सभी क्षेत्रों में आगे आएं युवा

By Prabhat Khabar Digital Desk
Updated Date
आशुतोष चतुर्वेदी
प्रधान संपादक, प्रभात खबर
ashutosh.chaturvedi
@prabhatkhabar.in
जीवन के हर क्षेत्र में पीढ़ियों का परिवर्तन हमेशा मुश्किल होता है. इसके लिए साहसिक पहल की जरूरत होती है. भारत आज विश्व में सब से अधिक युवा आबादी वाला देश है. इतनी युवा आबादी किसी देश के पास नहीं हैं, लेकिन युवा शक्ति को अवसर नहीं मिल पा रहे हैं.
दलील दी जाती है कि उनके पास अनुभव की कमी है. जान लीजिए कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में युवाओं को नेतृत्व का मौका नहीं दिया गया, तो हम इस अवसर को गंवा देंगे. पता नहीं आपने इस खबर पर ध्यान दिया कि नहीं.
हाल में ऑटोमोबाइल क्षेत्र की जानी मानी कंपनी महिंद्रा एंड महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन आनंद महिंद्रा ने साहसिक पहल की है. वे अगले साल कंपनी का शीर्ष पद छोड़ देंगे और नॉन-एग्जीक्यूटिव चेयरमैन बन जायेंगे यानी 1 अप्रैल, 2020 से आनंद महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन नहीं रहेंगे. कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर पवन गोयनका 11 नवंबर, 2020 से अपने कार्यकाल तक इस पद का अतिरिक्त कार्यभार संभालेंगे और उनके बाद 2 अप्रैल, 2021 से अनीश शाह गोयनका की जगह कंपनी के एमडी और सीइओ बन जायेंगे.
अभी अनीश शाह ग्रुप प्रेसिडेंट हैं. इसके अलावा कंपनी के अन्य शीर्ष पदों पर भी बदलावों की घोषणा की गयी है. उद्योग जगत में ऐसे उदाहरण बहुत कम ही मिलते हैं, जहां शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति ने स्वत: ही अपना पद छोड़ने की घोषणा की हो. महिंद्रा समूह भारत के सबसे प्रतिष्ठित 10 शीर्ष औद्योगिक घरानों में से एक है.
इस प्रसिद्ध समूह को लुधियाना में आनंद के दादा बंधुओं जगदीश चंद्र व कैलाशचंद्र महिंद्रा ने स्थापित किया गया था. हार्वर्ड बिजनेस स्कूल से बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई करने और कई अन्य पदों को संभालने के बाद 2012 में आनंद महिंद्रा ने महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर के रूप में कंपनी की कमान संभाली थी. 2016 में उन्हें महिंद्रा एंड महिंद्रा लिमिटेड का एग्जीक्यूटिव चेयरमैन बनाया गया. वह कोटक महिंद्रा बैंक के को-प्रमोटर भी हैं.
माना जाता है कि आनंद महिंद्रा ट्विटर पर सबसे ज्यादा सक्रिय उद्योगपतियों में से एक हैं. वे अक्सर युवाओं और समाज को प्रेरणा देने वाली बातें शेयर करते रहते हैं. दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने कंपनी में बदलाव की जानकारी भी ट्विटर के माध्यम से शेयर की. ट्विटर पर उनके 74 लाख फॉलोअर हैं. खबरों के अनुसार, आनंद महिंद्रा की नेटवर्थ 11,300 करोड़ रुपये है.
यह साफ नजर आता है कि विदेशों में भारत की तुलना में युवाओं को अधिक मौके देने की परंपरा है और जब भी मौका मिलता है, वहां युवा बेहतर करके दिखाते भी हैं. कुछ समय पहले हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू ने दुनिया में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले सीइओ की 2019 की सूची जारी की है. इस सूची के टॉप-10 में भारतीय मूल के तीन सीइओ शामिल थे और ये सभी युवा हैं.
इसमें अडोबी के शांतनु नारायण, मास्टर कार्ड के सीइओ अजय बंगा और माइक्रोसॉफ्ट के सीइओ सत्या नडेला को शामिल किया गया था. इसके अलावा गूगल के सीइओ सत्या नडेला और नोकिया के सीइओ राजीव सूरी से कौन भारतीय परिचित नहीं है़ ये सभी युवा हैं और करोड़ों-अरबों का कारोबार कर रही कंपनियों को संभाल रहे हैं. हाल में राजस्थान के मयंक प्रताप सिंह का नाम सुर्खियों में आया था.
