सत्ता का दिखावटी विकेंद्रीकरण
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :10 Feb 2015 5:47 AM (IST)
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डॉ भरत झुनझुनवाला अर्थशास्त्री लंबी पारी खेलने के लिए सत्ता का केंद्र राज्य होने चाहिए. हमारे संविधान में इंटर स्टेट काउंसिल की व्यवस्था है. इसे पुनर्जीवित करें और पीएमओ के स्थान पर इस संस्था के माध्यम से राष्ट्र की दिशा का निर्णय लें, तो हम तीव्र और स्थायी विकास हासिल कर सकेंगे. केंद्र सरकार द्वारा […]
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डॉ भरत झुनझुनवाला
अर्थशास्त्री
लंबी पारी खेलने के लिए सत्ता का केंद्र राज्य होने चाहिए. हमारे संविधान में इंटर स्टेट काउंसिल की व्यवस्था है. इसे पुनर्जीवित करें और पीएमओ के स्थान पर इस संस्था के माध्यम से राष्ट्र की दिशा का निर्णय लें, तो हम तीव्र और स्थायी विकास हासिल कर सकेंगे.
केंद्र सरकार द्वारा योजना आयोग को समाप्त कर नीति आयोग का गठन किया गया है. योजना आयोग की तरह नीति आयोग के प्रमुख प्रधानमंत्री होंगे, परंतु नीति आयोग के सदस्यों में फेरबदल किया गया है. योजना आयोग के सभी सदस्य केंद्र सरकार द्वारा नामित किये जाते थे. नीति आयोग में केंद्र सरकार द्वारा नामित इन सदस्यों के साथ सभी राज्यों के मुख्यमंत्री सदस्य होंगे.
यह सराहनीय है. परंतु आयोग के अधिकारों में कटौती की गयी है. अब नीति आयोग की भूमिका केवल केंद्र सरकार को सलाह देने की रहेगी. अब तक योजना आयोग द्वारा राज्यों को धन आवंटित किया जाता था. अब केंद्र सरकार द्वारा किया जायेगा. यानी मुख्यमंत्रियों को केवल केंद्र को सलाह देने का अधिकार रहेगा. यानी नीति आयोग में इनकी सदस्यता महज दिखावा है.
आधारभूत प्रश्न देश के ढांचे का है. हमें तय करना होगा कि राज्य प्रमुख है या केंद्र. राज्यों के बताये अनुसार केंद्र को चलना है अथवा केंद्र सरकार के बताये अनुसार राज्यों को. दूसरे देशों और स्वयं अपने अनुभव से पता चलता है कि संघीय ढांचा दीर्घगामी होता है. संघीय ढांचे का प्रमुख सफल उदाहरण अमेरिका है. यहां केंद्र का गठन राज्यों के द्वारा किया गया था. राज्य की भूमिका प्राथमिक और केंद्र की भूमिका द्वितीय स्तर की है. अमेरिकी संविधान में जिन विषयों का उल्लेख नहीं है, वे राज्यों के अधिकार में चले जाते हैं. ऐसे कई देशों के उदाहरण हैं.
दूसरी तरफ केंद्रीय ढांचे के कई असफल उदाहरण उपलब्घ हैं. सोवियत रूस में केंद्र की प्रमुखता थी. वहां राज्यों का निरंतर उत्पात बना रहा. नब्बे के दशक में इस देश का विघटन हो गया. ईरान में सद्दाम हुसैन और इसके बाद मलीकी ने केंद्र को प्रबल बनाया. नतीजा हुआ कि कुर्द तथा दूसरे राज्यों के द्वारा विद्रोह किया गया और आज यह देश टूटने की कगार पर है. इंग्लैंड का ढांचा भी संघीय है.
इस वर्ष स्कॉटलैंड ने इंग्लैंड से अलग होने की मांग की थी. इस पर जनमत कराया गया. जनमत के दौरान केंद्र ने आश्वासन दिया कि स्कॉटलैंड को अधिक स्वायत्तता दी जायेगी. इस तरह अंतिम मत इंग्लैंड का हिस्सा बने रहने के पक्ष में हुआ. उदाहरणों से स्पष्ट है कि लंबी पारी के लिए संघीय ढांचा सफल है.
