राजनीतिक जनांदोलन की देश को जरूरत

Published at :11 Feb 2015 5:20 AM (IST)
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राजनीतिक जनांदोलन की देश को जरूरत

शैलेश कुमार प्रभात खबर, पटना आखिर इतिहास बन ही गया. आम आदमी ने हस्तिनापुर जीत लिया. अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए जन लोकपाल को लेकर चलाया आंदोलन इनमें सबसे प्रमुख था. यह अंदाजा तो पहले से ही था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुआ जनांदोलन किस दिशा में जा रहा […]

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शैलेश कुमार
प्रभात खबर, पटना
आखिर इतिहास बन ही गया. आम आदमी ने हस्तिनापुर जीत लिया. अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए जन लोकपाल को लेकर चलाया आंदोलन इनमें सबसे प्रमुख था. यह अंदाजा तो पहले से ही था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुआ जनांदोलन किस दिशा में जा रहा है और इसका क्या हश्र होगा?
टीम अन्ना के सदस्यों में वैचारिक मतभेदों की वजह से जनांदोलन रास्ता भटक गया. खुद अन्ना भी यह निर्णय नहीं कर सके कि आखिर वह किस दिशा में जाना चाहते हैं और उनकी रणनीति क्या होगी? अंत में वही हुआ, जो बहुत लोग नहीं चाहते थे. टीम अन्ना के प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल ने राजनीतिक राह पकड़ने की घोषणा कर दी. उनके इस निर्णय की वजह से उनसे जुड़े कई लोगों ने उनका साथ छोड़ दिया और उनके खिलाफ हो गये, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि केजरीवाल ने ऐसा करके एक नया मार्ग प्रशस्त किया. एक ऐसा मार्ग, जिसे आमतौर पर लोग घिनौना करार देते हैं.
लोकतंत्र के अंतर्गत खुद राजनीति रूपी इस मार्ग का हिस्सा होकर भी इसकी निंदा करते हैं. आप मानें या ना मानें, लेकिन इस सच्चाई से कतई मुह नहीं मोड़ सकते कि कीचड़ को साफ करने के लिए आपको खुद कीचड़ में उतरना पड़ेगा. वास्तव में वर्तमान स्थिति ऐसी है कि बिना राजनीति में कदम रखे जनांदोलन चलेगा ही नहीं. दूसरे शब्दों में कहें तो राजनीतिक हथियार को अपनाये बिना अब आंदोलन की सार्थकता नहीं रह जायेगी. भ्रष्टाचार ने जिस तरह से पांव फैलाये हैं और जिस प्रकार से लगभग सभी दलों के वरिष्ठ नेताओं का नाम इनमें सामने आ रहा है, उसे देखते हुए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि इनके सत्ता में रहते कभी इन्हें उनके पापों की सजा नहीं मिल पायेगी.
सबके सामने भले ही वे एक दूसरे की टांग खीचते नजर आते हों, किंतु हकीकत यही है कि सभी एक ही थाली के बैंगन हैं. इन्हें सबक सिखाने के लिए इन्हें राजनीति में चुनौती देने की जरूरत है. तभी वांछित परिणाम मिलने की कोई गुंजाइश है. बेहतर यही होगा कि लोग सोचने का नजरिया बदले. विशेषकर ऐसे युवा जो वास्तव में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करना चाहते हैं और देश की तरक्की में योगदान देना चाहते हैं, वे राजनीतिक व्यवस्था को समङों और राजनीतिक जनांदोलन का हिस्सा बनें. सबने भ्रष्ट नेताओं की निंदा की, पर कितनों ने आखिर इसके खिलाफ आवाज उठायी. निंदा करना तभी शोभा देता है, जब साथ में हम उसका विकल्प भी दें. वक्त आ गया है कि कोने-कोने में बैठे ऐसे सभी लोग जो खुद को ईमानदार मानते हैं और देश की सफाई करना चाहते हैं, वे राजनीतिक आंदोलन का हिस्सा बनें. चुनाव लड़ने की रणनीति बनायें. एक जैसी सोच रखनेवाले और बदलाव लाने की ख्वाहिश रखने वाले ऐसे लोग जिस दिन सत्ता में आ गये, उस दिन जनांदोलन सफल होगा. यह काम आसान नहीं है. केजरीवाल की सफलता कम से कम यही कहती है.
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