जवाबदेह राजनीति से उपजी कामयाबी

Published at :16 Nov 2014 11:54 PM (IST)
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जवाबदेह राजनीति से उपजी कामयाबी

बाढ़ और कांटी थर्मल पावर की एक-एक यूनिट चालू हो जाने के बाद बिहार अब बिजली के मामले में आत्मनिर्भर हो जाने के करीब पहुंच गया है. इन दोनों इकाइयों से बिहार को 500 मेगावाट बिजली मिलेगी. यानी अब बिहार को दूसरे राज्यों से नाममात्र बिजली खरीदनी पड़ेगी. बिहार की इस उपलब्धि को रेखांकित करने […]

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बाढ़ और कांटी थर्मल पावर की एक-एक यूनिट चालू हो जाने के बाद बिहार अब बिजली के मामले में आत्मनिर्भर हो जाने के करीब पहुंच गया है. इन दोनों इकाइयों से बिहार को 500 मेगावाट बिजली मिलेगी.

यानी अब बिहार को दूसरे राज्यों से नाममात्र बिजली खरीदनी पड़ेगी. बिहार की इस उपलब्धि को रेखांकित करने की जरूरत है. यहां के लोग लंबे अरसे से बिजली की किल्लत ङोल रहे थे और डेढ़ दशक पहले तक यहां बिजली उत्पादन के क्षेत्र में निजी या सार्वजनिक निवेश की संभावना भी नहीं दिखती थी. झारखंड बंटवारे के बाद कांटी और बरौनी बिजली घर परिसंपत्ति से कहीं ज्यादा बोझ की तरह थे. यह नीतीश कुमार की पहल का परिणाम है कि आज बिहार 2600 मेगावाट बिजली जुटाने के काबिल हो चुका है.

1999 में नीतीश कुमार की पहल पर तत्कालीन अटल सरकार ने बाढ़ में सुपर थर्मल पावर परियोजना को मंजूरी दी थी. अपराध, रंगदारी और जल जमाव के लिए कुख्यात इलाके में इतनी बड़ी परियोजना की मंजूरी और उसे जमीन पर उतारना सचमुच चुनौती भरा था. वह भी तब जब केंद्र पर दबाव डालने के लिए दक्षिण के राज्यों की तरह बिहार की कोई राजनीतिक या प्रशासनिक लॉबी नहीं हो. चार साल बाद बाढ़ प्रोजेक्ट से 3300 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा.

पिछले सात-आठ वर्षो में यदि बिहार 600 मेगावाट से 2600 मेगावाट बिजली जुटाने की स्थिति में पहुंचा, तो यह विकास को राजनीति का मुख्य एजेंडा बनाने और जनता से किये गये वायदे को समय सीमा के भीतर पूरा करने के संकल्प के कारण संभव हो पाया. पिछले चुनाव में ही नीतीश ने वायदा किया था कि यदि 2015 तक बिहार में बिजली की स्थिति नहीं सुधरी तो वह वोट मांगने नहीं आयेंगे. उन्होंने अपना वायदा निभाया. यह उन नेताओं के लिए भी सबक है, जो आरोप-प्रत्यारोप और जोड़-तोड़ को राजनीति समझते हैं. बिजली के मामले में बिहार में बदलाव जवाबदेह राजनीति और विकास को मुख्य एजेंडा बनाये जाने के कारण आया है. आज बिहार को ऐसी ही राजनीति और ऐसी ही राजनीति करनेवाले नेताओं की जरूरत है. चुनावी वादों को अगर इतनी ही गंभीरता से सभी नेता लें, तो देश की राजनीति में जवाबदेही भरा गुणात्मक परिवर्तन दिख सकता है.

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