क्या सिर्फ कड़ा कानून काफी है?

हमारे देश में स्त्री-सम्मान के प्रति जो बेदारी (चेतना) आयी है, वह निश्चय ही सराहनीय है. लोग बदलाव चाहते हैं, उनके मन में गुस्सा है. माहौल में बदलाव के लिए छटपटाहट है. दिल्ली, मुंबई और झारखंड के लातेहार में सामूहिक बलात्कार की घटनाओं ने देश को पहली बार इस कदर झकझोर दिया है कि बदलाव […]
हमारे देश में स्त्री-सम्मान के प्रति जो बेदारी (चेतना) आयी है, वह निश्चय ही सराहनीय है. लोग बदलाव चाहते हैं, उनके मन में गुस्सा है. माहौल में बदलाव के लिए छटपटाहट है. दिल्ली, मुंबई और झारखंड के लातेहार में सामूहिक बलात्कार की घटनाओं ने देश को पहली बार इस कदर झकझोर दिया है कि बदलाव की आवाज एक ऐतिहासिक मुहिम में तब्दील हो चुकी है. महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान की मांग की गूंज हर ओर सुनायी पड़ रही है.
अपराध और दुष्कर्म जैसी घिनौनी घटनाओं ने सिर्फ दिल्ली नहीं, पूरे देश को शर्मसार कर दिया है. कड़े कानून की मांग सर्वोपरि है. दूसरी ओर नारी-प्रताड़ना की वारदातें भी लगातार सामने आती रही हैं. लगता है, नारी-शत्रु अपने को जीवित बता कर बार-बार चुनौती दे रहे हैं. क्या कड़ा कानून अपराध का अंत कर पाया है या कर पायेगा? कभी नहीं. पर कड़ा कानून होना ही चाहिए, जो सूराख रहित हो. लेकिन आज जरूरत है, पूरी सोच में बदलाव की. कानून अपना काम जरूर करे, लेकिन समग्र सामाजिक बदलाव की जरूरत है. आज समाज के हर क्षेत्र में अनैतिकता का बोलबाला है.
अनैतिकता और अनैतिक सामग्री हर जगह पसरी हुई है, जिसकी ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है और न ही यह राष्ट्रीय मुद्दा बन रहा है. वर्तमान कानून सही ढंग से लाग हो, पर सब अपना काम ठीक ढंग से करें, यह कोई नहीं सोचता. अब परिवारों का वह स्वरूप नहीं रहा कि बड़े-बुजुर्गो का समादर हो, उनकी बात सुनी जाये, बल्कि सच्ची बात तो यह है कि उनका ही अस्तित्व संकट में है. पहले जैसे शिक्षक अब रहे नहीं, जिनका समाज पर कुछ प्रभाव पड़े. अभिभावक उनकी समुचित कद्र भी नहीं करते. ऐसे समाज में यह सब तो होगा ही.
इमाम हाशमी, कुटे, ओरमांझी, रांची
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