शिक्षा पर केंद्र का शिकंजा

42 वें संविधान संशोधन के द्वारा शिक्षा को समवर्ती सूची में रखा गया. लेकिन पिछले कुछ वर्षो से शिक्षा में सुधार के नाम पर नये-नये कानून/योजनाएं लागू करके केंद्र सरकार ही शिक्षा पर हावी हो रही है. सीबीएसइ और एनसीइआरटी के संदर्भ में राज्य सरकारें मौन दिखती हैं. सरकारी विद्यालय केंद्र सरकार की लोक-लुभावन योजनाओं […]
42 वें संविधान संशोधन के द्वारा शिक्षा को समवर्ती सूची में रखा गया. लेकिन पिछले कुछ वर्षो से शिक्षा में सुधार के नाम पर नये-नये कानून/योजनाएं लागू करके केंद्र सरकार ही शिक्षा पर हावी हो रही है. सीबीएसइ और एनसीइआरटी के संदर्भ में राज्य सरकारें मौन दिखती हैं. सरकारी विद्यालय केंद्र सरकार की लोक-लुभावन योजनाओं को मूर्त रूप देने के लिए सर्वसुलभ केंद्र बन गये हैं.
सर्व शिक्षा अभियान के बाद शिक्षा का अधिकार कानून लागू कर दिया गया है, जिसके तहत 14 वर्ष की आयु तक के बच्चों के लिए सब कुछ मुफ्त कर दिया गया है. सरकारी विद्यालयों में मुफ्त भोजन (मिड-डे मील), मुफ्त किताबें, मुफ्त पोशाक के साथ बिना परिश्रम किये मुफ्त में डिग्री भी दी जा रही है. बच्चों को बिना परीक्षा दिये अगली कक्षाओं में प्रोन्नति दिये जाने का प्रावधान है. फेल होने का डर नहीं, तो फिर बच्चे मेहनत क्यों करें? ऐसी ही परिस्थितियों में बच्चों के मन में आपराधिक प्रवृत्तियों का जन्म हो सकता है. गुरुजी तो मानो एक नौकर हो गये हैं.
आरटीइ के तहत उन्हें बच्चे व अभिभावक खरी-खोटी सुना कर चले जाते हैं. मिड-डे मील को केंद्र की महत्वाकांक्षी योजना बताया जाता है, मगर देश में प्रतिदिन यह कहीं न कहीं जानलेवा बनती है. कहीं बच्चे मरते हैं, तो कहीं बीमार होते हैं, लेकिन केंद्र को इस बात की कोई चिंता नहीं, क्योंकि मरनेवाले गरीब तबके से से ताल्लुक रखते हैं.आवश्यकता है इस व्यवस्था में तत्काल बदलाव की. गुरुजी सिर्फ पढ़ाने का काम करें, तो बेहतर है. निजी स्कूलों पर भी सरकारें नकेल कसने की तैयारी में हैं, जो अनुचित प्रतीत होता है. निजी स्कूल फीस के रूप में बेशक मोटी रकम लेते हैं, लेकिन यह उनकी व्यवस्था, कक्षा संचालन, अनुशासन के अनुपात में है.
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