गरीबों को लूट कर न भरें अपनी जेब

Published at :16 Feb 2015 5:15 AM (IST)
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गरीबों को लूट कर न भरें अपनी जेब

स्वास्थ्य विभाग की एक गोपनीय रिपोर्ट से दवा कारोबारियों और डॉक्टरों की सांठगांठ फिर सतह पर आ गयी है. इस रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में करीब 80 फीसदी चिकित्सक रोगियों को ऐसी दवाएं लिखते हैं, जो उन्हें बाहर से खरीदनी पड़ती हैं. कुछ चिकित्सक तो ऐसे भी हैं, जो सरकारी अस्पतालों या मेडिकल कॉलेज अस्पतालों […]

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स्वास्थ्य विभाग की एक गोपनीय रिपोर्ट से दवा कारोबारियों और डॉक्टरों की सांठगांठ फिर सतह पर आ गयी है. इस रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में करीब 80 फीसदी चिकित्सक रोगियों को ऐसी दवाएं लिखते हैं, जो उन्हें बाहर से खरीदनी पड़ती हैं. कुछ चिकित्सक तो ऐसे भी हैं, जो सरकारी अस्पतालों या मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में मिलने वाली दवाएं कभी लिखते ही नहीं हैं.
यूं तो यह रिपोर्ट बिहार की है, लेकिन झारखंड व दूसरे राज्यों में भी ऐसी स्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता है. इस रिपोर्ट के आईने में गरीब रोगियों की जेब की कीमत पर दवा व्यवसाय के फलने-फूलने की प्रक्रिया को समझा जा सकता है. राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के जरिये जिला अस्पतालों में और राज्य सरकार के स्तर से मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में रोगियों के लिए मुफ्त दवाओं की व्यवस्था है. आउटडोर में 64 और इनडोर में 103 जेनरिक दवाएं मुफ्त दिये जाने का प्रावधान है.
इन दवाओं की कीमत निजी दुकानों में मिलने वाली दवाओं की तुलना में काफी कम होती हैं. अस्पतालों के स्टोर में दवाओं के अभाव या आकस्मिक परिस्थिति में बाहरी दुकानों से दवा मंगाने की मजबूरी अपवाद हो सकता है. लेकिन, यदि बड़ी संख्या में चिकित्सक इसे परिपाटी बना चुके हैं, तो इस नतीजे पर पहुंचने की कोई वजह नहीं है कि यह सरकारी नियम-कायदे को ठेंगा दिखाने और इसके पीछे सांठगांठ है.
पिछले साल उजागर हुए दवा घोटाले को लोग भूले नहीं हैं. किस तरह नियम-कायदे को दरकिनार कर कम गुणवत्ता वाली और ऊंची कीमत पर दवाओं की खरीद से करीब 14 करोड़ रुपये का वारा-न्यारा हुआ. सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए वही रोगी जाते हैं, जो निजी क्षेत्र में संचालित महंगे इलाज का खर्च उठाने की कूवत नहीं रखते हैं.
सरकारी अस्पतालों की साख बची रहे, इसके लिए जरूरी है कि बाहरी दवा लिखने पर अंकुश लगे. चिकित्सक भी आत्मावलोकन करें. आइजीआइएमएस के स्थापना दिवस समारोह में भुवनेश्वर एम्स के निदेशक डॉ अशोक महापात्र ने चिकित्सकों को ठीक ही नसीहत दी है कि धरती का भगवान होने की वजह से आप इस ओहदे की लाज रखें, क्योंकि दवा जीवन देती है और उपचार परेशानियों का अंत करता है.
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