आर्थिक चिंताओं से ऐसे तो मुक्ति नहीं मिलेगी

Published at :13 Aug 2014 12:33 AM (IST)
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आर्थिक चिंताओं से ऐसे तो मुक्ति नहीं मिलेगी

पिछले 10-15 सालों में एक एसएमएस बहुत तेजी से चला कि मैं 12-14 घंटे काम इसलिए करता रहा कि प्रमोशन मिलेगा और कम घंटे काम करना पड़ेगा लेकिन जब मैं बॉस बना तो पता चला कि अब 24 घंटे काम करना है. समाज का आर्थिक भविष्य कैसा है, स्वतंत्रता दिवस के मौके पर इस सवाल […]

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पिछले 10-15 सालों में एक एसएमएस बहुत तेजी से चला कि मैं 12-14 घंटे काम इसलिए करता रहा कि प्रमोशन मिलेगा और कम घंटे काम करना पड़ेगा लेकिन जब मैं बॉस बना तो पता चला कि अब 24 घंटे काम करना है.

समाज का आर्थिक भविष्य कैसा है, स्वतंत्रता दिवस के मौके पर इस सवाल पर सोच-विचार करना मुनासिब होगा. प्रख्यात अमेरिकी पत्रिका न्यूयार्कर में पिछले सप्ताह एक आलेख आया है, जो अमेरिका की वर्तमान आर्थिक जिंदगी को प्रसिद्ध अर्थशात्री जान मेनार्ड कींस की उम्मीदों के बरक्स रख कर देखा गया है. 1930 में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जान मेनार्ड कींस ने समाज के आर्थिक भविष्य के बारे में सवाल सबके सामने रखे थे – अब से 100 साल बाद हम अपने समाज की आर्थिक जिंदगी के स्तर को लेकर क्या उम्मीद कर सकते हैं? हमारे पौत्र-पौत्रियों के लिए उस समय क्या आर्थिक संभावनाएं होंगी? कींस का मानना था कि औद्योगिक क्र ांति के बाद से अब तक (1930 तक) प्रौद्योगिकी के उन्नयन के साथ पूंजी के तेज अकुमुलेशन ने यूरोप के लोगों की जिंदगी का स्तर लगभग चार गुना बेहतर हुआ है और इसमें कोई संदेह नहीं कि आनेवाले दिनों में भी जीवनस्तर और तेज रफ्तार से बेहतर होगा.

कींस का आकलन था कि अगले 100 साल में प्रगतिशील देशों के लोगों के जीवन का आर्थिक स्तर 4 से 8 गुना बेहतर होना तय है. तकनीकी उन्नयन और पूंजी का संयुक्त समीकरण आर्थिक जीवन की तमाम चिंताओं को अप्रासंगिक बना देगा. लोगों के जीवन की बुनियादी जरूरतों के लेकर परेशान नहीं होना पड़ेगा. इसके चलते आम लोगों के पास इफरात में खाली समय होगा और उनके सामने इतना खाली समय एक नयी समस्या होगा – बुनियादी आर्थिक जरूरतों से स्वतंत्रता का इस्तेमाल कैसे किया जाये और तकनीक व विज्ञान ने मनोरंजन-मस्ती के जो साधन मुहैया कराये हैं, उनसे मुक्ति कैसे पायें?

ऐसा हुआ भी. यूरोप में काम के घंटे 1930 की मंदी के समय हफ्ते में 40 घंटे तक आ गये थे. कुछ देशों में तो यह घंटे बाद में और भी कम हुए. 1935 में विश्व श्रम संगठन ने अपने सदस्य देशों के लिए हफ्ते में काम के अधिकतम घंटे 40 के स्तर पर निर्धारित कर दिया. 1998 तक विकसित देशों में काम के घंटे 40 के स्तर पर ही रहे. लेकिन उसके बाद काम के घंटे 35 के स्तर पर ला दिये गये बिना वेतन कम किये हुए. ओसेड (आर्थिक सहयोग और विकास संगठन) का आकलन है कि उसके सदस्य 32 देशों में से 24 में काम के घंटे 2011-12 के दौरान 34 से नीचे पहुंच गये. अमेरिका उन दो देशों में से है जहां काम के घंटे पिछले चार साल के दौरान बढ़ गये हैं. लेकिन जहां काम के घंटे घटे हैं, वहां भी इसलिए नहीं कि काम नहीं है बल्किइसलिए कि रोजगार का वितरण समान रूप से हो सके और बेरोजगारी की समस्या न बढ़े. कींस का आकलन यहां गलत हो गया क्योंकि जहां काम के घंटे कम हुए वहां वहां आय भी कम हो गयी. बिलकुल अपने यहां के मनरेगा की तर्ज पर कि सबको साल में 100 दिन का रोजगार मिलेगा.100 दिन का इसलिए जिससे सब लोगों को रोजगार मिल सके. लेकिन ऐसा नहीं है कि आर्थिक जरूरतें अप्रासंगिक हो गयीं.

