये. मिलेगा 15 दिन बाद. यदि आप और अधिक पैसा दे सकते हैं, तो तीन दिन में मिल जायेगा.. बीएड करना है तो एक लाख बीस हजार रुपये का डोनेशन प्लस 20,000 रु पये एडमिशन फीस. रसीद मिलेगी सिर्फ 32000 रु पये की. ये मेरे गांव, ब्लाक और जिले का मामला है, तो पूरे राज्य और देश में क्या हो रहा है, समझ सकते हैं.

और अंत में

हमारे मित्र अमिताभ ने अपनी फेसबुक वॉल पर कविता कोश के सौजन्य से चंद्रसेन विराट की एक ग़ज़ल पोस्ट की है. उन्होंने कोष्ठक में लिखा है, संदर्भ- मोदी का राजतिलक और आडवाणी का कोपभवन. आप भी आनंद लीजिए इस गजल का-

तुम कभी थे सूर्य लेकिन अब दीयों तक आ गये

थे कभी मुखपृष्ठ पर अब हाशियों तक आ गये.

यवनिका बदली कि सारा दृश्य बदला मंच का

थे कभी दूल्हा स्वयं बारातियों तक आ गये

वक्त का पहिया किसे कुचले कहां कब क्या पता

थे कभी रथवान अब बैसाखियों तक आ गये

देख ली सत्ता किसी वारांगना से कम नहीं

जो कि अध्यादेश थे खुद अर्जियों तक आ गये

देश के संदर्भ मे तुम बोल लेते खूब हो

बात ध्वज की थी चलायी कुर्सियों तक आ गये.

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