इन उदाहरणों के बीच हमारे सामने चीन है, जिसने केंद्रीय मॉडल को अपनाया है. अस्सी के दशक के बाद चीन में तीव्र आर्थिक विकास भी हुआ है. आज चीन को विश्व के दूसरे ध्रुव के रूप में देखा जा रहा है, बिल्कुल वैसे ही जैसे कभी रूस को देखा जाता था. परंतु भीतरी मंगोलिया, तिब्बत तथा जिनजियांग राज्यों में स्वतंत्रता के आंदोलन निरंतर चल रहे हैं. अत: चीन की वर्तमान सफलता को टिकाऊ नहीं कहा जा सकता है. रूस का विघटन केंद्रीय व्यवस्था के लागू होने के 80 वर्षो के बाद हुआ था. जिस प्रकार साठ के दशक में रूस ने अमेरिका को चुनौती दी थी, उसी प्रकार आज चीन अमेरिका को चुनौती दे रहा है.
हमारा अपना अनुभव भी इसी दिशा में इशारा करता है. पूर्वोत्तर, पंजाब एवं कश्मीर में अलगाववाद के आगे न बढ़ने का मूल कारण राज्यों की स्वायत्तता है. राज्यों को अपने विवेक के अनुसार चलने की छूट देने से उन्हें संघीय ढांचे में बना रहना श्रेयस्कर लगा है. राज्यों को प्रयोग करने का अवसर भी उपलब्घ है.
महाराष्ट्र की रोजगार गारंटी योजना तथा तमिलनाडु की मध्याह्न् भोजन योजना को पूरे देश ने अपनाया है. ये प्रयोग संघीय ढांचे के चलते ही सभंव हुए. हमारे संघीय ढांचे में जो समस्याएं उत्पन्न हुई हैं, उनका कारण भी केंद्र सरकार का भारीपन लगता है.
हमारे संघीय ढांचे की सफलता पड़ोसी देशों से तुलना करने पर और स्पष्ट हो जाती है. पाकिस्तान से बंगलादेश के अलग होने का कारण संघीय स्वायत्तता का अभाव था. बलूचिस्तान में अलगाववाद बार-बार सर उठा रहा है. श्रीलंका में तमिल लोगों ने अलगाववाद का रास्ता इसीलिए अपनाया है कि उन्हें स्वायत्तता नहीं मिल रही थी.
उपरोक्त सफलताओं के सामने लालू यादव का बिहार है. 15 वर्षो तक संघीय स्वायत्तता का उपयोग करके उन्होंने बिहार को पिछड़ा बना दिया. ऐसे अपवादों से घबराना नहीं चाहिए. इस परिप्रेक्ष में योजना आयोग के पुनर्गठन को समझना होगा. समस्या है कि नीति आयोग के गठन के बाद भी राज्यों को वित्तीय सहायता देने का अधिकार प्रधानमंत्री के हाथ में है. पहले यह वितरण योजना आयोग द्वारा प्रधानमंत्री के इशारे पर होता था. अब यह स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा होगा.
प्रधानमंत्री कार्यालय में सत्ता का केंद्रीयकरण पूर्ववत है. इससे तत्काल लाभ मिल सकता है, जैसे सोवियत रूस को बीसवीं सदी में अथवा चीन को वर्तमान में मिल रहा है.
परंतु लंबी पारी खेलने के लिए सत्ता का केंद्र राज्य होने चाहिए. हमारे संविधान में इंटर स्टेट काउंसिल की व्यवस्था है. इसे पुनर्जीवित करें और पीएमओ के स्थान पर इस संस्था के माध्यम से राष्ट्र की दिशा का निर्णय लें, तो हम तीव्र और स्थायी विकास हासिल कर सकेंगे.
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