विश्वास को लहूलुहान होने से रोकें

Published at :12 Sep 2013 2:32 AM (IST)
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विश्वास को लहूलुहान होने से रोकें

‘किसी देश में विश्वासमत के लिए किसी प्रधानमंत्री को सांसदों को खरीदते सुना है?’- यह राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष के बयान का हिंदी रूपांतर है. मीडिया में चर्चे हुए. ऐसे आचरण और वाद-विवादों को संसद के अवमूल्यन का निम्नतम स्तर बताया गया. तो क्या हुआ? ऐसे वाक्बाणों से ही तो रुपये का अवमूल्यन रुकेगा, गरीबी […]

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‘किसी देश में विश्वासमत के लिए किसी प्रधानमंत्री को सांसदों को खरीदते सुना है?’- यह राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष के बयान का हिंदी रूपांतर है. मीडिया में चर्चे हुए. ऐसे आचरण और वाद-विवादों को संसद के अवमूल्यन का निम्नतम स्तर बताया गया.

तो क्या हुआ? ऐसे वाक्बाणों से ही तो रुपये का अवमूल्यन रुकेगा, गरीबी दूर होगी, जीडीपी बढ़ेगी और देश में खुशहाली आयेगी! लगभग 825 लोगों की संसद 125 करोड़ लोगों की प्रतिनिधि सभा है. यह आचरण विश्वव्यापी टीवी चैनलों पर दिखाया जाता है. सोचें! ऐसे बयानों पर दुनिया क्या प्रतिक्रिया करेगी! क्या प्रधानमंत्री को चोर कह देना संसद की गरिमा के अनुकूल है? हमारे नेताओं ने ऐसे बयान देकर उन सारे सांसदों पर कीचड़ उछाला है, जो सफेद लिबास में संसद में बिकने के लिए बैठे हैं, जिससे जनता का विश्वास लहूलुहान होता है.
एमके मिश्र, रांची

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