खतरनाक होती आर्थिक विषमता

Published at :09 Dec 2014 2:09 AM (IST)
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खतरनाक होती आर्थिक विषमता

क्रेडिट स्विस द्वारा हाल में जारी वैश्विक संपत्ति के आंकड़े भारत सहित दुनिया में बढ़ती आर्थिक विषमता की त्रसद कहानी बयां करते हैं. इस समय दुनिया के एक फीसदी सबसे धनी लोग 48 फीसदी से अधिक वैश्विक संपत्ति के मालिक हैं, जबकि निचली आधी आबादी के पास एक फीसदी से भी कम संपत्ति है. अपने […]

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क्रेडिट स्विस द्वारा हाल में जारी वैश्विक संपत्ति के आंकड़े भारत सहित दुनिया में बढ़ती आर्थिक विषमता की त्रसद कहानी बयां करते हैं. इस समय दुनिया के एक फीसदी सबसे धनी लोग 48 फीसदी से अधिक वैश्विक संपत्ति के मालिक हैं, जबकि निचली आधी आबादी के पास एक फीसदी से भी कम संपत्ति है.

अपने देश में भी कुल संपत्ति का करीब आधा (49 फीसदी) हिस्सा एक फीसदी शीर्षस्थ धनिकों के पास है, जबकि करीब तीन चौथाई (74 फीसदी) हिस्सा 10 फीसदी सबसे धनी लोगों के पास है. दूसरी ओर सबसे गरीब 10 फीसदी लोगों के पास कुल संपत्ति का महज 0.2 फीसदी हिस्सा है. इस अध्ययन के मुताबिक देश में सन् 2000 के बाद धनकुबेरों की संपत्ति में तेजी से वृद्धि हुई है.

उल्लेखनीय है कि 1990 के बाद भारत सहित कई देशों में आर्थिक उदारीकरण की नीतियां लागू की गयी थीं. यह नीतियां मुख्यत: अमेरिका से प्रेरित है, जहां शीर्ष एक फीसदी धनिकों के पास संपत्ति का 40 फीसदी हिस्सा है और वे राष्ट्रीय आय का 25 फीसदी ले जाते हैं. नोबेल विजेता अमेरिकी अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिग्लिज के मुताबिक अवसरों का लगातार कम होना आर्थिक विषमता बढ़ने का बड़ा कारण है.

अपने देश में भी उदारीकरण के बाद उत्पादन एवं आय में भले वृद्धि हुई हो, रोजगार के अवसरों में प्रत्याशित वृद्धि न होने से आबादी के बड़े हिस्से तक इसका लाभ नहीं पहुंचा है. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं बुनियादी सुविधाओं के जरिये गरीबों का जीवनस्तर उठाने में सरकारें विफल रही हैं. शीर्ष स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार का भी ज्यादातर धन-कुबेरों ने खूब लाभ उठाया है. अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘कैपिटल’ में अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने लिखा है कि ‘विषमता का एक सर्वाधिक असंवेदनशील पहलू यह है कि कम होती आय व संपत्ति के साथ धनिक वर्ग गरीबों को अयोग्य घोषित कर रहा है. विषमता का यह स्तर अत्यधिक धनिकों द्वारा राजनीतिक प्रक्रिया पर काबिज होने का रास्ता भी बनाता है, जो लोकतांत्रिक संस्थाओं और मूल्यों के लिए खतरनाक है.’ जाहिर है, लोकतांत्रिक सरकारों से उम्मीद की जानी चाहिए कि वह गरीबों को बेहतर अवसर व संसाधन उपलब्ध कराने की ठोस कोशिश करेगी और शीर्ष धनिकों से पर्याप्त कर वसूलने की समुचित नीति लागू करेगी.

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