1930 के बाद हुआ क्या. दुनिया मोटे तौर पर दो हिस्सों में बंट गयी – एक सोशिलस्ट ब्लाक और एक अमेरिकन ब्लाक. प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल सिर्फ उत्पादन के लिए नहीं रह गया और इसके चलते उत्पादन और पूंजी का अंतरसंबंध भी बदलने लगा. पूंजी से बिना उत्पादन के पूंजी बनाने की युक्ति विकसित की गयी. जब पूंजी निर्माण बिना उत्पादन के होने लगा तो पूंजी कुछ जगहों पर जमा होने लगी. यूरोप की औद्योगिक क्र ांति और अमेरिकी फाइनेंशियल क्र ांति के इस अंतर की वजह से ही कींस के आकलन सही साबित नहीं हो पाये.

अब जरा हम अपने देश पर गौर करें. अपने देश में आम आदमी की आर्थिक जिंदगी का स्तर क्या है? अपने यहां बच्चा पढ़ाई इसलिए करता है जिससे उसको रोजगार मिले, रोजगार मिले तो घर की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में हाथ बंटाये. यह कहा जाना गलत नहीं है कि आम भारतीय की जिंदगी बहनों की शादी करने, बच्चों को पढ़ाने फिर बच्चों की शादी करने और जीवन भर की कमाई से एक मकान बनाने में ही चली जाती है. एक बड़ी तादात उन लोगों की भी है जिनकी जिंदगी दो जून की रोटी की चिंता में ही खत्म हो जाती है. तमाम लोग यह कहते हुए मिल जायेंगे कि दुखों यानी आर्थिक चिंताओं से मुक्ति मौत के साथ ही मिलती है. अब उन लोगों की बात करते हैं जो आफिसों में काम करते हैं. निजी आफिसों में व्यक्ति 12-12 घंटे काम जुनून के तहत नहीं करता है बल्कि मजबूरी में करता है जिससे उसकी नौकरी पर आफत न आ जाये. 1991 से पहले अपने यहां जो लोग रोजगारशुदा (नौकरीपेशा) थे, उनकी जिंदगी से बाकी लोग ईष्र्या करते थे कि छह घंटे काम करना पड़ता (10 से चार) है और फिर समय अपना. लेकिन अब रोजगारशुदा लोग 12-14 घंटे काम करते हैं. पहले छह घंटे से ज्यादा काम करने पर अतिरिक्त पैसे मिलते थे, लेकिन ज्यादा घंटों तक काम इसलिए किया जा रहा है कि जो पैसे मिल रहे हैं, वे मिलते रहें. पिछले 10-15 सालों में एक एसएमएस बहुत तेजी से चला कि मैं 12-14 घंटे काम इसलिए करता रहा कि प्रमोशन मिलेगा और कम घंटे काम करना पड़ेगा लेकिन जब मैं बॉस बना तो पता चला कि अब 24 घंटे काम करना है.

तो फिर कहां है आर्थिक स्वतंत्रता और कुछ अपवादों को छोड़ कर किस देश में? पिछले 400 सालों में दुनिया भर में आर्थिक जीवन पहले औद्योगिक क्रांति और फिर अमेरिका की फाइनेंशियल क्रांति से प्रभावित हुआ. औद्योगिक क्रांति ने अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में लोगों के जीवन स्तर को ऊपर बढ़ाया, तो फाइनेंशियल क्रांति ने इस ऊपर उठे जीवन स्तर को परफार्मेंस के नीचे कुचल दिया. क्या कहीं किसी तीसरे इन्नोवेशन की कोई सुगबुगाहट है जो कींस के आकलन को बचे हुए 16 सालों में सही साबित करने में मददगार हो सके. कींस के आकलन के 100 साल पूरे होने में अभी 16 साल बाकी हैं.

अंत में

स्त्री विमर्श पर एक अच्छी वेबसाइट दिखाई दी स्त्री-काल. इस बार स्त्री-काल पर प्रकाशित सुधा उपाध्याय की यह प्रेम कविता –

तुम अकसर कहते हो मुझें

अव्यविस्थत

कर चुके हो शिकायत

संग्रह भावना की

पर क्या करूं

मैं नहीं फेंक सकती जिए हुए

किसी पल को कुड़ेदान में

चाहे वो बच्चों के बनाये सुंदर कार्ड हों….

उनके तुतलाते हस्ताक्षर,

रंगीन ड्राइंग

क्लासरूम नोट्स

यूं ही कागज के ठोंगे पर लिखी कोई कविता

डायरी का कोई पन्ना

कहीं से मिल गई कोई अच्छी शायरी…

या फिर चिंदियों में

तुम्हारे तमाम प्यारे संबोधनों का इतिहास

हर ब्योरा सुरक्षित रखा है मन के कोने में

फिर भी उसे दुलराने के लिए

उसका बाहर होना भी

उतना ही जरूरी है..

राजेंद्र तिवारी

कॉरपोरेट एडिटर प्रभात खबर

rajendra.tiwari@prabhatkhabar.in

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