21 वर्षीय इस युवा ने राजस्थान न्यायिक सेवा परीक्षा इतनी कम उम्र में उत्तीर्ण कर ली थी और वह भारत का सबसे युवा जज बन गया है. मयंक ने कानून का पांच साल का पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद राजस्थान न्यायिक सेवा परीक्षा में सबसे ज्यादा अंक हासिल किये हैं. देखने में आया है कि किसी युवा को जिम्मेदारी देने से न केवल पीढ़ियों का अंतर हो जाता है, साथ ही सोचने के तौर तरीके में भी बदलाव आ जाता है. युवाओं में कुछ कर दिखाने का जज्बा होता है.
मैं इस पक्ष में हूं कि पुरानी पीढ़ी के अनुभव का हमें लाभ उठाना चाहिए, लेकिन पीढ़ियों के परिवर्तन के लिए हमें साहसिक कदम उठाने होंगे, लेकिन देश का दुर्भाग्य है कि हमारे सोचने का तरीका पुराना ही है. सरकारी अथवा निजी क्षेत्र की नौकरी से आम आदमी 58 या फिर 60 साल की उम्र में रिटायर कर दिया जाता है और उसके स्थान पर कोई युवा जिम्मेदारी संभालता है. मेरा मानना है कि यह नियम राजनीति के क्षेत्र में भी लागू होना चाहिए.
राजनीति में उम्र की कोई सीमा नहीं होती. भले ही आप शारीरिक और मानसिक रूप से उतने चैतन्य न रहें, लेकिन सत्ता का मोह नहीं जाता है. यही वजह है कि सभी राजनीतिक दलों में बूढ़े नेता सत्ता से चिपके रहते हैं. कोई नेता रिटायर होना ही नहीं चाहता है, जबकि चुनाव न लड़ने से किसी नेता का योगदान कम नहीं हो जाता.
भाजपा ने इस दिशा में कदम उठाएं हैं और अन्य दलों को भी उसका अनुसरण करना चाहिए. वैसे, सार्वजनिक जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी यह बात नजर आती है. क्रिकेट में भी आपने गौर किया होगा कि अक्सर जब तक खिलाड़ी को बाहर बैठने के लिए नहीं कह दिया जाता, तब तक उसकी आकांक्षा टीम में बने रहने की होती है.
हालांकि कई खिलाड़ी इसके अपवाद भी हैं. भारत को विश्व कप जिताने वाले कपिल देव और महानतम बल्लेबाज सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर को कभी-न-कभी तो जाना पड़ा. वह हमेशा तो भारतीय टीम में बने नहीं रह सकते थे. आपको तेंदुलकर का मामला याद होगा. उनका प्रदर्शन स्तरीय नहीं चल रहा था, लेकिन वह रिटायर नहीं हो रहे थे. चयनकर्ताओं में साहस नहीं था कि वे कह सकें कि अब आपको रिटायर हो जाना चाहिए. यह फैसला सचिन के ऊपर ही छोड़ दिया गया था और काफी इंतजार के बाद उन्होंने यह फैसला किया.
भारत आज विश्व में सब से अधिक युवा आबादी वाला देश है. भारत के मुकाबले चीन और अमेरिका बुजुर्गों के देश हैं. चीन में लगभग 21 करोड़ और अमेरिका में लगभग सात करोड़ युवा हैं.
1991 की जनगणना के अनुसार देश में लगभग 34 करोड़ युवा थे, जिनकी संख्या 2016 तक बढ़ कर 51 करोड़ हो जाने का अनुमान लगाया गया था. माना जा रहा है कि 2020 तक भारत दुनिया का सबसे युवा देश हो जायेगा. आप गौर करें कि युवा देश में अब भी जीवन के हर क्षेत्र की बागड़ोर बुजुर्ग लोगों के हाथों में है. हमारे यहां एक और समस्या है कि अलग-अलग क्षेत्रों में युवा की परिभाषाएं भिन्न-भिन्न हैं.
राजनीति में तो 50 से 60 साल तक के लोगों को युवा मान लिया जाता है. 2003 में राष्ट्रीय युवा नीति में युवा काे परिभाषित किया गया था और 13 से 35 वर्ष की आयु वर्ग के लोगों को युवा माना गया था. भारत के युवा होने की खबर पर पूरी दुनिया की निगाहें हैं, लेकिन देश में इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा.
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