जब तक रहेगा समोसे में आलू तब तक..

Published at :09 Feb 2015 5:59 AM (IST)
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जब तक रहेगा समोसे में आलू तब तक..

लोकनाथ तिवारी प्रभात खबर, रांची पता नहीं क्यों अपने काका आज सुबहिए से समोसा आउर आलू का भजन कर रहे थे. जब तक रहेगा समोसा में आलू, तब तक रहेगा.. अब काका की बातें कभी बेवजह तो होती नहीं. इस बार भी जरूर कोई जगत प्रसिद्ध प्रसंग उनके दिमाग में कुलबुला रहा होगा. काका के […]

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लोकनाथ तिवारी

प्रभात खबर, रांची

पता नहीं क्यों अपने काका आज सुबहिए से समोसा आउर आलू का भजन कर रहे थे. जब तक रहेगा समोसा में आलू, तब तक रहेगा.. अब काका की बातें कभी बेवजह तो होती नहीं. इस बार भी जरूर कोई जगत प्रसिद्ध प्रसंग उनके दिमाग में कुलबुला रहा होगा. काका के सामने चाय की प्याली रखते ही उन्होंने बिहार का प्रसंग छेड़ दिया. अरे बबुवा, अब समझ में आया अपने लालू भइया के कंप्यूटर सरीखा खोपड़िया का करिश्मा.

बेचारे को जब चारा घोटाला में कुरसी छोड़नी पड़ी थी तो उन्होंने बहुत सोच-विचार कर ही राबड़ी देवी को इस पर बिठाया था. वे बिहार व बिहारी पॉलिटिक्स की नस-नस से वाकिफ हैं. बढ़िया से जानते हैं कि उत्तर भारत में पन्नीरसेल्वम (तमिलनाडु) सरीखा नेता नहीं होता. यहां तो हर कोई अपने आप में बड़का नेता बन सकता है. बस उसे एक बार कुरसी की गंध मिल जाय, फिर तो.. अपने नीतीश भाई ने नैतिकता की दुहाई देकर अपने सिपहसालार जीतनराम मांझी को सत्ता सौंपी. उस समय अपने मांझी भी नीतीश प्रेम में कसीदे पढ़ते नहीं थकते थे. लेकिन कुछ दिन बाद ही कुरसी की ताकत ने उनको तिकड़म व दावं पेंच सिखा दिया.

अब वे खुद को ही धुरंधर समझने लगे. अम्मा ने पन्नीरसेल्वम को दूसरी बार सत्ता सौंपी. पन्नीर भाई ने भी इसका अच्छा सिला दिया. गणतंत्र दिवस परेड की झांकी में सारे नियमों को ताक पर रखते हुए उन्होंने अम्मा का चित्र तक लगा दिया. दूसरी तरफ अपने मांझी हैं, जिन्होंने साल भी नहीं बीतने दिया. बिहार की सत्ता पर स्थायी तौर पर काबिज होने की जुगत भिड़ाने लगे. जुबानी जंग तक तो ठीक था. अब मांझी ने बिहार की सत्ता रूपी नाव की टूटी पतवार थाम कर राजनीतिक समंदर पार करने की मनसा बना डाली है. ऐसा करने के उत्साह में उन्होंने मोदी की प्रशंसा में कसीदे काढ़ने भी शुरू कर दिये.

इसका खामियाजा तो उनको भुगतना ही था. मांझी के सियासी मंसूबों को तो लोग उसी समय भांप गये जब उन्होंने आरजेडी और जेडीयू के मंसूबों पर पानी फेरने की कवायद शुरू कर दी. जब नीतीश-लालू अपने झगड़ों को दफना कर भविष्य की रणनीति बनाने में लगे थे, तब मांझी कभी नरेंद्र मोदी की तारीफ करके और कभी राज्य में दलित को मुख्यमंत्री बनाने की पैरवी करके राजनीतिक बेचैनी पैदा करने में लगे रहे. और तो और जब नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट शुरू हुई तो उन्होंने अपनी नाक कटा कर अपने ही लोगों का जतरा भंग करने की तैयारी भी कर डाली. वरना कोई नेता ऐसे समय में विधानसभा भंग करने की सिफारिश नहीं करता. मांझी बखूबी जानते हैं कि उनके साथ संख्या बल न है, न कभी हो सकता है.

ऐसे में जाति कार्ड खेल कर और विरोधियों की भावनाओं को भड़का कर ही उन्होंने पासा पलटने की जुगत भिड़ा डाली. काका ठीक ही कह रहे हैं कि अभी नीतीश को लालू से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है. ऐसे ही थोड़े न कहा जाता है कि जब तक रहेगा समोसे में आलू तब तक रहेंगे अपने बिहार के लालू…

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